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Jhansi News: मां-बहन की जिद से बची जिंदगी, जन्मदिन पर दोस्तों को खोने का गम

Sat, 12 Sep 2026 02:20 AM IST
झांसी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी Updated Sat, 12 Sep 2026 02:20 AM IST
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Life saved thanks to the insistence of mother and sister; the grief of losing friends on a birthday.
सार्थक सिंधू
झांसी। सार्थक रक्षाबंधन के बाद दिल्ली लौटने की तैयारी कर चुका था। टिकट और सामान की तैयारी भी थी, लेकिन मां और बहन ने कुछ दिन और घर पर रुकने की जिद की। 7 सितंबर को उसका जन्मदिन था और घर में रामायण पाठ का आयोजन भी होना था। आखिरकार मां-बहन की जिद के आगे सार्थक दिल्ली नहीं गया। शायद यही जिद उसकी जिंदगी बचाने वाली साबित हुई।
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6 सितंबर को दिल्ली के सत्य निकेतन में जिस पांच मंजिला हॉस्टल की इमारत गिरी, सार्थक उसी में रहता था। जिंदगी तो बच गई, लेकिन जन्मदिन पर उसे अपने दो दोस्तों की मौत का ऐसा गम मिला, जिसे वह भुला नहीं पा रहा है।
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सीपरी बाजार के ब्रह्मनगर कॉलोनी निवासी सार्थक दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज में बीकॉम का छात्र है। हादसे के समय वह झांसी स्थित अपने घर पर रामायण पाठ में बैठा था। तभी उसके साथ रहने वाले दोस्त श्रेष्ठ ने फोन कर हॉस्टल की इमारत गिरने की जानकारी दी। खबर सुनते ही सार्थक घबरा गया। उसने अपने दोस्तों अर्पित और अक्षत को फोन किया, लेकिन दोनों ने कॉल रिसीव नहीं किया।
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सार्थक ने श्रेष्ठ से हॉस्टल जाकर दोनों दोस्तों की कुशलता पता करने को कहा। कुछ देर बाद जब दोनों के नहीं बचने की खबर मिली तो वह सदमे में चला गया। जिस दिन उसे अपना जन्मदिन मनाना था, उसी दिन दोस्तों को खोने का दर्द उसके हिस्से आया।

मां और बहन की जिद अब लगती है किसी वरदान जैसी
सार्थक ने बताया कि रक्षाबंधन के बाद उसे दिल्ली लौटना था। उसने जाने की तैयारी भी कर ली थी, लेकिन मां हेमा और छोटी बहन मीनल ने जन्मदिन घर पर मनाने के लिए रुकने को कहा। चाचा और दादी ने भी उसे रुकने के लिए कहा था। घर में रामायण पाठ का आयोजन भी तय था। परिवार की जिद के चलते उसने दिल्ली लौटने का कार्यक्रम टाल दिया। हादसे के बाद सार्थक के लिए परिवार की वह जिद बार-बार याद आती है। उसे लगता है कि अगर वह उस दिन दिल्ली लौट गया होता तो शायद वह भी हादसे की चपेट में आ जाता।

पिता के निधन के बाद मां ने संभाली जिम्मेदारी
सार्थक ने 12वीं तक की पढ़ाई आर्यंस स्कूल से की है। उसके पिता सिंधू शरण वर्मा शिक्षा विभाग में कार्यरत थे। पिता के निधन के बाद मां हेमा ने ही उसकी और छोटी बहन मीनल की जिम्मेदारी संभाली। सार्थक घर का इकलौता बेटा है। बेटे के सकुशल घर पर होने से परिवार भगवान का आभार जता रहा है। मगर उसके दो दोस्तों की मौत की खबर ने परिवार को भी गहरे दुख में डाल दिया है।

छह दोस्तों का ग्रुप, अब रह गए चार
सार्थक ने बताया कि वह छह दोस्तों के साथ रहता था। इनमें अर्पित देवास, अक्षत कटनी, नवनीत मेरठ, कृष्णा गुप्ता जम्मू और श्रेष्ठ यमुनानगर का रहने वाला है। सभी के बीच गहरी दोस्ती थी और वे साथ रहते थे। रक्षाबंधन और जन्माष्टमी के कारण सार्थक, नवनीत और कृष्णा अपने-अपने घर चले गए थे। इस वजह से हादसे के समय वे दिल्ली में नहीं थे। लेकिन अर्पित और अक्षत हॉस्टल में ही थे। हादसे ने छह दोस्तों के ग्रुप से दो साथियों को हमेशा के लिए छीन लिया।


दोस्तों की याद में खाना भी नहीं खा पा रहा
सार्थक अभी भी हादसे के सदमे से बाहर नहीं निकल पाया है। दोस्तों के साथ बिताए पल याद आते ही उसकी आंखें नम हो जाती हैं। कई दिनों से वह ठीक से भोजन भी नहीं कर पा रहा है। उसने बताया कि हादसे के बाद से दोबारा दिल्ली जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। मां और बहन की जिद ने उसे हादसे से बचा लिया, लेकिन जन्मदिन की वह तारीख अब उसके लिए खुशियों की नहीं, अपने दो दोस्तों को खोने की याद बन गई है।
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