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Jhansi News: मल्लखंभ से खिलाड़ी लिख रहे सफलता की नई इबारत
Mon, 15 Jun 2026 02:32 AM IST
झांसी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
Updated Mon, 15 Jun 2026 02:32 AM IST
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झांसी। लकड़ी के खंभे पर कठिन संतुलन और कलात्मक मुद्राओं से शरीर को मजबूत और लचीला बनाने वाली विधा को मल्लखंभ कहा जाता है। खंभे पर हवा से बातें करता शरीर, पलभर में बदलती मुद्राएं, गजब का संतुलन और चेहरे पर आत्मविश्वास... यह सिर्फ एक खेल का दृश्य ही नहीं, उन सपनों की भी तस्वीर है जिन्हें मल्लखंभ खिलाड़ी रोज पसीने से सींच रहे हैं। जिले के कई खिलाड़ी राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर पदक जीत चुके हैं।
कोच हरिशंकर कुशवाहा ने बताया कि मल्लखंभ केवल खेल नहीं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम है। उन्होंने कहा, जो बच्चे पहले झिझकते थे, आज वही आत्मविश्वास के साथ राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रहे हैं। यह खेल शरीर को मजबूत करने के साथ मानसिक मजबूती भी देता है। कोच केशव कुमार ने बताया कि हमारे कई खिलाड़ियों ने अच्छे स्तर पर नाम कमाया है और आगे भी संभावनाएं हैं। मल्लखंभ दिवस उन खिलाड़ियों की मेहनत को सलाम करने का अवसर है, गिरकर उठते हैं, दर्द सहते हैं और फिर नई ऊर्जा के साथ खंभे पर चढ़ जाते हैं।
पहली बार खंभे पर चढ़े तो लगा था डर
- राष्ट्रीय खिलाड़ी चंचल पाठक ने बताया कि जब पहली बार खंभे पर चढ़े थे तो डर लगता था, शरीर कांपता था, लेकिन लगातार मेहनत और कोच के मार्गदर्शन ने हमें मजबूत बनाया। आज जब बड़े मंचों पर प्रदर्शन करते हैं तो लगता है कि मेहनत रंग ला रही है। राष्ट्रीय मल्लखंभ प्रतियोगिता में रजत पदक और पोल मल्लखंभ में कांस्य पदक जीत चुकी हूं।
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हर दिन बेहतर बनाने की जिद ने आगे बढ़ाया
- खिलाड़ी शिवानी पाठक ने बताया कि शरीर की ताकत से ज्यादा जरूरी मानसिक एकाग्रता और संतुलन होता है। घंटों तक अभ्यास, चोटों का सामना और खुद को हर दिन बेहतर बनाने की जिद ही आगे बढ़ाती है। खेलो इंडिया विश्वविद्यालय खेल में कांस्य पदक जीत चुकी हूं।
बड़े खिलाड़ियों से मिलती है मेहनत करने की प्रेरणा
-खिलाड़ी इति तिवारी ने बताया कि मल्लखंभ ने मेरी जिंदगी बदल दी। पहले आत्मविश्वास कम था, लेकिन इस खेल ने मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाया। जब बड़े खिलाड़ियों को पदक जीतते देखते हैं तो और मेहनत करने की प्रेरणा मिलती है। खेलाे इंडिया विश्वविद्यालय खेल में कांस्य पदक हासिल कर चुकी हूं।
कई बार चोटें भी लगती हैं
-खिलाड़ी स्प्रभा तिवारी ने बताया कि लोगों को लगता है कि मल्लखंभ आसान खेल है, लेकिन इसमें शरीर का संतुलन, साहस और फोकस बहुत जरूरी होता है। कई बार चोटें भी लगती हैं, लेकिन जब पदक मिलता है तो सारी मेहनत सफल हो जाती है। मल्लखंभ ने हमें अनुशासन और हार न मानने की सीख दी है। लखनऊ में खेलो इंडिया विश्वविद्यालय खेल में कांस्य पदक जीत चुकी हूं।
अंतरराष्ट्रीय मल्लखंभ दिवस : मल्लखंभ का इतिहास महाराष्ट्र से लगभग ढाई सौ वर्ष पुराना माना जाता है। विशेषज्ञों ने बताया कि झांसी में मल्लखंभ की शुरुआत वर्ष 1933 में श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर से मानी जाती है। यहां से प्रशिक्षण लेकर कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर तक शानदार प्रदर्शन करते हुए कई पदक हासिल किए और शहर का नाम रोशन किया। वर्तमान में श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर में लगभग 140 छात्र-छात्राएं नियमित प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। लगभग 13 प्रशिक्षित मल्लखंभ खिलाड़ी ऐसे हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
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कोच हरिशंकर कुशवाहा ने बताया कि मल्लखंभ केवल खेल नहीं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम है। उन्होंने कहा, जो बच्चे पहले झिझकते थे, आज वही आत्मविश्वास के साथ राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रहे हैं। यह खेल शरीर को मजबूत करने के साथ मानसिक मजबूती भी देता है। कोच केशव कुमार ने बताया कि हमारे कई खिलाड़ियों ने अच्छे स्तर पर नाम कमाया है और आगे भी संभावनाएं हैं। मल्लखंभ दिवस उन खिलाड़ियों की मेहनत को सलाम करने का अवसर है, गिरकर उठते हैं, दर्द सहते हैं और फिर नई ऊर्जा के साथ खंभे पर चढ़ जाते हैं।
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पहली बार खंभे पर चढ़े तो लगा था डर
- राष्ट्रीय खिलाड़ी चंचल पाठक ने बताया कि जब पहली बार खंभे पर चढ़े थे तो डर लगता था, शरीर कांपता था, लेकिन लगातार मेहनत और कोच के मार्गदर्शन ने हमें मजबूत बनाया। आज जब बड़े मंचों पर प्रदर्शन करते हैं तो लगता है कि मेहनत रंग ला रही है। राष्ट्रीय मल्लखंभ प्रतियोगिता में रजत पदक और पोल मल्लखंभ में कांस्य पदक जीत चुकी हूं।
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हर दिन बेहतर बनाने की जिद ने आगे बढ़ाया
- खिलाड़ी शिवानी पाठक ने बताया कि शरीर की ताकत से ज्यादा जरूरी मानसिक एकाग्रता और संतुलन होता है। घंटों तक अभ्यास, चोटों का सामना और खुद को हर दिन बेहतर बनाने की जिद ही आगे बढ़ाती है। खेलो इंडिया विश्वविद्यालय खेल में कांस्य पदक जीत चुकी हूं।
बड़े खिलाड़ियों से मिलती है मेहनत करने की प्रेरणा
-खिलाड़ी इति तिवारी ने बताया कि मल्लखंभ ने मेरी जिंदगी बदल दी। पहले आत्मविश्वास कम था, लेकिन इस खेल ने मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाया। जब बड़े खिलाड़ियों को पदक जीतते देखते हैं तो और मेहनत करने की प्रेरणा मिलती है। खेलाे इंडिया विश्वविद्यालय खेल में कांस्य पदक हासिल कर चुकी हूं।
कई बार चोटें भी लगती हैं
-खिलाड़ी स्प्रभा तिवारी ने बताया कि लोगों को लगता है कि मल्लखंभ आसान खेल है, लेकिन इसमें शरीर का संतुलन, साहस और फोकस बहुत जरूरी होता है। कई बार चोटें भी लगती हैं, लेकिन जब पदक मिलता है तो सारी मेहनत सफल हो जाती है। मल्लखंभ ने हमें अनुशासन और हार न मानने की सीख दी है। लखनऊ में खेलो इंडिया विश्वविद्यालय खेल में कांस्य पदक जीत चुकी हूं।
अंतरराष्ट्रीय मल्लखंभ दिवस : मल्लखंभ का इतिहास महाराष्ट्र से लगभग ढाई सौ वर्ष पुराना माना जाता है। विशेषज्ञों ने बताया कि झांसी में मल्लखंभ की शुरुआत वर्ष 1933 में श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर से मानी जाती है। यहां से प्रशिक्षण लेकर कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर तक शानदार प्रदर्शन करते हुए कई पदक हासिल किए और शहर का नाम रोशन किया। वर्तमान में श्री लक्ष्मी व्यायाम मंदिर में लगभग 140 छात्र-छात्राएं नियमित प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। लगभग 13 प्रशिक्षित मल्लखंभ खिलाड़ी ऐसे हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।