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श्याम ने जोड़े 5000 किसान, सभी ने गोबर- गोमूत्र से खेती कर बुंदेलखंड में बनाई पहचान

Mon, 25 Jul 2022 01:36 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 25 Jul 2022 01:36 AM IST
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Shyam added 5000 farmers, all made an identity in Bundelkhand by cultivating cow dung and urine
उम्मीद की मशाल----------संजय गुप्ता
झांसी। बुंदेलखंड में गोबर और गोमूत्र से कम लागत की खेती की चर्चा होेते ही लोगों की जुबान पर श्यामजी गुप्ता का नाम आ जाता है। श्यामजी ने 16 साल पहले अपनी तीन एकड़ जमीन पर इस पद्धति से खेती की शुरुआत की थी। लेकिन एक-एक करके उन्होंने 5000 किसानों को जोड़ा और अब आठ हजार एकड़ से अधिक जमीन पर गोबर और गोमूत्र से खेती हो रही है। अब इन किसानों द्वारा उगाई जाने वाली गेहूं, उड़द, मूंग, तिली और मूंगफली देश के बड़ों शहरों तक जा रही है।
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यूरिया और रासायनिक खादों से मिट्टी की सेहत लगातार खराब हो रही है। इसके अलावा इनके उपयोग से पैदा होने वाले कृषि उत्पाद लोगों के स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अनुकूल साबित नहीं हो रहे हैं। इससे निपटने के लिए खेती में गोबर और गोमूत्र के उपयोग को बढ़ावा देने की सलाह किसानों को लगातार दी जा रही है। यूरिया और रासायनिक खाद के मुकाबले गोबर और गोमूत्र से खेती की पद्धति बेहद सस्ती भी है। बावजूद, किसान इसे अपनाने से हिचकिचा रहे थे। उन्हें नुकसान होने का डर सता रहा था। किसानों की इस झिझक को दूर करने का काम किया झांसी की श्यामजी गुप्ता ने। 2006 में पहली बार उन्होंने अपनी अंबावाय में स्थित तीन एकड़ जमीन पर गोबर और गोमूत्र से खेती प्रारंभ की थी। केवल एक गाय उनके पास थी, जिसके गोबर और गोमूत्र का उपयोग उन्होंने अपनी खेती में किया। पहले ही साल में फसल लहलहा उठी। न तो यूरिया की जरूरत पड़ी और न ही रासायनिक खादों की। इतना ही नहीं, लगातार गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल किए जाने से उनकी जमीन की उर्वरक क्षमता और भी बढ़ गई। श्यामजी बताते हैं कि अब स्थिति ये है कि उनकी फसल पकने से पहले ही खरीदार सामने आ जाते हैं। फसल कटते ही हाथों हाथ बिक जाती है। मंडी के उन्हें चक्कर नहीं लगाने पड़ते।
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एक पुस्तक ने बदल दी थी सोच
झांसी। श्यामजी बताते हैं कि वे 2005 में गंगा स्नान करने के लिए हरिद्वार गए हुए थे। वहां उन्हें एक पुस्तक मिली थी, जिसमें गोबर और गोमूत्र से खेती की पद्धति की जानकारी दी गई थी। उसी पुस्तक में उन्हें सिक्किम के किसान डीपी सपकोटा के बारे में जानकारी हुई, जो गाय के गोबर और गोमूत्र से खेती करते थे और उनकी गिनती वहां के अग्रणी किसानों में होती थी। खेती की इस पद्धति के बारे में और अधिक जानकारी हासिल करने के लिए वे सिक्किम गए। वहां गोबर और गोमूत्र से सफलता से खेती होते देख ठान लिया था कि इसे बुंदेलखंड तक पहुंचाएंगे।
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शुरुआत में सभी ने लिया था हल्के में
झांसी। श्यामजी गुप्ता बताते हैं कि वे चाहते थे कि यहां कई किसान एक साथ मिलकर गाय के गोबर और गोमूत्र से खेती की शुरुआत करें। लेकिन, शुरूआत में इसके लिए कोई भी राजी नहीं हुआ। सभी को उनकी बात हल्की लगी। ऐसे में उन्होंने अपने खेत से ही शुरुआत की। परिणाम शानदार सामने आए। बेहद कम लागत में अच्छी पैदावार हुई थी। ये देखकर अन्य किसान भी इसके प्रति आकर्षित हुए। अब बुंदेलखंड के पांच हजार से अधिक किसान आठ हजार एकड़ में गोबर और गोमूत्र से खेती कर रहे हैं।

उर्वरक क्षमता के साथ जल स्तर है बढ़ता
झांसी। रसायन के उपयोग से मिट्टी में केंचुए खत्म हो जाते हैं। जबकि, गाय के गोबर और गोमूत्र से खेती करने पर ये स्वत: तेजी से पनपते हैं। श्यामजी गुप्ता ने बताया कि इस पद्धति से खेती करने पर मिट्टी की उर्वरक क्षमता तो बढ़ती ही है, साथ ही भूगर्भ जल का स्तर भी बढ़ता है। केंचुएं मिट्टी में घर बना लेते हैं। इससे मिट्टी पोली हो जाती है। खेत में डाला गया पानी मिट्टी की निचली सतह तक आसानी से पहुंच पाता है। इससे भूगर्भ जल स्तर पर भी बढ़ता है। श्यामजी ने बताया कि पिछले पंद्रह सालों के दरम्यान उनके खेत का जल स्तर लगभग 10 फुट ऊपर आ गया है।
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