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UP: अधूरी रह गई आखिरी वक्त में बचपन के दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने की आस... ट्रेन में टूटी बुजुर्ग की सांस

Mon, 01 Jan 2024 02:00 PM IST
शाहरुख खान विकास सनाढ्य, अमर उजाला, झांसी
विकास सनाढ्य, अमर उजाला, झांसी Published by: शाहरुख खान Updated Mon, 01 Jan 2024 02:00 PM IST
सार

झांसी के रहने वाले बुजुर्ग शहादत अली की बचपन के दोस्तों और रिश्तदारों से आखिरी बार मिलने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी। मुंबई से लौटते समय झांसी के पास बांद्रा टर्मिनस झांसी विशेष सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेन में बुजुर्ग ने दम तोड़ दिया। 

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old man wish to meet his childhood friends and relatives for last time could not be fulfilled in Jhansi
बुजुर्ग की ट्रेन में मौत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिंदगी के अंतिम पड़ाव में अपने गांव और अपनों के बीच आखिरी सांस लेने की एक वृद्ध की आस अधूरी रह गई। बचपन के दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच आखिरी वक्त बिताने का ख्वाब लिए वे ट्रेन से मुंबई से झांसी के लिए रवाना हुए, लेकिन बीच सफर में ही जिंदगी की डोर टूट गई। 
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15 साल पहले मोंठ के गांव अमरा निवासी शहादत अली (76) मुंबई चले गए थे। ट्रक मैकेनिक का काम करके उन्होंने अपने परिवार को बेहतर जीवन दिया। वक्त के साथ-साथ शहादत अली की उम्र ढलने लगी और उन्होंने काम छोड़ दिया। पिछले कुछ दिनों से वे बीमार रहने लगे। जब सेहत ज्यादा खराब होती तो उनको गांव की याद सताती। 
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उन्होंने अपने बेटे रहीम अली से एक बार गांव ले चलने की इच्छा जताई। इस पर बेटा, बहू और पत्नी शहादत अली को 30 दिसंबर को बांद्रा टर्मिनस झांसी विशेष सुपरफास्ट एक्सप्रेस से लेकर झांसी आ रहे थे। 
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ट्रेन को रविवार 31 दिसंबर को सुबह पांच बजे झांसी पहुंचना था, लेकिन ग्वालियर-दतिया के बीच अचानक शहादत अली की तबीयत बिगड़ गई। परिजनों ने ट्रेन के स्टाफ को जानकारी दी। ट्रेन जब तक झांसी पहुंची तब तक वृद्ध की मौत हो गई। जीआरपी ने पंचनामा भरकर शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

गांव से था बहुत लगाव

बेटे रहीम अली ने बताया कि पिता को गांव से बहुत लगाव था। उनकी गांव में अपने बचपन के दोस्तों और रिश्तेदारों से बात होती रहती थी। जब तबीयत ज्यादा खराब रहने लगी तो गांव में एक बार सबसे मिलने के लिए कहने लगे। लेकिन गांव पहुंचने से पहले ही उनका इंतकाल हो गया।
 

जहां ट्रेन रुकी, वहां पूछा गांव आ गया क्या

बेटे ने बताया कि जब ट्रेन से झांसी के लिए निकले तो पिता के चेहरे पर अलग ही चमक थी। उनकी अपने गांव को जाने की मुराद जो पूरी हो जा रही थी। पूरे रास्ते बच्चों और पत्नी को बचपन की गांव की यादों से रूबरू कराते रहे। कई दोस्तों के बारे में भी चर्चा की। ट्रेन जिस भी स्टेशन पर रुकती वहां पूछते कि गांव आ गया क्या? वृद्ध की मौत के बाद परिजनों में कोहराम है।
 
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