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प्रवासी मजदूरों के लौटने के बावजूद मनरेगा सुस्त
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झांसी। बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के लौट आने के बावजूद अबकी उनकी दिलचस्पी मनरेगा के काम में नहीं दिखती। मजदूर न मिलने से मनरेगा के साढ़े तीन सौ से अधिक काम अटके पडे़ हैं। कोविड संक्रमण की बढ़ती रफ्तार के चलते भी मजदूर सहमे हुए हैं। इस वजह से भी वह काम करने को राजी नहीं हैं।
पिछले वर्ष कोविड-19 का प्रकोप शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर गांव लौटे थे। उनको गांव में ही रोजगार देने के लिए पिछले वर्ष मनरेगा में कुल 12122.66 लाख रुपये का भारी भरकम बजट स्वीकृत किया गया। इसके जरिए 41.23 लाख मानव दिवस के लक्ष्य से अधिक 50.10 लाख मानव दिवस रोजगार दिया गया। संयुक्त जिला कार्यक्रम समन्वय के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में 121 प्रतिशत मनरेगा मजदूरों को काम दिया। अब नए वित्तीय वर्ष के लिए सरकार ने 10260 लाख रुपये के बजट का प्रावधान किया, जो पिछली बार के मुकाबले कम है।
पिछली बार मनरेगा के कामों में मजदूरों की कमी नहीं दिखाई पड़ी थी। लेकिन अबकी मजदूर काम मांगने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। आंकड़ों के मुताबिक जनपद में एक्टिव जॉबकार्ड धारकों की संख्या 1.21 लाख है लेकिन, इसके बावजूद साढ़े तीन सौ से अधिक कार्य लंबित पड़े हुए हैं। इनके लिए मजदूर न मिलने से अधिकांश काम शुरू नहीं हो पाए। वहीं, कई काम ऐसे हैं जिनको मजदूर न मिलने से पूरा नहीं किया जा सका। यह काम बीच में ही अटके हुए हैं।
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बता दें, कोरोना संक्रमण की रफ्तार बढ़ने के बाद मार्च के आखिरी सप्ताह से ही प्रवासी मजदूरों की वापसी का दौर शुरू हो गया था। उसके बाद से लगातार बस एवं ट्रेनों के माध्यम से मजदूर वापस लौट रहे हैं। इन मजदूरों की वापसी का नया आंकड़ा फिलहाल जिला प्रशासन के पास नहीं है लेकिन, अनुमान लगाया जा रहा कि करीब 15 हजार प्रवासी मजदूर जनपद में लौटे हैं। वहीं, अधिकारियों का कहना है कि कोरोना संक्रमण के खतरे की वजह से अभी मजदूर काम करने को राजी नहीं हैं। इस वजह से भी काम रफ्तार नहीं पकड़ पा रहे हैं।
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पिछले वर्ष कोविड-19 का प्रकोप शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर गांव लौटे थे। उनको गांव में ही रोजगार देने के लिए पिछले वर्ष मनरेगा में कुल 12122.66 लाख रुपये का भारी भरकम बजट स्वीकृत किया गया। इसके जरिए 41.23 लाख मानव दिवस के लक्ष्य से अधिक 50.10 लाख मानव दिवस रोजगार दिया गया। संयुक्त जिला कार्यक्रम समन्वय के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में 121 प्रतिशत मनरेगा मजदूरों को काम दिया। अब नए वित्तीय वर्ष के लिए सरकार ने 10260 लाख रुपये के बजट का प्रावधान किया, जो पिछली बार के मुकाबले कम है।
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पिछली बार मनरेगा के कामों में मजदूरों की कमी नहीं दिखाई पड़ी थी। लेकिन अबकी मजदूर काम मांगने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। आंकड़ों के मुताबिक जनपद में एक्टिव जॉबकार्ड धारकों की संख्या 1.21 लाख है लेकिन, इसके बावजूद साढ़े तीन सौ से अधिक कार्य लंबित पड़े हुए हैं। इनके लिए मजदूर न मिलने से अधिकांश काम शुरू नहीं हो पाए। वहीं, कई काम ऐसे हैं जिनको मजदूर न मिलने से पूरा नहीं किया जा सका। यह काम बीच में ही अटके हुए हैं।
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बता दें, कोरोना संक्रमण की रफ्तार बढ़ने के बाद मार्च के आखिरी सप्ताह से ही प्रवासी मजदूरों की वापसी का दौर शुरू हो गया था। उसके बाद से लगातार बस एवं ट्रेनों के माध्यम से मजदूर वापस लौट रहे हैं। इन मजदूरों की वापसी का नया आंकड़ा फिलहाल जिला प्रशासन के पास नहीं है लेकिन, अनुमान लगाया जा रहा कि करीब 15 हजार प्रवासी मजदूर जनपद में लौटे हैं। वहीं, अधिकारियों का कहना है कि कोरोना संक्रमण के खतरे की वजह से अभी मजदूर काम करने को राजी नहीं हैं। इस वजह से भी काम रफ्तार नहीं पकड़ पा रहे हैं।
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