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लालाराम वाजपेयी ने फिरंगी सरकार को चुनौती देकर फहराया था तिरंगा
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झांसी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1939 में महात्मा गांधी द्वारा पूरे देश में झंडा सत्याग्रह चलाया जा रहा था। इसमें सत्याग्रहियों द्वारा जुलूस निकालकर अंग्रेज सरकार के दफ्तरों व रियासतों की इमारतों पर तिरंगा फहराकर फिरंगी सरकार के खिलाफ नारेबाजी करके देश की आजादी के संघर्ष में भाग लेने के लिए युवाओं को प्रेरित किया जाता था। इसी दौरान ओरछा रियासत में पड़ने वाले बिनवारा गांव के युवक लाला वाजपेयी ने अंग्रेज सरकार को 30 जनवरी 1939 को पत्र लिखकर चुनौती दी थी कि वह अपने साथियों के साथ 8 फरवरी 1939 को थौना गांव में जुलूस निकालकर सरकारी इमारतों पर अंग्रेजी झंडे को उतारकर तिरंगा फहराएंगे। और तय तारीख को लालाराम वाजपेयी ने अपने चौबीस साथियों के साथ जुलूस निकालकर सरकारी इमारतों पर तिरंगा तो फहरा दिया पर इसके बाद अंग्रेजों की पुलिस व रियासत के सिपाहियों ने सत्याग्रहियों को घेरकर जिस तरह लाठीचार्ज व फायरिंग की वह दिल दहलाने वाली थी। इसमें चौबीस सत्याग्रही गंभीर रूप से घायल हुए थे।
फायरिंग की घटना पर जवाहर लाल नेहरू ने जताया था विरोध
स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की जानकारी रखने वाले नारायण सिंह गौर बताते हैं कि थौना में सत्याग्रह करने वाले युवकों पर की गई फायरिंग की सूचना पर उस दौर में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेता जवाहर लाल नेहरू ने इस मामले को तत्कालीन समाचारपत्रों व अन्य माध्यमों से उठाकर विरोध प्रदर्शन किया था। उन्होंने संकरे रास्ते से जा रहे आंदोलनकारियों को घेरकर पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी को अमानवीय बताया था। इस संबंध में तत्कालीन सरकार ने मामले की जांच के लिए तहसीलदार को नियुक्त किया था, पर जांच महज एक औपचारिकता ही साबित हुई थी।
वापस जाते समय रास्ते को दोनों ओर से घेरकर रोका था क्रांतिकारियों को
कृपाराम यादव बताते हैं कि लालाराम वाजपेयी अंग्रेजी सरकार को दी हुई चुनौती के अनुसार 8 फरवरी 1938 की दोपहर को अपने साथियों के साथ थौना गांव में पहुंच गए और इसके बाद उन्होंने तिरंगा लेकर सरकार और रियासत के खिलाफ नारेबाजी करते हुए जुलूस निकाला तथा सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहरा दिया। मौके पर पुलिस और रियासत के सैनिक चुपचाप देखते रहे, क्योंकि थौना गांव चारों ओर से झांसी रियासत से घिरा हुआ था, सत्याग्रहियों पर मौके पर लाठीचार्ज या फायरिंग का मतलब था कि झांसी के क्रांतिकारी यहां दखल दे सकते थे। आंदोलन खत्म होने के बाद थौना गांव से जैसे ही चौबीस युवक ओरछा राज्य की सीमा में घुसे तो एक ऐसा रास्ता जहां से दोनों ओर से घेराबंदी करने पर कोई भी नहीं निकल सकता था, उसी स्थान पर इन स्वतंत्र संग्राम सेनानियों को रोककर लाठी चार्ज कर दिया तथा फायरिंग कर दी। इसमें अलग-अलग जगह से आए आजादी के दीवाने गंभीर रूप से घायल हो गए। इनमें से कई तो जीवन पर्यंत चल फिर भी नहीं सके। अंग्रेजी हुकूमत ने भले ही इन क्रांतिकारियों को रोककर हमला कर दिया हो पर लालाराम वाजपेयी ने यह जता दिया था कि वे चुनौती देकर तिरंग फहरा सकते हैं।
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फायरिंग की घटना पर जवाहर लाल नेहरू ने जताया था विरोध
स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की जानकारी रखने वाले नारायण सिंह गौर बताते हैं कि थौना में सत्याग्रह करने वाले युवकों पर की गई फायरिंग की सूचना पर उस दौर में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेता जवाहर लाल नेहरू ने इस मामले को तत्कालीन समाचारपत्रों व अन्य माध्यमों से उठाकर विरोध प्रदर्शन किया था। उन्होंने संकरे रास्ते से जा रहे आंदोलनकारियों को घेरकर पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी को अमानवीय बताया था। इस संबंध में तत्कालीन सरकार ने मामले की जांच के लिए तहसीलदार को नियुक्त किया था, पर जांच महज एक औपचारिकता ही साबित हुई थी।
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वापस जाते समय रास्ते को दोनों ओर से घेरकर रोका था क्रांतिकारियों को
कृपाराम यादव बताते हैं कि लालाराम वाजपेयी अंग्रेजी सरकार को दी हुई चुनौती के अनुसार 8 फरवरी 1938 की दोपहर को अपने साथियों के साथ थौना गांव में पहुंच गए और इसके बाद उन्होंने तिरंगा लेकर सरकार और रियासत के खिलाफ नारेबाजी करते हुए जुलूस निकाला तथा सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहरा दिया। मौके पर पुलिस और रियासत के सैनिक चुपचाप देखते रहे, क्योंकि थौना गांव चारों ओर से झांसी रियासत से घिरा हुआ था, सत्याग्रहियों पर मौके पर लाठीचार्ज या फायरिंग का मतलब था कि झांसी के क्रांतिकारी यहां दखल दे सकते थे। आंदोलन खत्म होने के बाद थौना गांव से जैसे ही चौबीस युवक ओरछा राज्य की सीमा में घुसे तो एक ऐसा रास्ता जहां से दोनों ओर से घेराबंदी करने पर कोई भी नहीं निकल सकता था, उसी स्थान पर इन स्वतंत्र संग्राम सेनानियों को रोककर लाठी चार्ज कर दिया तथा फायरिंग कर दी। इसमें अलग-अलग जगह से आए आजादी के दीवाने गंभीर रूप से घायल हो गए। इनमें से कई तो जीवन पर्यंत चल फिर भी नहीं सके। अंग्रेजी हुकूमत ने भले ही इन क्रांतिकारियों को रोककर हमला कर दिया हो पर लालाराम वाजपेयी ने यह जता दिया था कि वे चुनौती देकर तिरंग फहरा सकते हैं।
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