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कैसे होगा बुंदेलखंड की संस्कृति का प्रचार, रखवालों ने ही बंद किए ‘द्वार’
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झांसी। संस्कृति विभाग के आला अफसरों की उदासीनता बुंदेलखंड की संस्कृति पर भारी पड़ रही है। मूल कार्यालय बंद होने से बुंदेलखंड धीरे - धीरे अपनी लोक नृत्य, कला संस्कृति से दूर होता चला रहा है। संस्कृति विभाग का क्षेत्रीय कार्यालय के सक्रिय न होने से कलाकारों को भी नहीं पता कि उन्हें आगे बढ़ने के अवसर कैसेे मिलेंगे। यही, वजह है कि आज मामुलिया, झिंझिया, पाई डंडा, रामा श्यामा, बारहमासी आदि लोक विधाआें के प्रति उत्साह युवाओं में खत्म होता जा रहा है।
सांस्कृतिक रूप से बुंदेलखंड काफी समृद्ध है। लगभग सभी गांवों में आल्हा गायन, स्वांग, ढिमरयाई, राई नृत्यों सहित अन्य विद्याओं के कलाकार बहुतायत होते थे। इन्हें तलाशने और तराशने के लिए सिर्फ छह वर्ष पहले तक ही राजकीय संग्रहालय परिसर में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र सक्रिय था। कलाकारों को प्रशिक्षण दिया जाता था। देश के कई छोटे - बडे़ महोत्सवों में इन्हें भेजा जाता था। वरिष्ठ बुजुर्ग कलाकारों को पेंशन देने की प्रक्रिया भी हुई थी। लेकिन यह सभी वर्ष 2014 के बाद ठंडे बस्ते में चले गए। किसी नए अधिकारी की तैनाती न होने के कारण मूल कार्यालय भी बंद हो गया है। संग्रहालय उप निदेशक को केंद्र का प्रभार सौंप कर निदेशालय ने भी इतिश्री कर ली। वर्तमान में हाल यह है कि कलाकारों को भी नहीं मालूम कि केंद्र का दफ्तर कहां है। हालांकि संग्रहालय के सूचना बोर्ड पर आज भी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र अंकित है।
यह कहना है कलाकारों का
वरिष्ठ बुंदेली लोकविद् पन्नालाल असर ने कहा कि सांस्कृतिक केंद्र के न होने से स्थानीय कलाकारों को आर्थिक नुकसान हो रहा है और उनकी प्रतिभा भी विलुप्त हो रही है। गुमनामी के अंधेरे में उनकी प्रतिभा गुम हो रही है। वरिष्ठ बुंदेली कलाकार देवदत्त बुधौलिया के अनुसार सांस्कृतिक गतिविधियाें का पूरी तरह से अभाव है। कलाकारों को पता होना चाहिए कि उन्हें सांस्कृतिक विभाग से क्या मदद मिल सकती है। कलाकारों को पंजीयन के लिए लखनऊ तक दौड़ लगानी पड़ती है। जबकि यह शहर में ही होना चाहिए था। यह व्यवस्था पहले थी। वरिष्ठ बुंदेली कलाकार शीलू पंडित के अनुसार कलाकारों को कोई कार्यक्रम नहीं मिल पा रहे हैं। आर्थिक आय भी हो जाती थी। लेकिन अब हम सभी निराश और परेशान हैं। आवश्यकता है कि संस्कृति केंद्र का कार्यालय सक्रिय हो।
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कलाकारों एवं लोक कला संस्कृति को प्रोत्साहन के लिए विभाग से जो कार्यक्रम तय होते हैं, वह कराए जाते हैं। इस बार तीन कार्यक्रम मिले हैं, जो कराए जाएंगे।
आशा पांडेय, उपनिदेशक राजकीय संग्रहालय एवं प्रभारी क्षेत्रीय संस्कृति केंद्र
मौनी बाबा मेला का होगा आयोजन
झांसी मंडल में सांस्कृतिक निदेशालय जनवरी से मार्च तक तीन सांस्कृतिक कार्यक्रम कराएगा। इनमें मौनी बाबा मेला, फाग गायन और बुंदेली सेहरा व राई नृत्य है। विभागीय जानकारी के अनुसार मंडल के तीनों जिलों में एक - एक कार्यक्रम होगा। इसमें स्थानीय कलाकारों के दल अपनी प्रस्तुति देंगे।
संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव और निदेशक से बातचीत कर उनसे क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र को सक्रिय करने की कार्रवाई को कहा जाएगा। साथ ही, मांग की जाएगी, कि बुंदेली कलाकारों को मानदेय दिया जाए और अधिक से अधिक सांस्कृतिक कार्यक्रम हो।
हरगोविंद कुशवाहा, उपाध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान
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सांस्कृतिक रूप से बुंदेलखंड काफी समृद्ध है। लगभग सभी गांवों में आल्हा गायन, स्वांग, ढिमरयाई, राई नृत्यों सहित अन्य विद्याओं के कलाकार बहुतायत होते थे। इन्हें तलाशने और तराशने के लिए सिर्फ छह वर्ष पहले तक ही राजकीय संग्रहालय परिसर में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र सक्रिय था। कलाकारों को प्रशिक्षण दिया जाता था। देश के कई छोटे - बडे़ महोत्सवों में इन्हें भेजा जाता था। वरिष्ठ बुजुर्ग कलाकारों को पेंशन देने की प्रक्रिया भी हुई थी। लेकिन यह सभी वर्ष 2014 के बाद ठंडे बस्ते में चले गए। किसी नए अधिकारी की तैनाती न होने के कारण मूल कार्यालय भी बंद हो गया है। संग्रहालय उप निदेशक को केंद्र का प्रभार सौंप कर निदेशालय ने भी इतिश्री कर ली। वर्तमान में हाल यह है कि कलाकारों को भी नहीं मालूम कि केंद्र का दफ्तर कहां है। हालांकि संग्रहालय के सूचना बोर्ड पर आज भी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र अंकित है।
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यह कहना है कलाकारों का
वरिष्ठ बुंदेली लोकविद् पन्नालाल असर ने कहा कि सांस्कृतिक केंद्र के न होने से स्थानीय कलाकारों को आर्थिक नुकसान हो रहा है और उनकी प्रतिभा भी विलुप्त हो रही है। गुमनामी के अंधेरे में उनकी प्रतिभा गुम हो रही है। वरिष्ठ बुंदेली कलाकार देवदत्त बुधौलिया के अनुसार सांस्कृतिक गतिविधियाें का पूरी तरह से अभाव है। कलाकारों को पता होना चाहिए कि उन्हें सांस्कृतिक विभाग से क्या मदद मिल सकती है। कलाकारों को पंजीयन के लिए लखनऊ तक दौड़ लगानी पड़ती है। जबकि यह शहर में ही होना चाहिए था। यह व्यवस्था पहले थी। वरिष्ठ बुंदेली कलाकार शीलू पंडित के अनुसार कलाकारों को कोई कार्यक्रम नहीं मिल पा रहे हैं। आर्थिक आय भी हो जाती थी। लेकिन अब हम सभी निराश और परेशान हैं। आवश्यकता है कि संस्कृति केंद्र का कार्यालय सक्रिय हो।
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कलाकारों एवं लोक कला संस्कृति को प्रोत्साहन के लिए विभाग से जो कार्यक्रम तय होते हैं, वह कराए जाते हैं। इस बार तीन कार्यक्रम मिले हैं, जो कराए जाएंगे।
आशा पांडेय, उपनिदेशक राजकीय संग्रहालय एवं प्रभारी क्षेत्रीय संस्कृति केंद्र
मौनी बाबा मेला का होगा आयोजन
झांसी मंडल में सांस्कृतिक निदेशालय जनवरी से मार्च तक तीन सांस्कृतिक कार्यक्रम कराएगा। इनमें मौनी बाबा मेला, फाग गायन और बुंदेली सेहरा व राई नृत्य है। विभागीय जानकारी के अनुसार मंडल के तीनों जिलों में एक - एक कार्यक्रम होगा। इसमें स्थानीय कलाकारों के दल अपनी प्रस्तुति देंगे।
संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव और निदेशक से बातचीत कर उनसे क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र को सक्रिय करने की कार्रवाई को कहा जाएगा। साथ ही, मांग की जाएगी, कि बुंदेली कलाकारों को मानदेय दिया जाए और अधिक से अधिक सांस्कृतिक कार्यक्रम हो।
हरगोविंद कुशवाहा, उपाध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान