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अति आत्मविश्वास और कार्यकर्ताओें की बेरुखी से हार गए भाजपा के यज्ञदत्त
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झांसी। अति आत्मविश्वास और कार्यकर्ताओं की बेरुखी की वजह से पिछले चौबीस साल से जीत का परचम लहराने वाले भाजपा के यज्ञदत्त शर्मा हार गए। पिछले चार चुनाव से लगातार जीत हासिल करती आ रही भाजपा को इस बार इलाहाबाद - झांसी खंड स्नातक चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। पूरी तरह से माहौल अनुकूल होने के बाद भी भाजपा को मिली इस हार ने बड़ा संदेश देने का काम किया है।
भाजपा के टिकट पर डॉ. यज्ञदत्त शर्मा पिछले चार बार से एमएलसी चुनाव जीतते आ रहे हैं। यही वजह है उनकी जीत को लेकर इस बार भी भाजपाई पूरी तरह से आश्वस्त थे। केंद्र और प्रदेश में सरकार होने के साथ-साथ इस सीट की ज्यादातर विधानसभाओं की भाजपाई ही नुमाइंदगी कर रहे थे। पूरी तरह से माहौल अनुकूल होने की वजह से भाजपाइयों को इस बात का जरा सा भी भान नहीं था कि उन्हें हार का मुंह भी देखना पड़ सकता है। यही वजह है कि भाजपाइयों ने वोटर बनने और बनाने में कोई खास सक्रियता नहीं दिखाई। यहां तक कि भाजपा के कई दिग्गज नेता खुद भी वोटर नहीं बने। हालांकि, नामांकन के बाद भाजपाई सक्रिय हुए और जगह-जगह बूथ सम्मेलन आयोजित किए गए। लेकिन इन सम्मेलनों में ज्यादातर वो वोटर मौजूद रहे, जो किसी अन्य प्रत्याशी की कोशिशों से वोटर बने थे।
इसके अलावा भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं की एक शिकायत ये भी रही कि उन्हें चुने हुए प्रतिनिधि खास तवज्जो नहीं देेते हैं। चुनाव के पहले तक तो साथ लेकर चलते हैं, लेकिन चुनाव के बाद सत्ता में आते ही उनके इर्दगिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा हो जाता है, जिनका पार्टी से कोई वास्ता नहीं होता। यही वजह रही कि ज्यादातर कार्यकर्ता भी इस चुनाव में पूरी तरह से हथियार डाले रहे। उनकी सक्रियता केवल चेहरा दिखाने तक ही सीमित रही।
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स्पष्ट रणनीति से दौड़ी मानसिंह की साइकिल
झांसी। समाजवादी पार्टी के डॉ. मानसिंह यादव स्पष्ट रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरे। उनका पहला फोकस वोटर बनाने पर रहा। इसके लिए उन्होंने पार्टी फोरम का भरपूर इस्तेमाल किया। पहले उन्होंने ज्यादा से ज्यादा स्नातक शिक्षित लोगों को वोटर बनाया। इसमें खास ध्यान पार्टी से जुड़े लोगों को वोटर बनाने पर रहा। इसके बाद डॉ. मानसिंह लगातार किसी न किसी माध्यम से वोटरों के संपर्क में बने रहे। यही वजह है कि प्रथम वरीयता में मिले वोटों में सपा प्रत्याशी बढ़त बनाने में कामयाब हो गए। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के संगठन से जुड़े लोग भी लगातार सक्रिय बने रहे। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद आए इस चुनाव में सपाइयों की सक्रिय भागीदारी रही। इसी रणनीति से सपा भाजपा के किले में सेंध लगाकर जीत हासिल करने में कामयाब हो गई।
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भाजपा के टिकट पर डॉ. यज्ञदत्त शर्मा पिछले चार बार से एमएलसी चुनाव जीतते आ रहे हैं। यही वजह है उनकी जीत को लेकर इस बार भी भाजपाई पूरी तरह से आश्वस्त थे। केंद्र और प्रदेश में सरकार होने के साथ-साथ इस सीट की ज्यादातर विधानसभाओं की भाजपाई ही नुमाइंदगी कर रहे थे। पूरी तरह से माहौल अनुकूल होने की वजह से भाजपाइयों को इस बात का जरा सा भी भान नहीं था कि उन्हें हार का मुंह भी देखना पड़ सकता है। यही वजह है कि भाजपाइयों ने वोटर बनने और बनाने में कोई खास सक्रियता नहीं दिखाई। यहां तक कि भाजपा के कई दिग्गज नेता खुद भी वोटर नहीं बने। हालांकि, नामांकन के बाद भाजपाई सक्रिय हुए और जगह-जगह बूथ सम्मेलन आयोजित किए गए। लेकिन इन सम्मेलनों में ज्यादातर वो वोटर मौजूद रहे, जो किसी अन्य प्रत्याशी की कोशिशों से वोटर बने थे।
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इसके अलावा भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं की एक शिकायत ये भी रही कि उन्हें चुने हुए प्रतिनिधि खास तवज्जो नहीं देेते हैं। चुनाव के पहले तक तो साथ लेकर चलते हैं, लेकिन चुनाव के बाद सत्ता में आते ही उनके इर्दगिर्द ऐसे लोगों का जमावड़ा हो जाता है, जिनका पार्टी से कोई वास्ता नहीं होता। यही वजह रही कि ज्यादातर कार्यकर्ता भी इस चुनाव में पूरी तरह से हथियार डाले रहे। उनकी सक्रियता केवल चेहरा दिखाने तक ही सीमित रही।
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स्पष्ट रणनीति से दौड़ी मानसिंह की साइकिल
झांसी। समाजवादी पार्टी के डॉ. मानसिंह यादव स्पष्ट रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरे। उनका पहला फोकस वोटर बनाने पर रहा। इसके लिए उन्होंने पार्टी फोरम का भरपूर इस्तेमाल किया। पहले उन्होंने ज्यादा से ज्यादा स्नातक शिक्षित लोगों को वोटर बनाया। इसमें खास ध्यान पार्टी से जुड़े लोगों को वोटर बनाने पर रहा। इसके बाद डॉ. मानसिंह लगातार किसी न किसी माध्यम से वोटरों के संपर्क में बने रहे। यही वजह है कि प्रथम वरीयता में मिले वोटों में सपा प्रत्याशी बढ़त बनाने में कामयाब हो गए। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के संगठन से जुड़े लोग भी लगातार सक्रिय बने रहे। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद आए इस चुनाव में सपाइयों की सक्रिय भागीदारी रही। इसी रणनीति से सपा भाजपा के किले में सेंध लगाकर जीत हासिल करने में कामयाब हो गई।