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सोलर पैनल को ठीक न कराकर बिजली के लिए लाखों का डीजल फूंक रहे अफसर
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नगर निगम के कार्यालय में सोलर पैनल खराब पड़े है।
- फोटो : ???? ????
सोलर पैनल को ठीक न कराकर बिजली के लिए लाखों का डीजल फूंक रहे अफसर
झांसी। नगर निगम एक ओर बजट का अभाव बताकर खर्च में कटौती कर रहा है। वहीं दूसरी ओर बिजली की खपत कम करने के लिए लगाए गए सोलर पैनल खराब पड़े हैं। इसके चलते रोज जनरेटर में 30 लीटर डीजल फुंक रहा है। खर्च में कटौती की आड़ में चल रहे डीजल के खेल को लेकर पार्षदों ने सवाल उठाए हैं।
नगर निगम में तीन साल पहले तीन करोड़ रुपये की लागत से सोलर पैनल लगाए गए थे। निगम कार्यालय की छत, पार्किंग, कार्यालय के पीछे लगे सोलर पैनलों को लगाने की मंशा थी कि इनसे बनने वाली बिजली से नगर निगम का बिजली बिल कम हो जाएगा। पैनल लगने के बाद करीब एक साल तक तो सोलर पैनल बंद पड़े रहे। इसके बाद जब पार्षदों ने सवाल उठाए, तो नगर निगम ने आनन फानन में पैनल शुरू कराए, लेकिन कुछ दिन चलने के बाद फिर पैनल खराब हो गए। कोरोना काल में खर्च में कटौती करने के लिए नगर निगम ने पैनल सही कराए और नगर निगम में अधिकांश बिजली पैनल से चलने लगी। अब पार्र्किंग और नगर निगम के पीछे लगा सोलर पैनल खराब हो गया है। इसके चलते लाइट जाने और बैठकों के दौरान जनरेटर चलाया जाता है। बताया जाता है कि जनरेटर में एक घंटे में 30 लीटर डीजल की खपत होती है। कुल मिलाकर माना जाए, तो निगम हर महीने करीब 70 हजार रुपये जनरेटर के डीजल पर खर्च करता है। पार्षदों का कहना है कि जनरेटर में डीजल फुं कना है, तो सोलर पैनल की उपयोगिता क्या है? पार्षद प्रदीप खटीक का कहना है कि शहर में विकास कार्य के लिए नगर निगम धन का रोना रो रहा है, लेकिन सोलर पैनल होने के बाद भी जनरेटर पर पैसा खर्च किया जा रहा है। पार्षद जुगल किशोर ने भी अधिकारियों से डीजल की खपत कम करने की मांग की है।
डीजल को लेकर कई बार उठ चुके हैं सवाल
नगर निगम में डीजल के खेल को लेकर कई बार सवाल उठ चुके हैं, लेकिन निगम अधिकारी आज तक इसे लेकर कोई ठोस कवायद नहीं कर पाए हैं। आंकड़ों के मुताबिक नगर निगम हर महीने औसतन करीब 40 लाख रुपये डीजल पर खर्च करता है, जिसमें 137 वाहन और कार्यालय का डीजल शामिल है।
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झांसी। नगर निगम एक ओर बजट का अभाव बताकर खर्च में कटौती कर रहा है। वहीं दूसरी ओर बिजली की खपत कम करने के लिए लगाए गए सोलर पैनल खराब पड़े हैं। इसके चलते रोज जनरेटर में 30 लीटर डीजल फुंक रहा है। खर्च में कटौती की आड़ में चल रहे डीजल के खेल को लेकर पार्षदों ने सवाल उठाए हैं।
नगर निगम में तीन साल पहले तीन करोड़ रुपये की लागत से सोलर पैनल लगाए गए थे। निगम कार्यालय की छत, पार्किंग, कार्यालय के पीछे लगे सोलर पैनलों को लगाने की मंशा थी कि इनसे बनने वाली बिजली से नगर निगम का बिजली बिल कम हो जाएगा। पैनल लगने के बाद करीब एक साल तक तो सोलर पैनल बंद पड़े रहे। इसके बाद जब पार्षदों ने सवाल उठाए, तो नगर निगम ने आनन फानन में पैनल शुरू कराए, लेकिन कुछ दिन चलने के बाद फिर पैनल खराब हो गए। कोरोना काल में खर्च में कटौती करने के लिए नगर निगम ने पैनल सही कराए और नगर निगम में अधिकांश बिजली पैनल से चलने लगी। अब पार्र्किंग और नगर निगम के पीछे लगा सोलर पैनल खराब हो गया है। इसके चलते लाइट जाने और बैठकों के दौरान जनरेटर चलाया जाता है। बताया जाता है कि जनरेटर में एक घंटे में 30 लीटर डीजल की खपत होती है। कुल मिलाकर माना जाए, तो निगम हर महीने करीब 70 हजार रुपये जनरेटर के डीजल पर खर्च करता है। पार्षदों का कहना है कि जनरेटर में डीजल फुं कना है, तो सोलर पैनल की उपयोगिता क्या है? पार्षद प्रदीप खटीक का कहना है कि शहर में विकास कार्य के लिए नगर निगम धन का रोना रो रहा है, लेकिन सोलर पैनल होने के बाद भी जनरेटर पर पैसा खर्च किया जा रहा है। पार्षद जुगल किशोर ने भी अधिकारियों से डीजल की खपत कम करने की मांग की है।
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डीजल को लेकर कई बार उठ चुके हैं सवाल
नगर निगम में डीजल के खेल को लेकर कई बार सवाल उठ चुके हैं, लेकिन निगम अधिकारी आज तक इसे लेकर कोई ठोस कवायद नहीं कर पाए हैं। आंकड़ों के मुताबिक नगर निगम हर महीने औसतन करीब 40 लाख रुपये डीजल पर खर्च करता है, जिसमें 137 वाहन और कार्यालय का डीजल शामिल है।
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