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ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने कराया था झांसी के पंचकुइयां मंदिर का निर्माण

Tue, 05 Oct 2021 01:06 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 05 Oct 2021 01:06 AM IST
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Raja Veer Singh Bundela of Orchha had constructed Panchkuian temple of Jhansi
पंचकुइयां सिद्धपीठ मंदिर का मुख्य द्वार।
झांसी। महानगर के दुर्ग की तलहटी में स्थित प्राचीन पंचकुइयां मंदिर अपने आप में जहां धार्मिक वैभव और चमत्कार समेटे हुए हैं वहीं इसका अपना गौरवशाली इतिहास भी है। यूं तो मंदिर के मुख्य दरबार में स्थापित मां शीतला व संकटा माता की प्रतिमाएं चंदेलकालीन हैं, पर उस समय इनका छोटा सा मंदिर था। सोलहवी शताब्दी में ओरछा के महाराजा वीर सिंह जूदेव ने झांसी के किले के निर्माण के दौरान ही पंचकुइयां के इस छोटे से मंदिर को विशाल स्वरूप दिया था। इसके अलावा मंदिर के अंदर अन्य देव प्रतिमाओं की भी स्थापना करवाई थी। बुंदेलखंड का यह एक मात्र मंदिर है जहां पर अलग-अलग बीमारियों के उपचार के लिए अलग-अलग देवियों की स्थापना की गई है। इनके छोटे-छोटे मंदिर भी परिसर में ही स्थित हैं। यहां हर बीमारी से संबंधित पूजा पद्धति भी अलग-अलग है। इसके वैज्ञानिक आधार के बारे में तो नहीं कहा जा सकता पर, धार्मिक आस्था के अनुसार सैकड़ों लोग यहां आकर संबंधित बीमारी की पूजा करवाते हैं। इनमें बड़ी चेचक, छोटी चेचक, मोतीझरा, फलक बराई जैसी बीमारियों के अलावा बच्चों की बीमारियों का निदान पूजा करके व जल पिलाकर होता है। जब झांसी में मराठा शासन आया तब महारानी लक्ष्मीबाई किले की तलहटी में स्थित इस मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना करने आती थीं।
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दक्षिणमुखी हैं पंचकुइया माता
मंदिर के पुजारी सुरेशचंद्र खेबरिया बताते हैं कि चंदेलकाल में इस स्थान पर एक छोटे से मंदिर में शीतला माता और संकटा माता की प्रतिमा स्थापित थीं, बाद में सोलहवी शताब्दी में ओरछा नरेश वीरसिंह जूदेव ने जब झांसी के किले का निर्माण करवाया उस समय इस मंदिर को भव्य बनाया गया। इस मंदिर की विशेषता यह है कि देवीजी की प्रतिमाएं दक्षिण मुखी हैं। खेबरिया बताते हैं कि बाद में झांसी में मराठा शासन आने पर महारानी लक्ष्मीबाई भी मंदिर पर आकर प्रतिदिन पूजा अर्चना करती थीं। इन्हें नगर भवानी के रूप में भी जाना जाता है अर्थात कुलदेवी के रूप में भी इन्हें पूजा जाता है। शहर के नागरिक शादी समारोह की पूजा करने यहीं पर आते हैं।
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अलग-अलग अलग बीमारियों के लिए होती है अलग-अलग देवियों की पूजा
मंदिर के पुजारी सुरेश चंद्र खेबरिया बताते हैं कि मंदिर के परिसर में स्थित मंदिरों में मुख्य दरबार शीतला माता और संकटा माता का है। इस दरबार का जल पिलाने से बच्चों की बीमारियां ठीक हो जाती हैं। इसी तरह मोतीझरा के लिए मोतीझरा की माता पर पालक की भाजी चढ़ाकर पूजा की जाती है, बोदरी माता पर खसरा का इलाज सफेद कागज पर पालक चढ़ाकर, खोखो माता पर खांसी का इलाज सफेद कागज पर पांच तरह की मिठाई चढ़ाई जाती है। खिलौनी खिलौना माता पर वे लोग पूजा करते हैं जिन्हें बड़ी चेचक निकलने पर दाग हो जाते हैं, ऐसा माना जाता है कि यहां माता को चमेली का तेल चढ़ाकर इसी तेल को लगाने से दाग खत्म हो जाते हैं। बीजासेन माता पर सुहागिने अपने सुहाग की रक्षा की कामना करती हैं तथा खिचली माता पर उन बच्चों के ले जाया जाता है जो बहुत ज्यादा खीजते रहते हैं. खिचली माता पर खीर चढ़ाई जाती है। मंदिर परिसर के बीचोबीच स्थित है भैंसासुर कुंड है, इसके अंदर सफेद कागज पर रखकर दही चावल चढ़ाकर एक सप्ताह तक इसके जल को शरीर पर लगाने से ज्वर समाप्त हो जाता है।
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मुसलिम समुदाय के लोग भी आते है रोग निदान को
पुजारी सुरेशचंद्र बताते हैं कि बड़ी चेचक से लेकर बच्चों के रोगों के निदान के लिए जल लेने के लिए मुस्लिम समाज के लोग भी मंदिर में आते हैं।
वर्ण व्यवस्था के आधार पर मंदिर परिसर में बनाई गईं पांच कुइयां
मंदिर के सहायक पुजारी शंभूनाथ उपाध्याय बताते हैं कि
मंदिर परिसर में ही पांच कुइयां (छोटे कुएं) बने हुए हैं इन्हीं के नाम से इस सिद्धपीठ का नाम पंचकुइयां माता पड़ा। इन पांच कुओं के बारे में कहा जाता है, इनमें से एक कुंआ मातारानी की सेवा के लिए आरक्षित है, इसमें से सिर्फ उनकी सेवा पूजा के लिए ही जल जाता है, शेष कुएं वर्ण व्यवस्था के तहत आरक्षित किए गए थे। मंदिर पर क्वांर की नवरात्र व चैत्र की नवरात्र पर हर साल दो बार विशाल मेला लगता है। इसके अलावा शीतलाष्टमी भी धूमधाम से मनाई जाती है।
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