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साधन कम, दिक्कतें ज्यादा, रंगमंच कलाकार ढूंढ रहे जिंदगी के रंग
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झांसी। रंगमंच एक ऐसा मंच है जहां नाट्य और संस्कृति में रची-बसी चंद प्रस्तुतियां व्यक्ति के जीवन के रंग को दर्शाती हैं। झांसी के रंगमंच में भी कला के तमाम पारखी हैं, जो कम संसाधनों और तमाम दिक्कतों के बाद भी यहां की संस्कृति को रंगमंच में ढाल कर जिदंगी के रंगों से बांध रहे हैं। कहीं आर्थिक संकट और कहीं युवाओं का रुझान न होना इनके रास्ते का रोड़ा बन रहा है लेकिन रंगमंच के साधक अकेले ही इसे संवार रहे हैं।
झांसी में सिद्धेश्वर नगर में चल रहे बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र की स्थापना डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने वर्ष 2007 में शौकिया रंगमंच संस्था के रूप में की थी। इसे साथ मिलकर संवारने वाले डॉ. कृपांशु बताते हैं कि यह संस्था 12 वर्षों से नाट्य कला, लोक संस्कृति साहित्य, संस्कृत रंगमंच, बुंदेली लोकनृत्य-लोकगीत, आधुनिक रंगमंच और रंग-संगीत की दिशा में काम कर रही है। संस्था 70 से अधिक बार मंचन कर चुकी है। वहीं, वीरांगना झलकारीबाई नाट्य समिति वर्ष 1993 से रंगमंच से जुड़ी है। समिति में 20 लोगों की टीम शिमवा, पटना, मुगलसराय और आगरा समेत कई स्थानों पर अपनी प्रस्तुतियां दे चुकी है। संस्था के वरिष्ठ कलाकार रेलवे से रिटायर्ड ब्रह्मदीन बंधु, शीलचंद्र और रोडवेज से रिटायर्ड वरिष्ठ रंगमंच कलाकार सुरेश चंद्र बताते हैं कि अच्छे संसाधन मिलें तो झांसी के रंगमंच में चार चांद लग सकते हैं।
राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विवि ग्वालियर में नाटक एवं रंगमंच संकाय के विभागाध्यक्ष डॉ. हिमांशु द्विवेदी बताते हैं कि उन्होंने 50 से अधिक नाटकों में अभिनय और 30 से अधिक नाटकों का निर्देशन किया है। इन्हें नटराज सम्मान, कला गुरु सम्मान व बुंदेलखंड गौरव सम्मान सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। इनका कहना है कि रंगमंच की दिशा में अभी और काम की जरूरत है।
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बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र के निर्देशक डॉ. कृपांशु द्विवेदी का कहना है किरंगमंच के प्रति लोगों में जागरूकता नहीं है। आज युवा सेलिब्रेटी बनना चाहते हैं लेकिन रंगमंच के बारे में लिखना-पढ़ना नहीं चाहते हैं। इस क्षेत्र को सही ढंग से समझें और आगे बढ़ें तो रंगमंच में भी करियर बनाने के हजारों रास्ते और रोजगार के अवसर खुले पड़े हैं।
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72 साल के वरिष्ठ रंगमंच कलाकार रामस्वरूप चक बताते हैं कि कलाकारों को सम्मान मिलना बहुत जरूरी है। बुंदेलखंड का रंगमंच समृद्ध है लेकिन इसे संवारने के लिए कलाकारों की अनदेखी ठीक नहीं है। साथ ही इसे दिशा में युवाओं का आगे आना बहुत जरूरी है। झांसी के रंगमंच के लिए सरकार को कुछ पहल करनी चाहिए।
वीरांगना झलकारीबाई नाट्य समिति के निर्देशक वरिष्ठ कलाकार माता प्रसाद शाक्य का कहना है कि बुंदेलखंड के कई रंगमंच कलाकार बेरोजगार हैं। उनके पास मंचन के साधन नहीं है। उनकी टीम में चार महिलाओं के साथ 20 लोग हैं लेकिन अधिकांश के पास संसाधन नहीं हैं। टीम कम साधनों में भी कला को संवारने का काम कर रही है।
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झांसी में सिद्धेश्वर नगर में चल रहे बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र की स्थापना डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने वर्ष 2007 में शौकिया रंगमंच संस्था के रूप में की थी। इसे साथ मिलकर संवारने वाले डॉ. कृपांशु बताते हैं कि यह संस्था 12 वर्षों से नाट्य कला, लोक संस्कृति साहित्य, संस्कृत रंगमंच, बुंदेली लोकनृत्य-लोकगीत, आधुनिक रंगमंच और रंग-संगीत की दिशा में काम कर रही है। संस्था 70 से अधिक बार मंचन कर चुकी है। वहीं, वीरांगना झलकारीबाई नाट्य समिति वर्ष 1993 से रंगमंच से जुड़ी है। समिति में 20 लोगों की टीम शिमवा, पटना, मुगलसराय और आगरा समेत कई स्थानों पर अपनी प्रस्तुतियां दे चुकी है। संस्था के वरिष्ठ कलाकार रेलवे से रिटायर्ड ब्रह्मदीन बंधु, शीलचंद्र और रोडवेज से रिटायर्ड वरिष्ठ रंगमंच कलाकार सुरेश चंद्र बताते हैं कि अच्छे संसाधन मिलें तो झांसी के रंगमंच में चार चांद लग सकते हैं।
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राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विवि ग्वालियर में नाटक एवं रंगमंच संकाय के विभागाध्यक्ष डॉ. हिमांशु द्विवेदी बताते हैं कि उन्होंने 50 से अधिक नाटकों में अभिनय और 30 से अधिक नाटकों का निर्देशन किया है। इन्हें नटराज सम्मान, कला गुरु सम्मान व बुंदेलखंड गौरव सम्मान सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। इनका कहना है कि रंगमंच की दिशा में अभी और काम की जरूरत है।
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बुंदेलखंड नाट्य कला केंद्र के निर्देशक डॉ. कृपांशु द्विवेदी का कहना है किरंगमंच के प्रति लोगों में जागरूकता नहीं है। आज युवा सेलिब्रेटी बनना चाहते हैं लेकिन रंगमंच के बारे में लिखना-पढ़ना नहीं चाहते हैं। इस क्षेत्र को सही ढंग से समझें और आगे बढ़ें तो रंगमंच में भी करियर बनाने के हजारों रास्ते और रोजगार के अवसर खुले पड़े हैं।
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72 साल के वरिष्ठ रंगमंच कलाकार रामस्वरूप चक बताते हैं कि कलाकारों को सम्मान मिलना बहुत जरूरी है। बुंदेलखंड का रंगमंच समृद्ध है लेकिन इसे संवारने के लिए कलाकारों की अनदेखी ठीक नहीं है। साथ ही इसे दिशा में युवाओं का आगे आना बहुत जरूरी है। झांसी के रंगमंच के लिए सरकार को कुछ पहल करनी चाहिए।
वीरांगना झलकारीबाई नाट्य समिति के निर्देशक वरिष्ठ कलाकार माता प्रसाद शाक्य का कहना है कि बुंदेलखंड के कई रंगमंच कलाकार बेरोजगार हैं। उनके पास मंचन के साधन नहीं है। उनकी टीम में चार महिलाओं के साथ 20 लोग हैं लेकिन अधिकांश के पास संसाधन नहीं हैं। टीम कम साधनों में भी कला को संवारने का काम कर रही है।