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बोतलों में बंद 2200 लोगों की मौत का नहीं खुल सका राज
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बोतलें में बंद पड़ा है बाइस सौ लोगों की मौत का राज
झांसी। सैकड़ों लोगों की मौत का राज पोस्टमार्टम हाउस के कमरे में रखी बोतलों में बंद पड़ा हुआ है। यह सुनकर अचंभा जरूर हुआ होगा, लेकिन सच्चाई तो यही है। बोतलों में बंद करके जिनका बिसरा जांच के लिए भेजा गया था या रखा गया था, उनकी जांच रिपोर्ट आज तक नहीं आई है। इस कारण मौतों का खुलासा नहीं हो सका। कभी बिसरा जांच का नाम लेकर इनके परिजनों को जल्द खुलासे का आश्वासन देने वाली पुलिस भी इन्हें भूल गई है।
वर्ष 2012 में थाना शाहजहांपुर के जंगलों में एक युवती की लाश मिली थी। पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने के बाद शव का बिसरा सुरक्षित रख लिया था। परिजनों को भी अब शायद इस बात का अंदाजा न हो कि उनकी बेटी की मौत का राज पोस्टमार्टम हाउस के एक कमरे में रखी बोतले में सड़ चुका है। इस युवती की तरह सैकड़ों मौतों का राज भी ऐसे ही बोेतलेे में दफन है। बताया गया है कि पोस्टमार्टम हाउस में हर साल करीब सौ से लेकर डेढ़ सौ लाशों का बिसरा संरक्षित होता है। मगर, इनमें से पांच फीसद के करीब ही जांच के लिए जा पाते हैं। सूत्रों से पता चला है कि 2009 से अब तक पोस्टमार्टम हाउस की बोतलों में करीब 2200 बिसरा रखे हुए हैं।
झांसी जिले के साथ ललितपुर, महोबा, जालौैन व आसपास के अन्य इलाकों के भी बिसरा यहां मौजूद हैं। ये उनके बिसरा हैं जो बाहरी जिलों से रेफर होने के बाद झांसी मेडिकल कॉलेज मेें दम तोड़ देते हैं। यहां झांसी मेडिकल कॉलेज में पोस्टमार्टम के बाद उनका बिसरा सुरक्षित कर लिया जाता है। संबंधित थाना पुलिस इन्हें संरक्षित कराकर भूल चुकी है। कइयों के बिसरा तो खराब भी हो गए हैं। कुछ डिब्बों को तो चूहों ने भी कुतर दिया है। ऐसे में शायद ही इनकी जांच से अब र्कोई नतीजा निकल सके।
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कब होती है बिसरा जांच
शराब से हुई मौत, जहरखुरानी या फिर ऐसा मामला जिसमें मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सके। इनके खुलासे के लिए बिसरा जांच कराई जाती है। छोटी आंत, आंत लीवर, गुर्दे को जांच के लिए भेजा जाता है। झंझटों से बचने के लिए अधिकांश मामलों में बिसरा परीक्षण के लिए भेजा ही नहीं जाता है।
यह करती है पुलिस
पुलिस केस में पोस्टमार्टम की रिपोर्ट तो लगा देती है साथ बिसरा सुरक्षित रखने की बात भी लिख देती है, लेकिन जांच रिपोर्ट सालों तक कोर्ट में पेश नहीं की जाती। कई बार पीड़ित और आरोपी पक्ष के बीच समझौता हो जाता है। नियमानुसार पुलिस को बिसरा तीस दिन के अंदर फोरेंसिक लैब में भेज देना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है।
प्रदेश में दो ही लैब
बिसरा जांच के लिए प्रदेश के आगरा व लखनऊ में ही फोरेंसिक लैब है। ऐसे में इन पर काफी भार है। सूत्रों की मानें तो बिसरा जांच के लिए भेजे जाते हैं, उनमें से कुछ को छोड़ दें तो बाकी की रिपोर्ट लटक जाती है। इनको पाने के लिए महकमा लैैब के बीच रिमाइंडर का दौर शुरू हो जाता है।
यह भी बिसरा
- मृतक के लीवर का टुकड़ा
- किडनी
- स्पलीन (तिल्ली)
- स्टामक (खाने की थैली)
- छोटी आंत का टुकड़ा
मुकदमा चलने के दौरान न्यायालय के आदेश पर बिसरा की दोबारा जांच कराई जाती है, इसीलिए सभी को सुरक्षित रख लिया जाता है। सीएमओ से जल्द ही वार्ता कर गैर जरूरी बिसरा का निस्तारण कराने के निर्देश दिए जाएंगे। पोस्टमार्टम हाउस में रखे गैर जरूरी बिसरा के लिए सीएमओ से वार्ता की जाएगी। जल्द ही इनका निस्तारण कराया जाएगा।
डॉ. एसबी मिश्रा, अपर निदेशक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण
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झांसी। सैकड़ों लोगों की मौत का राज पोस्टमार्टम हाउस के कमरे में रखी बोतलों में बंद पड़ा हुआ है। यह सुनकर अचंभा जरूर हुआ होगा, लेकिन सच्चाई तो यही है। बोतलों में बंद करके जिनका बिसरा जांच के लिए भेजा गया था या रखा गया था, उनकी जांच रिपोर्ट आज तक नहीं आई है। इस कारण मौतों का खुलासा नहीं हो सका। कभी बिसरा जांच का नाम लेकर इनके परिजनों को जल्द खुलासे का आश्वासन देने वाली पुलिस भी इन्हें भूल गई है।
वर्ष 2012 में थाना शाहजहांपुर के जंगलों में एक युवती की लाश मिली थी। पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने के बाद शव का बिसरा सुरक्षित रख लिया था। परिजनों को भी अब शायद इस बात का अंदाजा न हो कि उनकी बेटी की मौत का राज पोस्टमार्टम हाउस के एक कमरे में रखी बोतले में सड़ चुका है। इस युवती की तरह सैकड़ों मौतों का राज भी ऐसे ही बोेतलेे में दफन है। बताया गया है कि पोस्टमार्टम हाउस में हर साल करीब सौ से लेकर डेढ़ सौ लाशों का बिसरा संरक्षित होता है। मगर, इनमें से पांच फीसद के करीब ही जांच के लिए जा पाते हैं। सूत्रों से पता चला है कि 2009 से अब तक पोस्टमार्टम हाउस की बोतलों में करीब 2200 बिसरा रखे हुए हैं।
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झांसी जिले के साथ ललितपुर, महोबा, जालौैन व आसपास के अन्य इलाकों के भी बिसरा यहां मौजूद हैं। ये उनके बिसरा हैं जो बाहरी जिलों से रेफर होने के बाद झांसी मेडिकल कॉलेज मेें दम तोड़ देते हैं। यहां झांसी मेडिकल कॉलेज में पोस्टमार्टम के बाद उनका बिसरा सुरक्षित कर लिया जाता है। संबंधित थाना पुलिस इन्हें संरक्षित कराकर भूल चुकी है। कइयों के बिसरा तो खराब भी हो गए हैं। कुछ डिब्बों को तो चूहों ने भी कुतर दिया है। ऐसे में शायद ही इनकी जांच से अब र्कोई नतीजा निकल सके।
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कब होती है बिसरा जांच
शराब से हुई मौत, जहरखुरानी या फिर ऐसा मामला जिसमें मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सके। इनके खुलासे के लिए बिसरा जांच कराई जाती है। छोटी आंत, आंत लीवर, गुर्दे को जांच के लिए भेजा जाता है। झंझटों से बचने के लिए अधिकांश मामलों में बिसरा परीक्षण के लिए भेजा ही नहीं जाता है।
यह करती है पुलिस
पुलिस केस में पोस्टमार्टम की रिपोर्ट तो लगा देती है साथ बिसरा सुरक्षित रखने की बात भी लिख देती है, लेकिन जांच रिपोर्ट सालों तक कोर्ट में पेश नहीं की जाती। कई बार पीड़ित और आरोपी पक्ष के बीच समझौता हो जाता है। नियमानुसार पुलिस को बिसरा तीस दिन के अंदर फोरेंसिक लैब में भेज देना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है।
प्रदेश में दो ही लैब
बिसरा जांच के लिए प्रदेश के आगरा व लखनऊ में ही फोरेंसिक लैब है। ऐसे में इन पर काफी भार है। सूत्रों की मानें तो बिसरा जांच के लिए भेजे जाते हैं, उनमें से कुछ को छोड़ दें तो बाकी की रिपोर्ट लटक जाती है। इनको पाने के लिए महकमा लैैब के बीच रिमाइंडर का दौर शुरू हो जाता है।
यह भी बिसरा
- मृतक के लीवर का टुकड़ा
- किडनी
- स्पलीन (तिल्ली)
- स्टामक (खाने की थैली)
- छोटी आंत का टुकड़ा
मुकदमा चलने के दौरान न्यायालय के आदेश पर बिसरा की दोबारा जांच कराई जाती है, इसीलिए सभी को सुरक्षित रख लिया जाता है। सीएमओ से जल्द ही वार्ता कर गैर जरूरी बिसरा का निस्तारण कराने के निर्देश दिए जाएंगे। पोस्टमार्टम हाउस में रखे गैर जरूरी बिसरा के लिए सीएमओ से वार्ता की जाएगी। जल्द ही इनका निस्तारण कराया जाएगा।
डॉ. एसबी मिश्रा, अपर निदेशक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण