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जांच की एक भी मशीन नहीं थी, कम संसाधन के बीच भी कोरोना से मजबूती से लड़ा झांसी
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झांसी। देशभर में कोरोना वायरस के मरीज फरवरी से मिलने शुरू हो गए थे। झांसी समेत बुंदेलखंड में कोरोना वायरस की दस्तक अप्रैल से हुई। तब तक बुंदेलखंड के किसी भी जिले में कोरोना जांच की मशीन तक नहीं थी। साथ ही वेंटिलेटर से लेकर बेड और स्टाफ की भी संख्या काफी कम थी। सीमित संसाधनों के बावजूद झांसी कोरोना से मजबूती से लड़ा। मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए कोरोना का प्रसार काफी हद तक रोकने में मदद मिली। अब फिर से वो समय आ गया है, जब लोगों को सावधानी बरतने की जरूरत है।
झांसी में 10 अप्रैल 2020 को पहली बार आरटीपीसीआर मशीन आई थी और यहां पर नमूनों की जांच शुरू हुई थी। धीरे-धीरे केस बढ़ने लगे और जांचों का दायरा सीमित रहा। ऐसे में मेडिकल कॉलेज प्रशासन की तरफ से आरटीपीसीआर मशीनों की संख्या बढ़ाने की शासन से मांग की गई। एक-एक कर दो और मशीनें कॉलेज को दी गईं। वहीं, शुरूआत में जिले भर में वेंटिलेटर की संख्या भी महज 70 के आसपास थी। इसमें मेडिकल कॉलेज में 37 और जिला अस्पताल में मात्र पांच ही वेंटिलेटर थे। लगातार बढ़ते गंभीर केसों को भर्ती करने में समस्या आने लगी तो शासन की ओर से वेंटिलेटर भी उपलब्ध कराए गए। अब जिले में सवा सौ के करीब वेंटिलेटर हो गए हैं। इसके अलावा सरकारी स्वास्थ्य इकाइयों पर भी आउटसोर्सिंग पर कर्मचारियों की तैनाती की गई। इससे स्टाफ का टोटा काफी हद तक कम हो सका।
पांच करोड़ की बीएसएल-3 लैब भी हुई शुरू
कोरोना काल में ही मेडिकल कॉलेज में पांच करोड़ की लागत से बनी बायो सेफ्टी लेवल-3 (बीएसएल) लैब शुरू हुई। इस लैब में कोरोना समेत खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया की जांच में किसी भी प्रकार के संक्रमण फैलने का खतरा नहीं होता है। लैब लोहे के बंकरनुमा आकृति की है। जैसे ही कोई इसमें डॉक्टर प्रवेश करता है, उसका पूरा शरीर सैनिटाइज हो जाता है। ताकि, बाहर का कोई वायरस, बैक्टीरिया आदि लैब में न आ सके। सैंपल कलेक्शन की प्रक्रिया ऑटोमेटिक होती है। टेस्ट ट्यूब में सैंपल रखने के लिए डॉक्टर को मशीन के अंदर हाथ डालना पड़ता है। मशीन ऑटोमेटिक सैंपल ले लेती है।
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पर्याप्त पीपीई किट, एन-95 मास्क तक नहीं थे
कोरोना काल में डॉक्टरों और कर्मचारियों ने अपनी जान पर खेलकर मरीजों को नया जीवन देने का काम किया। जब वायरस का प्रसार शुरू हो गया तो जिले में पर्याप्त मात्रा में पीपीई किट और एन-95 मास्क तक नहीं थे। स्वास्थ्य कर्मचारियों ने कई बार अधिकारियों को पत्र लिखकर इसकी मांग भी की थी। इसी बीच, कुछ समाजसेवी भी आगे आए। उन्होंने भी डॉक्टरों, कर्मचारियों को अपने स्तर से पीपीई किट और एन-95 मास्क उपलब्ध कराए। वहीं, शासन स्तर से भी मुहैया कराए गए।
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झांसी में 10 अप्रैल 2020 को पहली बार आरटीपीसीआर मशीन आई थी और यहां पर नमूनों की जांच शुरू हुई थी। धीरे-धीरे केस बढ़ने लगे और जांचों का दायरा सीमित रहा। ऐसे में मेडिकल कॉलेज प्रशासन की तरफ से आरटीपीसीआर मशीनों की संख्या बढ़ाने की शासन से मांग की गई। एक-एक कर दो और मशीनें कॉलेज को दी गईं। वहीं, शुरूआत में जिले भर में वेंटिलेटर की संख्या भी महज 70 के आसपास थी। इसमें मेडिकल कॉलेज में 37 और जिला अस्पताल में मात्र पांच ही वेंटिलेटर थे। लगातार बढ़ते गंभीर केसों को भर्ती करने में समस्या आने लगी तो शासन की ओर से वेंटिलेटर भी उपलब्ध कराए गए। अब जिले में सवा सौ के करीब वेंटिलेटर हो गए हैं। इसके अलावा सरकारी स्वास्थ्य इकाइयों पर भी आउटसोर्सिंग पर कर्मचारियों की तैनाती की गई। इससे स्टाफ का टोटा काफी हद तक कम हो सका।
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पांच करोड़ की बीएसएल-3 लैब भी हुई शुरू
कोरोना काल में ही मेडिकल कॉलेज में पांच करोड़ की लागत से बनी बायो सेफ्टी लेवल-3 (बीएसएल) लैब शुरू हुई। इस लैब में कोरोना समेत खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया की जांच में किसी भी प्रकार के संक्रमण फैलने का खतरा नहीं होता है। लैब लोहे के बंकरनुमा आकृति की है। जैसे ही कोई इसमें डॉक्टर प्रवेश करता है, उसका पूरा शरीर सैनिटाइज हो जाता है। ताकि, बाहर का कोई वायरस, बैक्टीरिया आदि लैब में न आ सके। सैंपल कलेक्शन की प्रक्रिया ऑटोमेटिक होती है। टेस्ट ट्यूब में सैंपल रखने के लिए डॉक्टर को मशीन के अंदर हाथ डालना पड़ता है। मशीन ऑटोमेटिक सैंपल ले लेती है।
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पर्याप्त पीपीई किट, एन-95 मास्क तक नहीं थे
कोरोना काल में डॉक्टरों और कर्मचारियों ने अपनी जान पर खेलकर मरीजों को नया जीवन देने का काम किया। जब वायरस का प्रसार शुरू हो गया तो जिले में पर्याप्त मात्रा में पीपीई किट और एन-95 मास्क तक नहीं थे। स्वास्थ्य कर्मचारियों ने कई बार अधिकारियों को पत्र लिखकर इसकी मांग भी की थी। इसी बीच, कुछ समाजसेवी भी आगे आए। उन्होंने भी डॉक्टरों, कर्मचारियों को अपने स्तर से पीपीई किट और एन-95 मास्क उपलब्ध कराए। वहीं, शासन स्तर से भी मुहैया कराए गए।