{"_id":"610d92cb8ebc3eb592039972","slug":"malkhan-singh-considered-chandrashekhar-azad-as-his-fifth-brother-jhansi-news-jhs2013352141","type":"story","status":"publish","title_hn":"मलखान सिंह चंद्रशेखर आजाद को मानते थे अपना पांचवां भाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मलखान सिंह चंद्रशेखर आजाद को मानते थे अपना पांचवां भाई
विज्ञापन
सिमरधा के सेनानी परिवार के सदस्य जय प्रकाश त्रिपाठी।
झांसी। गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा देश स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था। बात 1930 की है झांसी के कुछ क्रांतिकारी ओरछा से करीब तीन किलोमीटर पहले स्थित ढिमरपुरा गांव में यहां के नंबरदार मलखान सिंह तोमर के घर पहुंचे उन्होंने अपने साथ आए एक नौजवान का परिचय हरिशंकर ब्रह्मचारी के रूप में कराया। उन्होंने मलखान सिंह से कहा कि यह ब्रह्मचारी जी आपके सातार नदी के तट पर स्थित मंदिर की पूजा अर्चना करते रहेंगे। मलखान सिंह ने युवक को सम्मान के साथ सातार स्थित मंदिर दिखाया तथा पूजा के बदले भोजन व दक्षिणा देने का भी वादा किया। तीन साल तक मलखान चंद्रशेखर आजाद को इसी रूप में अपने ढ़िमरपुरा (आजादपुरा) स्थित मकान में और सातार के मंदिर में अज्ञातवास में रखे रहे। उनका आजाद से इतना प्रेम बढ़ गया था कि वह उन्हें अपना पांचवां भाई बताते थे।
हरिशंकर ब्रह्मचारी बनकर रहते थे चंद्रशेखर आजाद
मलखान सिंह तोमर के पौत्र प्रदीप तोमर बताते हैं कि उनके दादा जी मलखान सिंह को एक वर्ष तक यह मालूम नहीं था कि चंद्रशेखर आजाद क्रांतिकारी हैं। वह उनके साथ अपनी बंदूक ले जाते और जंगल में निशानेबाजी करते थे। सातार के मंदिर पर भी खूब बैठक जमती थी। इसी तरह एक वर्ष निकल गया। जब आजाद पूरी तरह भांप गए कि मलखान देशभक्त होने के साथ ही विश्वसनीय भी हैं तो उन्होंने धीमे से उन्हें बताया कि वह चंद्रशेखर आजाद हैं और यहां से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करना चाहते हैं। इसके बाद कई बार फिरंगियों और ओरछा राज्य की पुलिस ने मलखान सिंह को घेरकर आजाद के बारे में जानना चाहा पर उन्होंने इस राज को अपनी जुबान पर नहीं आने दिया। इसी दौरानअंग्रेज अफसर लार्ड इर्विन का ओरछा दौरा हुआ तो यहां 500 अंग्रेजी सैनिकों और खुफिया विभाग के अफसर कई दिनों तक ओरछा में ही डटे रहे, पर उन्हें इस बात की भनक भी नहीं लग पाई कि हरिशंकर ब्रह्मचारी ही चंद्रशेखर आजाद हैं। इसके बाद तो यूपी और पंजाब तक के क्रांतिकारियों का ढ़िमरपुरा गांव में स्थित मलखान सिंह के घर पर आना जाना हो गया। यहीं से आजाद क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करते थे। मलखान सिंह चंद्रशेखर आजाद से इतना प्यार करने लगे थे कि वह अपने चार भाइयों के अलावा उन्हें पांचवां भाई कहते थे।
जब मलखान सिंह के मकान को घेर लिया ओरछा रियासत की पुलिस ने
आजादपुरा निवासी शिव सिंह तोमर बताते हैं कि अंग्रेज अफसरों को किसी ने सूचना दी कि मलखान सिंह तोमर झांसी के क्रांतिकारियों से संबंध रखते हैं तो रात के समय ओरछा रियासत के सिपाहियों ने मलखान सिंह तोमर का घर घेर लिया। यह भी अजब संयोग था कि उस दिन चंद्रशेखर आजाद भी सातार नदी के मंदिर पर न होकर मलखान सिंह के घर पर ही थे, क्योंकि उस दिन भव्वी जू (मलखान सिंह की पत्नी) ने कढ़ी बनाई थी। पंडित जी की सबसे प्रिय डिस। मंदिर पर बाकायदा संदेश भेजकर ब्रह्मचारी जी को कढ़ी के साथ भोजन करने का न्योता भेजा गया था। पंडित जी भोजन कर रहे थे, इसी दौरान सिपाहियों ने मकान की कुंडी खड़काई। मलखान सिंह ने दरवाजा खोला तो उनके होश उड़ गए। रियासत के सैनिकों ने उनके पूरे घर को घेर रखा था। उन्होंने संयम से काम लिया तथा सिपाहियों को पहले जल पीने को आमंत्रित किया, इसके बाद पूरे घर की तलाशी खुद ही दिलवाई, असलहे सातार नदी की गुफा में रखे हुए थे, इस कारण घर में कुछ भी आपत्ति जनक नहीं मिला। इनमें से कुछ सिपाहियों का सातार नदी के हनुमान मंदिर पर कभी कभी आना जाना हो जाता था, इसके चलते वह मंदिर के पुजारी के रूप में हरिशंकर ब्रह्मचारी (आजाद) का सम्मान करते थे। आजाद ने सिपाहियों को समझाया कि मलखान धार्मिक व्यक्ति हैं इनका किसी भी बागी से कोई संपर्क नहीं है तब कहीं ओरछा रियासत के सिपाही वापस लौटे। इस तरह की घटनाओं को लेकर आजाद काफी चिंतित रहने लगे थे, रियासत की पुलिस के अलावा अब फिरंगी पुलिस भी ढिमरपुरा गांव और सातार नदीं के तट पर कुछ ज्यादा ही शिकंजा कस रही थी, इसे देखते हुए एक दिन अचानक आजाद ने मलखान सिंह से कहा कि अब यहां मेरा समय पूरा हो गया है यहां रहने पर आप भी मुसीबत में पड़ सकते हैं और वे यहां से इलाहाबाद के लिए रवाना हो गए। पर यह कोई नहीं जानता था कि ओरछा से इलाहाबाद का उनका यह सफर अनंत की ओर होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
हरिशंकर ब्रह्मचारी बनकर रहते थे चंद्रशेखर आजाद
मलखान सिंह तोमर के पौत्र प्रदीप तोमर बताते हैं कि उनके दादा जी मलखान सिंह को एक वर्ष तक यह मालूम नहीं था कि चंद्रशेखर आजाद क्रांतिकारी हैं। वह उनके साथ अपनी बंदूक ले जाते और जंगल में निशानेबाजी करते थे। सातार के मंदिर पर भी खूब बैठक जमती थी। इसी तरह एक वर्ष निकल गया। जब आजाद पूरी तरह भांप गए कि मलखान देशभक्त होने के साथ ही विश्वसनीय भी हैं तो उन्होंने धीमे से उन्हें बताया कि वह चंद्रशेखर आजाद हैं और यहां से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करना चाहते हैं। इसके बाद कई बार फिरंगियों और ओरछा राज्य की पुलिस ने मलखान सिंह को घेरकर आजाद के बारे में जानना चाहा पर उन्होंने इस राज को अपनी जुबान पर नहीं आने दिया। इसी दौरानअंग्रेज अफसर लार्ड इर्विन का ओरछा दौरा हुआ तो यहां 500 अंग्रेजी सैनिकों और खुफिया विभाग के अफसर कई दिनों तक ओरछा में ही डटे रहे, पर उन्हें इस बात की भनक भी नहीं लग पाई कि हरिशंकर ब्रह्मचारी ही चंद्रशेखर आजाद हैं। इसके बाद तो यूपी और पंजाब तक के क्रांतिकारियों का ढ़िमरपुरा गांव में स्थित मलखान सिंह के घर पर आना जाना हो गया। यहीं से आजाद क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करते थे। मलखान सिंह चंद्रशेखर आजाद से इतना प्यार करने लगे थे कि वह अपने चार भाइयों के अलावा उन्हें पांचवां भाई कहते थे।
विज्ञापन
जब मलखान सिंह के मकान को घेर लिया ओरछा रियासत की पुलिस ने
आजादपुरा निवासी शिव सिंह तोमर बताते हैं कि अंग्रेज अफसरों को किसी ने सूचना दी कि मलखान सिंह तोमर झांसी के क्रांतिकारियों से संबंध रखते हैं तो रात के समय ओरछा रियासत के सिपाहियों ने मलखान सिंह तोमर का घर घेर लिया। यह भी अजब संयोग था कि उस दिन चंद्रशेखर आजाद भी सातार नदी के मंदिर पर न होकर मलखान सिंह के घर पर ही थे, क्योंकि उस दिन भव्वी जू (मलखान सिंह की पत्नी) ने कढ़ी बनाई थी। पंडित जी की सबसे प्रिय डिस। मंदिर पर बाकायदा संदेश भेजकर ब्रह्मचारी जी को कढ़ी के साथ भोजन करने का न्योता भेजा गया था। पंडित जी भोजन कर रहे थे, इसी दौरान सिपाहियों ने मकान की कुंडी खड़काई। मलखान सिंह ने दरवाजा खोला तो उनके होश उड़ गए। रियासत के सैनिकों ने उनके पूरे घर को घेर रखा था। उन्होंने संयम से काम लिया तथा सिपाहियों को पहले जल पीने को आमंत्रित किया, इसके बाद पूरे घर की तलाशी खुद ही दिलवाई, असलहे सातार नदी की गुफा में रखे हुए थे, इस कारण घर में कुछ भी आपत्ति जनक नहीं मिला। इनमें से कुछ सिपाहियों का सातार नदी के हनुमान मंदिर पर कभी कभी आना जाना हो जाता था, इसके चलते वह मंदिर के पुजारी के रूप में हरिशंकर ब्रह्मचारी (आजाद) का सम्मान करते थे। आजाद ने सिपाहियों को समझाया कि मलखान धार्मिक व्यक्ति हैं इनका किसी भी बागी से कोई संपर्क नहीं है तब कहीं ओरछा रियासत के सिपाही वापस लौटे। इस तरह की घटनाओं को लेकर आजाद काफी चिंतित रहने लगे थे, रियासत की पुलिस के अलावा अब फिरंगी पुलिस भी ढिमरपुरा गांव और सातार नदीं के तट पर कुछ ज्यादा ही शिकंजा कस रही थी, इसे देखते हुए एक दिन अचानक आजाद ने मलखान सिंह से कहा कि अब यहां मेरा समय पूरा हो गया है यहां रहने पर आप भी मुसीबत में पड़ सकते हैं और वे यहां से इलाहाबाद के लिए रवाना हो गए। पर यह कोई नहीं जानता था कि ओरछा से इलाहाबाद का उनका यह सफर अनंत की ओर होगा।

आजादपुरा (ढमिरपुरा) में मलखान सिंह तोमर का वह पुराना मकान जहां पर चंद्रशेखर आजाद भोजन करने आते थे?
विज्ञापन