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Pitru Paksha 2023: जिंदा हैं...इन्हें कोई न करता याद, मरने के बाद कैसा तर्पण, कैसा श्राद्ध; बुजुर्गों का दर्द

Fri, 29 Sep 2023 10:44 AM IST
शाहरुख खान अनीता वर्मा, अमर उजाला, झांसी
अनीता वर्मा, अमर उजाला, झांसी Published by: शाहरुख खान Updated Fri, 29 Sep 2023 10:44 AM IST
सार

Pitru Paksha 2023: झांसी में वृद्धाश्रम में कई बेसहारा बुजुर्ग गुमनाम जिंदगी में मुंह छिपा कर रोते हैं। कई बुजुर्ग बिल्कुल बेसहारा हैं, उनके बाद कोई इनका नाम लेने वाला भी नहीं है। वह बताते हैं कि मां-बाप की मौत के बाद सारे रिश्ते-नातेदार उनसे दूर हो गए। सबने दुत्कार दिया, कोई दो रोटी तक नहीं दे सका। अब जिंदगी के बाद क्या होगा, उनका क्रिया कर्म और श्राद्ध कौन करेगा...उन्होंने ये सोचना भी छोड़ दिया है।

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Pitru Paksha 2023 Start Date Tarpan Vidhi Mantra Pind Daan Puja Pain of elder living in old age home in Jhansi
Pitru Paksha 2023 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पितृ पक्ष शुरू हो गए हैं। घर-घर लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए सुबह उठकर काले तिल, फूल और चावल के साथ उन्हें जल अर्पित करेंगे, ताकि उनके पूर्वज जहां भी हों, उन्हें शांति मिले।
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इतना ही नहीं पूर्वजों के श्राद्ध के लिए पंडितों को भोज कराया जाएगा, उन्हें वस्त्र और दान दक्षिणा दी जाएगी और तो और परिवार के लोग जिन भूले-भटके पितरों के बारे में नहीं जानते, अमावस्या के दिन उनका भी तर्पण और श्राद्ध करेंगे लेकिन वृद्धाश्रमों में रह रहे असहाय बुजुर्गों की मौत के बाद उनका तर्पण कौन करेगा, इस सवाल पर वृद्धाश्रम में जीते जी गुमनान जिंदगी काट रहे बुजुर्ग अपना मुंह छिपा लेते हैं। उनकी आंखों में आंसू डबडबा जाते हैं।
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शहर में सिद्धेश्वर नगर के वृद्धाश्रम में रह रहे 90 से अधिक बुजुर्गों का हाल भी ऐसा ही है। इनमें से कई बुजुर्ग बिल्कुल बेसहारा हैं, उनके बाद कोई इनका नाम लेने वाला भी नहीं है। वह बताते हैं कि मां-बाप की मौत के बाद सारे रिश्ते-नातेदार उनसे दूर हो गए। 
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सबने दुत्कार दिया, कोई दो रोटी तक नहीं दे सका। अब जिंदगी के बाद क्या होगा, उनका क्रिया कर्म और श्राद्ध कौन करेगा...उन्होंने ये सोचना भी छोड़ दिया है। वह बताते हैं कि जिंदा में कोई पूछने नहीं आता है, मरने के बाद किससे आशा करें।

उधर, वृद्धाश्रम की प्रबंधक अनुराधा चौहान और सहायक प्रबंधक प्रमोद शर्मा बता रहे हैं कि आश्रम की और से अब तक 10 -12 लोगों का अंतिम संस्कार किया जा चुका है। प्रमोद शर्मा ने बताया कि क्रिया-कर्म के बाद हवन और भंडारा कर दिया जाता है। जबकि श्राद्ध और पितृ पक्ष में जल अर्पण करना तो परिवार की परंपरा होती है।

उन्होंने बताया कि अकेले बुजुर्ग कई बार बहुत परेशान होते हैं, वह अपने बारे में सोचने लगते हैं। रोते हैं, जब आश्रम में किसी की मृत्यु हो जाती है तो इन्हें संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है...।

जिंदगी के अंतिम दिन भी कट जाएंगे
वृद्धाश्रम में तकरीबन चार साल से रह रहे तिलयानी बजरिया के बुजुर्ग बृजेंद्र रावत अविवाहित हैं। घर की परिस्थितियों के चलते माता-पिता के गुजरने के बाद उन्होंने शादी नहीं की। धीरे-धीरे परिवार और नाते-रिश्तेदार भी दूर हो गए। वह बेसहारा हो गए तो वृद्धाश्रम तक पहुंच गए। चार साल से वह इसी आश्रम में रहकर अपना जीवन काट रहे हैं।

कोई उनसे पूछता है कि अब जिंदगी के बाद क्या होगा, तो वह कहते हैं कि भगवान पर भरोसा है। बाकी तो अब कोई नहीं है। जिंदगी के अंतिम दिन ऐसे ही कट जाएंगे। वह कहते हैं कि अपने दिल का दर्द किससे कहें क्योंकि वृद्धाश्रम में सभी दुखियारे हैं, लेकिन रोने का मन करता है तो भगवान की पूजा कर मन हल्का कर लेते हैं।
 

डरती हैं... उन्हें कुछ हो गया था तो बीमार भाई का क्या होगा
सीपरी बाजार की महिला जानकी तकरीबन छह साल से वृद्धाश्रम में रह रही हैं। उनका विवाह नहीं हुआ। वह कहती हैं कि अब वृद्धाश्रम में रहने वाले साथी ही उनका परिवार हैं। वह अपने भाई दीना राजू के साथ वृद्धाश्रम आईं थीं। भाई की भी शादी नहीं हुई। दोनों भाई-बहन एक-दूसरे का दुख-सुख बांटते हैं। वह बताते हैं कि माता-पिता की मौत के बाद सभी अपने उन्हें असहाय छोड़ गए।

जिंदगी मुश्किल हो गई तो वृद्धाश्रम चले आए। अब तो दूर-दराज के रिश्तेदार भी भूल चुके हैं। कोई मिलने-जुलने नहीं आता। जानकी बताती हैंं कि बीते दिन याद आते हैं तो मुंह छिपाकर रोना पड़ता है, ताकि भाई को दुख न हो। डरती हैंं कि उन्हें कुछ हो गया था तो बीमार भाई का क्या होगा...।
 

मरने के बाद भगवान ही सहारा है
कलारी की रहने वाली रत्नाबाई बेसहारा हैं। पति के बाद सभी अपने उनसे दूर हो गए। रहने-खाने की परेशानी हो गई तो आस-पड़ोस के लोग मदद करने लगे, लेकिन वो भी कितने दिन मदद करते। एक दिन लोग वृद्धाश्रम तक पहुंचा गए। रत्नाबाई तकरीबन छह साल से यहीं जिंदगी के दिन काट रही हैं।

उनके जाने के बाद उनका अंतिम संस्कार कौन करेगा। यह सुनकर रत्नाबाई ही नहीं आश्रम में रहने वाले सभी बुजुर्ग की आंखों में आंसू आ जाते हैं। वह कहते हैं कि जिंदगी जिंदा में बेसहारा कट रही है, मरने के बाद भगवान ही सहारा है। ऊपर वाला ही उन्हें मोक्ष देगा।
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