{"_id":"5f29c3ee8ebc3e3d0d55adb7","slug":"ram-janmbhumi-andolan-jhansi-news-jhs1731236182","type":"story","status":"publish","title_hn":"मंदिर आंदोलन के दौरान पहली बार कर्फ्यू से रूबरू हुई थी झांसी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मंदिर आंदोलन के दौरान पहली बार कर्फ्यू से रूबरू हुई थी झांसी
विज्ञापन
ram janmbhumi andolan
झांसी। झांसी की जनता पहली बार कर्फ्यू से रूबरू राम मंदिर आंदोलन के दौरान हुई थी। 1990 में कारसेवकों व पुलिस के बीच हुई हिंसा के बाद यहां कर्फ्यू लगा दिया गया था। इसके बाद 1992 में अयोध्या में ढांचा ढहने के बाद यहां कर्फ्यू लगाया गया था। आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली लगने से दो कारसेवकों की मौत भी हुई थी। जबकि, दर्जनों घायल हुए थे।
झांसी की पहचान देश के चुनिंदा शांतिप्रिय शहरों में है। लेकिन, राम मंदिर आंदोलन के दौरान झांसी में कुछ समय के लिए हालात खराब हो गए थे। 30 अक्तूबर 1990 को झांसी में दक्षिण के राज्यों से आए हुए दो लाख से अधिक कारसेवक मौजूद थे, जिन्हें अयोध्या जाने से रोकने के लिए झांसी में ट्रेनों से उतार लिया गया था। इसी दिन किले के मैदान में तत्कालीन सरकार के लिए बुद्धि - शुद्धि यज्ञ का आयोजन किया गया। पुलिस इस आयोजन को रोक रही थी, लेकिन कारसेवक अपने रुख पर अड़े हुए थे। पुलिस ने बलपूर्वक यज्ञ स्थल को तहस - नहस करना शुरू कर दिया। इस पर पुलिस और कारसेवक आमने सामने आ गए। पुलिस की ओर से गोलियां व आंसू गैस के गोले दागे जाने लगे, इसके जवाब में कारसेवकों ने पथराव कर दिया।
इसी दरम्यान खंडेराव गेट पर स्थित लकड़ी की टाल पर आग लगा दी गई। इससे माहौल बुरी तरह से बिगड़ गया। भाजपा नेता प्रदीप सरावगी ने बताया कि पुलिस की ओर से चली गोली में स्थानीय कारसेवक जगत प्रकाश अग्रवाल की मौत हो गई थी। इसके अलावा गुजरात से आए एक अनजान कारसेवक की भी मौत हुई थी। 70-80 कारसेवक घायल हुए थे। सुबह से लेकर दोपहर तकरीबन दो बजे तक यही स्थिति बनी रही। दो बजे सरकार ने कर्फ्यू की घोषणा कर दी और ढाई बजे केंद्रीय सुरक्षा बलों ने झांसी को अपने नियंत्रण में ले लिया। ये कर्फ्यू पांच नवंबर को खत्म हुआ था। इसके बाद 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ढांचा ढहाए जाने के बाद झांसी में दो दिन का कर्फ्यू लगा दिया गया था। लेकिन, संवेदनशील इलाकों में कर्फ्यू सात-आठ दिन तक चला था।
विज्ञापन
-----------------
बर्बर पुलिस लाठियों के साथ बरसा रही थी गोलियां
झांसी। आंदोलन के दौरान 30 अक्तूबर 1990 झांसी में हुई हिंसा के दौरान पुलिस ने बर्बर रुख अपना लिया था। कारसेवकों को लाठी - डंडे व आंसू गैस के गोले बरसाए जा रहे थे। साथ ही गोली चलाने से भी पुलिस गुरेज नहीं करी थी। पुलिस की इस कार्रवाई में दर्जनों कारसेवक घायल हुए थे। कारसेवक आज भी उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। हालांकि, अब बुधवार को मंदिर का निर्माण शुरू होने जा रहा है। अब उन्हें अपने जख्म भरते नजर आ रहे हैं।
पुलिस की गोली से कट गया था पैर
झांसी। 30 अक्तूबर 1990 में खंडेराव गेट के पास पुलिस और कारसेवकों के बीच तीखी झड़प हुई थी। पुलिस लाठियां चला रही थी तो कारसेवक पथराव कर रहे थे। इसी दौरान पुलिस की एक गोली रामप्रकाश अग्रवाल के पैर में जा धंसी। स्थिति ये रही कि उनका पैर तक काटना पड़ा गया। रामप्रकाश कहते हैं कि आंदोलन में दिया गया उनका बलिदान मंदिर के निर्माण होने पर सार्थक हो जाएगा।
कारसेवकों की सुरक्षा थी जरूरी
झांसी। हिंसा के दौरान चली पुलिस की गोली हजारी लाल श्रीवास्तव की आंख में लगी थी। लंबे इलाज के बाद वे ठीक हो पाए थे। हजारी लाल ने बताया कि लक्ष्मी व्यायाम मंदिर बाहर से आए हुए हजारों कारसेवक मौजूद थे। पुलिस व्यायाम मंदिर में घुसने वाली थी। इसी दरम्यान उन्होंने गेट बंद कर दिया। पुलिस ने गोली चला दी, जो उनकी आंख में लगी। लेकिन, राम मंदिर का निर्माण होते देखना सबसे बड़ी खुशी की बात है।
आर्मी ने कराया था इलाज
झांसी। बवाल के बीच राजीव गुप्ता खंडेराव गेट पर कारसेवकों के बीच मौजूद थे। इसी दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। वे पुलिस की चपेट में आ गए। पुलिस ने बेरहमी से उन पर लाठियां बरसाईं और उन्हें वहीं पड़ा छोड़कर चली गई। राजीव ने बताया कि बाद में आर्मी के जवानों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। तब कहीं उनकी जान बच पाई। कारसेवकों को त्याग अब काम आया है।
मरा समझकर छोड़ गई थी पुलिस
झांसी। राम मंदिर आंदोलन के दौरान 1990 में वीरेंद्र तिवारी कारसेवकों के लिए भोजन, पानी जैसी व्यवस्थाएं जुटा रहे थे। इसी दरम्यान हिंसा भड़क गई और वे खंडेराव गेट पर पुलिस की चपेट में आ गए। पुलिस ने उन पर जमकर लाठियां बरसाईं। वीरेंद्र ने बताया कि पुलिस की लाठियों से वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। पुलिस मरा हुआ समझकर उन्हें छोड़कर चली गई थी। लेकिन, किसी तरह कारसेवकों ने ही उन्हें अस्पताल पहुंचा था।
-------------------------
महिलाओं ने भी संभाल रखा था मोर्चा
झांसी। राम मंदिर निर्माण के मोर्चे पर महिलाएं भी डटकर खड़ी हुईं थीं। कारसेवकों के लिए भोजन की व्यवस्थाएं जुटाना हो या फिर आगे मोर्च पर डटकर खड़े रहना हो, सभी में महिलाएं अपनी अग्रणी भूमिका अदा कर रहीं थीं। पुलिस ने तमाम महिलाओं को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। मंदिर का निर्माण शुरू होने से वे सब प्रफुल्लित हैं। महिलाओं का कहना है कि आंदोलन के दौरान मिले कष्ट अब दूर होने का समय आया है।
बच्चों को राम भरोसे छोड़ निकल पड़ती थीं डॉ. संध्या
झांसी। कैमासन नगर निवासी डॉ. संध्या पांडेय ने राम मंदिर के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। तब वे विश्व हिंदू परिषद के महिला मोर्चे की महामंत्री थीं। इसके अलावा उन्होंने अलग से रामसभा महिला मंडल बना रखा था। आंदोलन के हर मोर्च पर वे अपनी महिला साथियों के साथ डटीं रहती थीं। 23 महिलाओं के साथ पुलिस ने गिरफ्तार कर उन्हें 25 दिनों के लिए जेल भेजा था। डॉ. संध्या ने बताया कि घर में छोटे-छोटे बच्चे थे, जिन्हें वे राम भरोसे छोड़कर राम मंदिर के लिए निकल पड़ती थीं। तीन दशक पहले देखा सपना अब पूरा हो रहा है। मन को बहुत तसल्ली मिल रही है।
भरोसे के साथ मोेर्चे पर डटी रहीं शशिप्रभा
झांसी। भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की सदस्य शशिप्रभा मिश्रा 1990 में राम मंदिर के आंदोलन के दौरान महिला मोर्चा की नगर महामंत्री थीं। आंदोलन के दौरान पुलिस ने गिरफ्तार कर ललितपुर जेल भेज दिया था। इसके बाद 2003 में महिला मोर्चा की विभाग संयोजक रहते हुए उन्हें गिरफ्तार कर 15 दिनों के लिए महोबा जेल भेजा गया। शशि प्रभा कहती हैं कि उन्हें पूरा भरोसा था कि एक दिन अयोध्या में राम मंदिर जरूर बनेगा। सदियों बाद अब देश में राम राज्य लौटेगा।
कारसेवकों को भोजन देते गिरफ्तार हुईं थीं कंचन
झांसी। राज्य महिला आयोग की सदस्य डॉ. कंचन जायसवाल पर 1990 में आंदोलन के दरम्यान बुंदेलखंड महाविद्यालय में जमा कारसेवकों को भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी थी। पुलिस से बचते बचाते वे अपना काम लगातार करती रहीं, लेकिन एक दिन वे पुलिस की पकड़ में आ गईं और गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद 1992 में वे एक बार फिर गिरफ्तार हुईं। वे कहती हैं कि आंदोलन सफल हुआ, ये बड़ी बात है।
पता नहीं था, बस चले जा रहे थे
झांसी। राम मंदिर आंदोलन के दरम्यान 2003 में पुलिस ने बीकेडी चौराहे से भाजपा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था। इसमें भारती चौबे भी शामिल थीं। भारती कहती हैं कि यहां से पुलिस गिरफ्तार कर पहले पुलिस लाइन, फिर सकरार और उसके बाद महोबा जेल ले गई। पता नहीं था कहां जा रहे, बस चले जा रहे थे। घबराहट हो रही थी, परंतु साथी हौसला बढ़ा रहे थे। 25-30 दिन जेल से छूटीं थीं। उस यात्रा की मंजिल अब मिलने जा रही है।
--------------------------------
बालपन में निभाई बड़ी जिम्मेदारी
झांसी। राम मंदिर आंदोलन में बच्चों ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी। बालपन की अवस्था का लाभ उठाते हुए उन्हें कारसेवकों तक भोजन पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। ये बच्चे अपने बस्तों में भोजन सामग्री रखकर कारसेवकों तक ले जाते थे। पुलिस को भी उन पर शक नहीं होता था और वे अपने काम में जुटे रहते थे। उनका कहना है कि बचपन में किया काम अब अंजाम पर पहुंचा है। बालपन के सपने को अब साकार होते देखना बेहद अच्छा लग रहा है।
बस्तों में भरकर ले जाते थे पूड़ी और सब्जी
झांसी। भारतीय जनता पार्टी के महानगर अध्यक्ष मुकेश मिश्रा ने बताया कि राम मंदिर आंदोलन के दरम्यान वे दसवीं कक्षा में थे। विद्यार्थी परिषद से जुड़े होने की वजह से आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। जगह - जगह कारसेवकों के लिए भोजन पकाया जाता था। इसे कारसेवकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उनकी टीम को सौंपी गई थी। सभी अपने बस्तों में भोजन भरकर कंधे पर टांगकर ले जाते थे। 1990 में हुए बवाल के दौरान पंचकुइयां पर गोली लगने से एक कारसेवक घायल हो गया था, उसे बाल टोली ही हैंडठेले पर रखकर अस्पताल लेकर गई थी।
विज्ञापन
झांसी की पहचान देश के चुनिंदा शांतिप्रिय शहरों में है। लेकिन, राम मंदिर आंदोलन के दौरान झांसी में कुछ समय के लिए हालात खराब हो गए थे। 30 अक्तूबर 1990 को झांसी में दक्षिण के राज्यों से आए हुए दो लाख से अधिक कारसेवक मौजूद थे, जिन्हें अयोध्या जाने से रोकने के लिए झांसी में ट्रेनों से उतार लिया गया था। इसी दिन किले के मैदान में तत्कालीन सरकार के लिए बुद्धि - शुद्धि यज्ञ का आयोजन किया गया। पुलिस इस आयोजन को रोक रही थी, लेकिन कारसेवक अपने रुख पर अड़े हुए थे। पुलिस ने बलपूर्वक यज्ञ स्थल को तहस - नहस करना शुरू कर दिया। इस पर पुलिस और कारसेवक आमने सामने आ गए। पुलिस की ओर से गोलियां व आंसू गैस के गोले दागे जाने लगे, इसके जवाब में कारसेवकों ने पथराव कर दिया।
विज्ञापन
इसी दरम्यान खंडेराव गेट पर स्थित लकड़ी की टाल पर आग लगा दी गई। इससे माहौल बुरी तरह से बिगड़ गया। भाजपा नेता प्रदीप सरावगी ने बताया कि पुलिस की ओर से चली गोली में स्थानीय कारसेवक जगत प्रकाश अग्रवाल की मौत हो गई थी। इसके अलावा गुजरात से आए एक अनजान कारसेवक की भी मौत हुई थी। 70-80 कारसेवक घायल हुए थे। सुबह से लेकर दोपहर तकरीबन दो बजे तक यही स्थिति बनी रही। दो बजे सरकार ने कर्फ्यू की घोषणा कर दी और ढाई बजे केंद्रीय सुरक्षा बलों ने झांसी को अपने नियंत्रण में ले लिया। ये कर्फ्यू पांच नवंबर को खत्म हुआ था। इसके बाद 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ढांचा ढहाए जाने के बाद झांसी में दो दिन का कर्फ्यू लगा दिया गया था। लेकिन, संवेदनशील इलाकों में कर्फ्यू सात-आठ दिन तक चला था।
विज्ञापन
-----------------
बर्बर पुलिस लाठियों के साथ बरसा रही थी गोलियां
झांसी। आंदोलन के दौरान 30 अक्तूबर 1990 झांसी में हुई हिंसा के दौरान पुलिस ने बर्बर रुख अपना लिया था। कारसेवकों को लाठी - डंडे व आंसू गैस के गोले बरसाए जा रहे थे। साथ ही गोली चलाने से भी पुलिस गुरेज नहीं करी थी। पुलिस की इस कार्रवाई में दर्जनों कारसेवक घायल हुए थे। कारसेवक आज भी उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। हालांकि, अब बुधवार को मंदिर का निर्माण शुरू होने जा रहा है। अब उन्हें अपने जख्म भरते नजर आ रहे हैं।
पुलिस की गोली से कट गया था पैर
झांसी। 30 अक्तूबर 1990 में खंडेराव गेट के पास पुलिस और कारसेवकों के बीच तीखी झड़प हुई थी। पुलिस लाठियां चला रही थी तो कारसेवक पथराव कर रहे थे। इसी दौरान पुलिस की एक गोली रामप्रकाश अग्रवाल के पैर में जा धंसी। स्थिति ये रही कि उनका पैर तक काटना पड़ा गया। रामप्रकाश कहते हैं कि आंदोलन में दिया गया उनका बलिदान मंदिर के निर्माण होने पर सार्थक हो जाएगा।
कारसेवकों की सुरक्षा थी जरूरी
झांसी। हिंसा के दौरान चली पुलिस की गोली हजारी लाल श्रीवास्तव की आंख में लगी थी। लंबे इलाज के बाद वे ठीक हो पाए थे। हजारी लाल ने बताया कि लक्ष्मी व्यायाम मंदिर बाहर से आए हुए हजारों कारसेवक मौजूद थे। पुलिस व्यायाम मंदिर में घुसने वाली थी। इसी दरम्यान उन्होंने गेट बंद कर दिया। पुलिस ने गोली चला दी, जो उनकी आंख में लगी। लेकिन, राम मंदिर का निर्माण होते देखना सबसे बड़ी खुशी की बात है।
आर्मी ने कराया था इलाज
झांसी। बवाल के बीच राजीव गुप्ता खंडेराव गेट पर कारसेवकों के बीच मौजूद थे। इसी दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। वे पुलिस की चपेट में आ गए। पुलिस ने बेरहमी से उन पर लाठियां बरसाईं और उन्हें वहीं पड़ा छोड़कर चली गई। राजीव ने बताया कि बाद में आर्मी के जवानों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। तब कहीं उनकी जान बच पाई। कारसेवकों को त्याग अब काम आया है।
मरा समझकर छोड़ गई थी पुलिस
झांसी। राम मंदिर आंदोलन के दौरान 1990 में वीरेंद्र तिवारी कारसेवकों के लिए भोजन, पानी जैसी व्यवस्थाएं जुटा रहे थे। इसी दरम्यान हिंसा भड़क गई और वे खंडेराव गेट पर पुलिस की चपेट में आ गए। पुलिस ने उन पर जमकर लाठियां बरसाईं। वीरेंद्र ने बताया कि पुलिस की लाठियों से वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। पुलिस मरा हुआ समझकर उन्हें छोड़कर चली गई थी। लेकिन, किसी तरह कारसेवकों ने ही उन्हें अस्पताल पहुंचा था।
-------------------------
महिलाओं ने भी संभाल रखा था मोर्चा
झांसी। राम मंदिर निर्माण के मोर्चे पर महिलाएं भी डटकर खड़ी हुईं थीं। कारसेवकों के लिए भोजन की व्यवस्थाएं जुटाना हो या फिर आगे मोर्च पर डटकर खड़े रहना हो, सभी में महिलाएं अपनी अग्रणी भूमिका अदा कर रहीं थीं। पुलिस ने तमाम महिलाओं को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। मंदिर का निर्माण शुरू होने से वे सब प्रफुल्लित हैं। महिलाओं का कहना है कि आंदोलन के दौरान मिले कष्ट अब दूर होने का समय आया है।
बच्चों को राम भरोसे छोड़ निकल पड़ती थीं डॉ. संध्या
झांसी। कैमासन नगर निवासी डॉ. संध्या पांडेय ने राम मंदिर के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। तब वे विश्व हिंदू परिषद के महिला मोर्चे की महामंत्री थीं। इसके अलावा उन्होंने अलग से रामसभा महिला मंडल बना रखा था। आंदोलन के हर मोर्च पर वे अपनी महिला साथियों के साथ डटीं रहती थीं। 23 महिलाओं के साथ पुलिस ने गिरफ्तार कर उन्हें 25 दिनों के लिए जेल भेजा था। डॉ. संध्या ने बताया कि घर में छोटे-छोटे बच्चे थे, जिन्हें वे राम भरोसे छोड़कर राम मंदिर के लिए निकल पड़ती थीं। तीन दशक पहले देखा सपना अब पूरा हो रहा है। मन को बहुत तसल्ली मिल रही है।
भरोसे के साथ मोेर्चे पर डटी रहीं शशिप्रभा
झांसी। भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की सदस्य शशिप्रभा मिश्रा 1990 में राम मंदिर के आंदोलन के दौरान महिला मोर्चा की नगर महामंत्री थीं। आंदोलन के दौरान पुलिस ने गिरफ्तार कर ललितपुर जेल भेज दिया था। इसके बाद 2003 में महिला मोर्चा की विभाग संयोजक रहते हुए उन्हें गिरफ्तार कर 15 दिनों के लिए महोबा जेल भेजा गया। शशि प्रभा कहती हैं कि उन्हें पूरा भरोसा था कि एक दिन अयोध्या में राम मंदिर जरूर बनेगा। सदियों बाद अब देश में राम राज्य लौटेगा।
कारसेवकों को भोजन देते गिरफ्तार हुईं थीं कंचन
झांसी। राज्य महिला आयोग की सदस्य डॉ. कंचन जायसवाल पर 1990 में आंदोलन के दरम्यान बुंदेलखंड महाविद्यालय में जमा कारसेवकों को भोजन मुहैया कराने की जिम्मेदारी थी। पुलिस से बचते बचाते वे अपना काम लगातार करती रहीं, लेकिन एक दिन वे पुलिस की पकड़ में आ गईं और गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद 1992 में वे एक बार फिर गिरफ्तार हुईं। वे कहती हैं कि आंदोलन सफल हुआ, ये बड़ी बात है।
पता नहीं था, बस चले जा रहे थे
झांसी। राम मंदिर आंदोलन के दरम्यान 2003 में पुलिस ने बीकेडी चौराहे से भाजपा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था। इसमें भारती चौबे भी शामिल थीं। भारती कहती हैं कि यहां से पुलिस गिरफ्तार कर पहले पुलिस लाइन, फिर सकरार और उसके बाद महोबा जेल ले गई। पता नहीं था कहां जा रहे, बस चले जा रहे थे। घबराहट हो रही थी, परंतु साथी हौसला बढ़ा रहे थे। 25-30 दिन जेल से छूटीं थीं। उस यात्रा की मंजिल अब मिलने जा रही है।
--------------------------------
बालपन में निभाई बड़ी जिम्मेदारी
झांसी। राम मंदिर आंदोलन में बच्चों ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी। बालपन की अवस्था का लाभ उठाते हुए उन्हें कारसेवकों तक भोजन पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। ये बच्चे अपने बस्तों में भोजन सामग्री रखकर कारसेवकों तक ले जाते थे। पुलिस को भी उन पर शक नहीं होता था और वे अपने काम में जुटे रहते थे। उनका कहना है कि बचपन में किया काम अब अंजाम पर पहुंचा है। बालपन के सपने को अब साकार होते देखना बेहद अच्छा लग रहा है।
बस्तों में भरकर ले जाते थे पूड़ी और सब्जी
झांसी। भारतीय जनता पार्टी के महानगर अध्यक्ष मुकेश मिश्रा ने बताया कि राम मंदिर आंदोलन के दरम्यान वे दसवीं कक्षा में थे। विद्यार्थी परिषद से जुड़े होने की वजह से आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। जगह - जगह कारसेवकों के लिए भोजन पकाया जाता था। इसे कारसेवकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उनकी टीम को सौंपी गई थी। सभी अपने बस्तों में भोजन भरकर कंधे पर टांगकर ले जाते थे। 1990 में हुए बवाल के दौरान पंचकुइयां पर गोली लगने से एक कारसेवक घायल हो गया था, उसे बाल टोली ही हैंडठेले पर रखकर अस्पताल लेकर गई थी।