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महंगाई के दौर में सिर्फ 90 रुपये में सिलाई जा रही बच्चों की ड्रेस
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school dress stich wages only 90 rupee
झांसी। स्कूली ड्रेस सिलने का काम स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को सौंपा गया। लेकिन इसके एवज में परिश्रामिक के तौर पर मिलने वाली रकम बेहद कम दी जा रही। इन महिलाओं को एक ड्रेस के लिए महज 90 रुपये दिए जा रहे। इसमें धागा, बटन, चेन आदि का खर्च भी महिलाओं को अपने पास से वहन करना पड़ता है जबकि इनकी सामान्य सिलाई ही करीब 300-350 रुपये तक बैठती है।
स्वयं सहायता समूहों के जरिए ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक स्वावलंबी बनाने के लिए सरकार की ओर से तमाम दावे किए जा रहे लेकिन, काम के बदले में पारिश्रामिक देने में पारदर्शिता नहीं दिखती। प्राइमरी में पढ़ने वाले बच्चों को सरकार की ओर से दो जोड़ी स्कूली ड्रेस मुहैया कराई जाती है। इसमें छात्रों को पैंट-शर्ट एवं छात्राओं को सलवार-कुर्ता दिया जाता है। झांसी में कुल 145905 छात्रों को स्कूली ड्रेस मुहैया कराई जा रही जिसमें एक जोड़ी ड्रेस सिलने का काम यहां स्वयं सहायता समूह की 2089 महिलाओं को सौंपा गया है। इन महिलाओं को कपड़े दे दिए गए हैं। इनको छात्र-छात्राओं की नाप करके सिंतबर तक ड्रेस देने को कहा गया है। एक जोड़ी सिलाई के लिए महिलाओं को 90 रुपये दिए जाएंगे। इसमें इनको धागा, चेन, बटन, अस्तर आदि खुद के पैसे से लगाने होंगे। कई महिलाओं के पास सिलाई मशीन नहीं है। उन्होंने ड्रेस सिलने के लिए खासतौर से किराए पर मशीन मंगाई है। ऐसे में उनकी लागत और अधिक हो जाती है।
सामान्य तौर पर शर्ट की सिलाई करीब 120-150 रुपये एवं पैंट की सिलाई 200-250 रुपये के बीच है। नाम न छापने की शर्त पर महिलाओं ने बताया कि एक ड्रेस पर करीब 40-50 रुपये की ही बचत होती है जो मेहनत के लिहाज से काफी कम है। बबीना ब्लॉक में रहने वालीं महिला सदस्य के मुताबिक दिन भर में तीन जोड़ी से अधिक ड्रेस नहीं सिली जा सकती। इसमें करीब आठ घंटे से अधिक का समय देना पड़ता है। कोई दूसरा काम न होने की वजह से मजबूरी में इसे करना पड़ रहा है। यह काम करने वाली तमाम महिलाओं का यही दर्द है। उनका कहना है कि कई बार पैसा बढ़ाने की मांग की गई लेकिन, आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई। वहीं, उपायुक्त स्वरोजगार डा.एनएन मिश्र का कहना है कि शासनादेश के मुताबिक ही महिलाओं को पारिश्रामिक दिया जाता है।
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कपड़े पर खर्च होती है सत्तर फीसदी रकम
छात्रों को स्कूली ड्रेस दिए जाने की योजना में बजट का सत्तर फीसदी हिस्सा कपड़े पर खर्च किया जाता है जबकि सिलाई में तीस फीसदी रकम खर्च की जाती है। शासनादेश के मुताबिक प्रति ड्रेस तीन सौ रुपये खर्च होते हैं इनमें से 210 रुपये का कपड़ा खरीदा जाता है जबकि 90 रुपये सिलाई के लिए दिया जाता है।
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स्वयं सहायता समूहों के जरिए ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक स्वावलंबी बनाने के लिए सरकार की ओर से तमाम दावे किए जा रहे लेकिन, काम के बदले में पारिश्रामिक देने में पारदर्शिता नहीं दिखती। प्राइमरी में पढ़ने वाले बच्चों को सरकार की ओर से दो जोड़ी स्कूली ड्रेस मुहैया कराई जाती है। इसमें छात्रों को पैंट-शर्ट एवं छात्राओं को सलवार-कुर्ता दिया जाता है। झांसी में कुल 145905 छात्रों को स्कूली ड्रेस मुहैया कराई जा रही जिसमें एक जोड़ी ड्रेस सिलने का काम यहां स्वयं सहायता समूह की 2089 महिलाओं को सौंपा गया है। इन महिलाओं को कपड़े दे दिए गए हैं। इनको छात्र-छात्राओं की नाप करके सिंतबर तक ड्रेस देने को कहा गया है। एक जोड़ी सिलाई के लिए महिलाओं को 90 रुपये दिए जाएंगे। इसमें इनको धागा, चेन, बटन, अस्तर आदि खुद के पैसे से लगाने होंगे। कई महिलाओं के पास सिलाई मशीन नहीं है। उन्होंने ड्रेस सिलने के लिए खासतौर से किराए पर मशीन मंगाई है। ऐसे में उनकी लागत और अधिक हो जाती है।
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सामान्य तौर पर शर्ट की सिलाई करीब 120-150 रुपये एवं पैंट की सिलाई 200-250 रुपये के बीच है। नाम न छापने की शर्त पर महिलाओं ने बताया कि एक ड्रेस पर करीब 40-50 रुपये की ही बचत होती है जो मेहनत के लिहाज से काफी कम है। बबीना ब्लॉक में रहने वालीं महिला सदस्य के मुताबिक दिन भर में तीन जोड़ी से अधिक ड्रेस नहीं सिली जा सकती। इसमें करीब आठ घंटे से अधिक का समय देना पड़ता है। कोई दूसरा काम न होने की वजह से मजबूरी में इसे करना पड़ रहा है। यह काम करने वाली तमाम महिलाओं का यही दर्द है। उनका कहना है कि कई बार पैसा बढ़ाने की मांग की गई लेकिन, आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई। वहीं, उपायुक्त स्वरोजगार डा.एनएन मिश्र का कहना है कि शासनादेश के मुताबिक ही महिलाओं को पारिश्रामिक दिया जाता है।
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कपड़े पर खर्च होती है सत्तर फीसदी रकम
छात्रों को स्कूली ड्रेस दिए जाने की योजना में बजट का सत्तर फीसदी हिस्सा कपड़े पर खर्च किया जाता है जबकि सिलाई में तीस फीसदी रकम खर्च की जाती है। शासनादेश के मुताबिक प्रति ड्रेस तीन सौ रुपये खर्च होते हैं इनमें से 210 रुपये का कपड़ा खरीदा जाता है जबकि 90 रुपये सिलाई के लिए दिया जाता है।