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आंखें : दूर की रोशनी हो रही कमजोर, दस में तीन बच्चों पर असर
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झांसी। कोरोना काल में चार से आठ साल तक के बच्चों में तीन गुना तेजी से निकट दृष्टिदोष यानी मायोपिया बढ़ गया है। हाल ये है कि हर दस में से तीन बच्चों की आंखों की दूर की रोशनी कमजोर मिल रही है। कई बच्चों को तो शिक्षकों ने आंखों की जांच कराने के लिए कहा, तब जाकर परिजनों का पता चला कि उनके बच्चे की आंख कमजोर हो चुकी हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों को पता ही नहीं चलता कि वह मायोपिया बीमारी शिकार हो चुके हैं। जब उन्हें दूर की चीज साफ नहीं दिखती है तो वो पास आकर उसे देखने की कोशिश भी करते हैं। ऐसे में परिजनों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। चार-पांच साल की उम्र में तो बच्चे की साल में एक बार नेत्र की जांच जरूर करा लेनी चाहिए। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शमी ने बताया कि कोरोना काल में बच्चों में मायोपिया तीन गुना तेजी से बढ़ा है। कोविड से पहले जहां हर दस में से एक बच्चे की आंख की दूरी की रोशनी कम मिलती थी, वो अब तीन बच्चों में सामने आ रही है।
उन्होंने बताया कि कोरोना काल में बच्चों का ज्यादा समय मोबाइल, लैपटॉप पर बीता। इसके अलावा उनका बाहर खेलना कूदना कम हो गया। ऐसे में बच्चे ज्यादा दूर का नहीं देखते हैं। इस वजह से भी उनकी दूर की रोशनी कमजोर हो रही है। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद कुमार यादव ने बताया कि कोरोना काल के बाद जब बच्चे स्कूल पहुंचे तो कइयों को ब्लैक बोर्ड पर सही से दिखाई नहीं दिया। शिक्षकों ने उनसे जांच कराने को बोला। नेत्र परीक्षण में परिजनों को पता चला कि उनके बच्चे की आंख की रोशनी कमजोर हो गई है।
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चश्मा न लगे तो तिरछापन शुरू हो जाता
नेत्र रोग विशेषज्ञ ने बताया कि मायोपिया के शिकार 10 फीसदी बच्चों की आंखों में तिरछापन भी मिल रहा है। कहा कि यदि दूर की रोशनी कमजोर होने पर बच्चे का चश्मा नहीं लगवाया जाए तो भेंगापन आना शुरू हो जाता है।
ये हैं लक्षण
- ब्लैक बोर्ड पर सही न दिखना
- लगातार आंखें मसलना
- पढ़ाई पर फोकस न कर पाना
- बार-बार आंखें झपकाना
- दूर की चीजें देखने पर आंखों में तनाव होना
- सिरदर्द और भेंगापन
- पलकों को सिकोड़कर देखना
- बार-बार पानी आना
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विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों को पता ही नहीं चलता कि वह मायोपिया बीमारी शिकार हो चुके हैं। जब उन्हें दूर की चीज साफ नहीं दिखती है तो वो पास आकर उसे देखने की कोशिश भी करते हैं। ऐसे में परिजनों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। चार-पांच साल की उम्र में तो बच्चे की साल में एक बार नेत्र की जांच जरूर करा लेनी चाहिए। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शमी ने बताया कि कोरोना काल में बच्चों में मायोपिया तीन गुना तेजी से बढ़ा है। कोविड से पहले जहां हर दस में से एक बच्चे की आंख की दूरी की रोशनी कम मिलती थी, वो अब तीन बच्चों में सामने आ रही है।
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उन्होंने बताया कि कोरोना काल में बच्चों का ज्यादा समय मोबाइल, लैपटॉप पर बीता। इसके अलावा उनका बाहर खेलना कूदना कम हो गया। ऐसे में बच्चे ज्यादा दूर का नहीं देखते हैं। इस वजह से भी उनकी दूर की रोशनी कमजोर हो रही है। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद कुमार यादव ने बताया कि कोरोना काल के बाद जब बच्चे स्कूल पहुंचे तो कइयों को ब्लैक बोर्ड पर सही से दिखाई नहीं दिया। शिक्षकों ने उनसे जांच कराने को बोला। नेत्र परीक्षण में परिजनों को पता चला कि उनके बच्चे की आंख की रोशनी कमजोर हो गई है।
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चश्मा न लगे तो तिरछापन शुरू हो जाता
नेत्र रोग विशेषज्ञ ने बताया कि मायोपिया के शिकार 10 फीसदी बच्चों की आंखों में तिरछापन भी मिल रहा है। कहा कि यदि दूर की रोशनी कमजोर होने पर बच्चे का चश्मा नहीं लगवाया जाए तो भेंगापन आना शुरू हो जाता है।
ये हैं लक्षण
- ब्लैक बोर्ड पर सही न दिखना
- लगातार आंखें मसलना
- पढ़ाई पर फोकस न कर पाना
- बार-बार आंखें झपकाना
- दूर की चीजें देखने पर आंखों में तनाव होना
- सिरदर्द और भेंगापन
- पलकों को सिकोड़कर देखना
- बार-बार पानी आना