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मेडिकल कॉलेज में भी बिजली का रोना
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मेडिकल कॉलेज में भी बिजली का रोना
झांसी। आकस्मिक विभाग होने के बावजूद महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में 24 घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति नहीं हो रही है। ऐसा मेडिकल कॉलेज को स्वतंत्र फीडर न मिल पाने के कारण हो रहा है। बार-बार विद्युत आवागमन से रेडियोलॉजी विभाग की मशीनें खराब हो रही हैं। कॉलेज प्रशासन की तरफ से भी इसके लिए ज्यादा रुचि नहीं दिखाई गई। सिर्फ एक बार विद्युत विभाग को पत्राचार किया गया, वो भी सालों पहले। बिजली जाने पर मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मेडिकल कॉलेज को जिला अस्पताल की तरह विद्युत सुविधा नहीं मिल पा रही है। जिला अस्पताल को स्वतंत्र फीडर मिला होने की वजह से यहां 24 घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति मिलती है। जबकि, मेडिकल कॉलेज को बार-बार होने वाले फॉल्ट का दंश झेलना पड़ रहा है। बिजली चली जाने पर जेनरेटर से इमरजेंसी, आईसीयू में आपूर्ति दी जाती है। मगर वार्ड में कुछ पंखे चल पाते हैं और कुछ नहीं। इससे मरीजों को गर्मी से जूझना पड़ता है। जब बिजली आती है, तब जाकर पंखे चल पाते हैं। इसके अलावा गाउन, कॉटन और औजारों का स्ट्रलाइजेशन नहीं हो पाता है। इससे ओटी में ऑपरेशन होने में विलंब हो जाता है। बिजली गुल रहने से सबसे बड़ी समस्या पानी की सप्लाई बाधित हो जाने से उत्पन्न हो जाती है। थ्री फेस की मोटरें लगी होने के कारण जनरेटर से मोटरें नहीं चल पाती हैं। यदि टंकी खाली होती है तो पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है। इसके अलावा कॉलेज की सभी लिफ्ट भी बंद हो जाती हैं।
सबसे बड़ी समस्या रेडियोलॉजी विभाग की मशीनें खराब होने से उत्पन्न हो जाती है। मौजूदा समय में विभाग में सीटी स्कैन और एमआरआई मशीन खराब पड़ी हुई है। हाल ही में जब इंजीनियरों को मशीनें सुधारने के लिए बुलाया गया था तो उन्होंने बार-बार बिजली के आवागमन को भी मशीनें खराब होने की एक वजह बताया था। दरअसल, रेडियोलॉजी विभाग में जेनरेटर की सुविधा नहीं है। यहां लगा यूपीएस सिर्फ कंप्यूटर चलाने के लिए है। मगर विभागीय स्टाफ बिजली जाने के बाद भी यूपीएस से मशीनें चलाता रहता है। कुछ ही मिनट में यूपीएस की बैटरी खत्म हो जाती है। अचानक मशीनें बंद होने से ही मशीनें खराब होती हैं। स्वतंत्र फीडर के लिए मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने भी कोई खास रुचि नहीं दिखाई है। पूर्व अधिकारियों की तरफ से वर्ष 2014 में ही एक बार पत्राचार किया गया। विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता को पत्र लिखकर अधिक से अधिक बिजली आपूर्ति देने की मांग की गई थी। इसके बाद से कॉलेज प्रशासन भी हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा।
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डीजल का सालाना खर्च दस लाख
एक अनुमान के अनुसार मेडिकल कॉलेज में साल भर में औसतन सवा तीन सौ घंटे बिजली जाती है। यदि एक घंटे जनरेटर चलता है तो चार से पांच लीटर डीजल खर्च हो जाता है। ऐसे में मेडिकल कॉलेज को लगभग दस लाख का डीजल पर खर्च करने पड़ जाते हैं। वहीं, जनरेटर की सर्विस के लिए शासन की तरफ से कोई बजट भी नहीं मिलता है। इसलिए जनरेटरों की सर्विस नहीं हो पाती है। ऐसे में जनरेटर कभी भी खराब हो सकते हैं।
वर्ष 2014 में विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता को पत्र लिखकर अधिक से अधिक विद्युत आपूर्ति देने की मांग की थी। अब फिर से दोबारा पत्र लिखा जाएगा। - डॉ. हरीशचंद्र आर्या, सीएमएस।
शासन ने अभी जिला अस्पताल और न्यायालय के लिए स्वतंत्र फीडर का प्रावधान कर रखा है। इसके लिए शासन से बजट मिलता है। मेडिकल कॉलेज के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन बजट देता है तो वह स्वतंत्र फीडर बनवा देंगे।
एसके वर्मा, प्रबंध निदेशक दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड।
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झांसी। आकस्मिक विभाग होने के बावजूद महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में 24 घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति नहीं हो रही है। ऐसा मेडिकल कॉलेज को स्वतंत्र फीडर न मिल पाने के कारण हो रहा है। बार-बार विद्युत आवागमन से रेडियोलॉजी विभाग की मशीनें खराब हो रही हैं। कॉलेज प्रशासन की तरफ से भी इसके लिए ज्यादा रुचि नहीं दिखाई गई। सिर्फ एक बार विद्युत विभाग को पत्राचार किया गया, वो भी सालों पहले। बिजली जाने पर मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
मेडिकल कॉलेज को जिला अस्पताल की तरह विद्युत सुविधा नहीं मिल पा रही है। जिला अस्पताल को स्वतंत्र फीडर मिला होने की वजह से यहां 24 घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति मिलती है। जबकि, मेडिकल कॉलेज को बार-बार होने वाले फॉल्ट का दंश झेलना पड़ रहा है। बिजली चली जाने पर जेनरेटर से इमरजेंसी, आईसीयू में आपूर्ति दी जाती है। मगर वार्ड में कुछ पंखे चल पाते हैं और कुछ नहीं। इससे मरीजों को गर्मी से जूझना पड़ता है। जब बिजली आती है, तब जाकर पंखे चल पाते हैं। इसके अलावा गाउन, कॉटन और औजारों का स्ट्रलाइजेशन नहीं हो पाता है। इससे ओटी में ऑपरेशन होने में विलंब हो जाता है। बिजली गुल रहने से सबसे बड़ी समस्या पानी की सप्लाई बाधित हो जाने से उत्पन्न हो जाती है। थ्री फेस की मोटरें लगी होने के कारण जनरेटर से मोटरें नहीं चल पाती हैं। यदि टंकी खाली होती है तो पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच जाती है। इसके अलावा कॉलेज की सभी लिफ्ट भी बंद हो जाती हैं।
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सबसे बड़ी समस्या रेडियोलॉजी विभाग की मशीनें खराब होने से उत्पन्न हो जाती है। मौजूदा समय में विभाग में सीटी स्कैन और एमआरआई मशीन खराब पड़ी हुई है। हाल ही में जब इंजीनियरों को मशीनें सुधारने के लिए बुलाया गया था तो उन्होंने बार-बार बिजली के आवागमन को भी मशीनें खराब होने की एक वजह बताया था। दरअसल, रेडियोलॉजी विभाग में जेनरेटर की सुविधा नहीं है। यहां लगा यूपीएस सिर्फ कंप्यूटर चलाने के लिए है। मगर विभागीय स्टाफ बिजली जाने के बाद भी यूपीएस से मशीनें चलाता रहता है। कुछ ही मिनट में यूपीएस की बैटरी खत्म हो जाती है। अचानक मशीनें बंद होने से ही मशीनें खराब होती हैं। स्वतंत्र फीडर के लिए मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने भी कोई खास रुचि नहीं दिखाई है। पूर्व अधिकारियों की तरफ से वर्ष 2014 में ही एक बार पत्राचार किया गया। विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता को पत्र लिखकर अधिक से अधिक बिजली आपूर्ति देने की मांग की गई थी। इसके बाद से कॉलेज प्रशासन भी हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा।
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डीजल का सालाना खर्च दस लाख
एक अनुमान के अनुसार मेडिकल कॉलेज में साल भर में औसतन सवा तीन सौ घंटे बिजली जाती है। यदि एक घंटे जनरेटर चलता है तो चार से पांच लीटर डीजल खर्च हो जाता है। ऐसे में मेडिकल कॉलेज को लगभग दस लाख का डीजल पर खर्च करने पड़ जाते हैं। वहीं, जनरेटर की सर्विस के लिए शासन की तरफ से कोई बजट भी नहीं मिलता है। इसलिए जनरेटरों की सर्विस नहीं हो पाती है। ऐसे में जनरेटर कभी भी खराब हो सकते हैं।
वर्ष 2014 में विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता को पत्र लिखकर अधिक से अधिक विद्युत आपूर्ति देने की मांग की थी। अब फिर से दोबारा पत्र लिखा जाएगा। - डॉ. हरीशचंद्र आर्या, सीएमएस।
शासन ने अभी जिला अस्पताल और न्यायालय के लिए स्वतंत्र फीडर का प्रावधान कर रखा है। इसके लिए शासन से बजट मिलता है। मेडिकल कॉलेज के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन बजट देता है तो वह स्वतंत्र फीडर बनवा देंगे।
एसके वर्मा, प्रबंध निदेशक दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड।