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हमारे जमाने में तांगा और टेंपो से होता था प्रचार
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झांसी। विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही प्रत्याशियाें के साथ ही मतदाताओं में भी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। बुजुर्ग भी चुनावों में मतदान करने के लिए उत्साहित हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि आज की राजनीति बहुत बदल गई है। हमारे जमाने में तो तांगा और टेंपों से प्रचार होता था।
सन् 1970 से लेकर 2022 तक के चुनाव पर बुजुर्गों ने चर्चा की तो उन्होंने बताया कि उस समय चुनाव में पैदल, साइकिल और तांगे के सहारे ही प्रचार किया जाता था। ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने के लिए कई किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था। अब तो बड़े-बड़े माइक, स्पीकर आ गए हैं तब तो सिर्फ रेडियो ही चुनाव प्रचार का साधन था।
बुजुर्गों ने कहा कि हमने कभी सोचा नहीं था कि चुनाव प्रचार करने के लिए फेसबुक, व्हाट्सएप, सोशल मीडिया का भी युग आएगा। पहले तो एक तार वाला टेलीफोन चलता था जिसके भरोसे ही फोन पर बात हो जाती थी। न बड़ी कारें थीं, न ही दूरी तय करने के लिए बड़े-बड़े वाहन थे। लेकिन उन चुनाव में एक अलग ही मजा था। एक गांव का मुखिया पूरे गांव को परिवार मानता था। अगर किसी घर में मेहमान आए तो पूरे गांव के लिए वह मेहमान होता था। उसकी खातिरदारी की जाती थी। नेता भी उसे ही चुनते थे, जो गांव में बेदाग, साफ और निष्पक्ष छवि वाला होता था।
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वहीं, पहले चुनाव में जात-बिरादरी और हिंदू-मुस्लिम से इतर विकास करने पर ही बात होती थी। अब तो भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है। पहले ऐसा नहीं था सिर्फ और सिर्फ विकास के नाम पर ही चुनाव लड़े जाते थे।
बोले बुुजुर्ग
नेता बेदाग और स्वच्छ छवि के होते थे। सभी लोगों में अपनापन था। - लखपत, 64 साल
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जब हमने पहला डाला वोट था तो आज भी उसकी याद आती है। वो समय ही अलग था। - सुरेंद्र सिंह, 60 साल
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मैंने राजनीति में कई बदलाव देखे हैं अब प्रत्याशी शौक के लिए चुनाव लड़ते हैं। - बांके बिहारी, 89 साल
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बेदाग और साफ छवि का प्रत्याशी होना चाहिए। हमारे जमाने में साफ छवि के ही प्रत्याशी थे। - वी.के शुक्ला 80 साल
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सन् 1970 से लेकर 2022 तक के चुनाव पर बुजुर्गों ने चर्चा की तो उन्होंने बताया कि उस समय चुनाव में पैदल, साइकिल और तांगे के सहारे ही प्रचार किया जाता था। ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने के लिए कई किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था। अब तो बड़े-बड़े माइक, स्पीकर आ गए हैं तब तो सिर्फ रेडियो ही चुनाव प्रचार का साधन था।
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बुजुर्गों ने कहा कि हमने कभी सोचा नहीं था कि चुनाव प्रचार करने के लिए फेसबुक, व्हाट्सएप, सोशल मीडिया का भी युग आएगा। पहले तो एक तार वाला टेलीफोन चलता था जिसके भरोसे ही फोन पर बात हो जाती थी। न बड़ी कारें थीं, न ही दूरी तय करने के लिए बड़े-बड़े वाहन थे। लेकिन उन चुनाव में एक अलग ही मजा था। एक गांव का मुखिया पूरे गांव को परिवार मानता था। अगर किसी घर में मेहमान आए तो पूरे गांव के लिए वह मेहमान होता था। उसकी खातिरदारी की जाती थी। नेता भी उसे ही चुनते थे, जो गांव में बेदाग, साफ और निष्पक्ष छवि वाला होता था।
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वहीं, पहले चुनाव में जात-बिरादरी और हिंदू-मुस्लिम से इतर विकास करने पर ही बात होती थी। अब तो भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है। पहले ऐसा नहीं था सिर्फ और सिर्फ विकास के नाम पर ही चुनाव लड़े जाते थे।
बोले बुुजुर्ग
नेता बेदाग और स्वच्छ छवि के होते थे। सभी लोगों में अपनापन था। - लखपत, 64 साल
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जब हमने पहला डाला वोट था तो आज भी उसकी याद आती है। वो समय ही अलग था। - सुरेंद्र सिंह, 60 साल
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मैंने राजनीति में कई बदलाव देखे हैं अब प्रत्याशी शौक के लिए चुनाव लड़ते हैं। - बांके बिहारी, 89 साल
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बेदाग और साफ छवि का प्रत्याशी होना चाहिए। हमारे जमाने में साफ छवि के ही प्रत्याशी थे। - वी.के शुक्ला 80 साल