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किसको कहें हैप्पी फादर्स डे: साथ नहीं मगर हर पल पास हैं पापा

Sun, 20 Jun 2021 01:06 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sun, 20 Jun 2021 01:06 AM IST
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kisko kahe happy fathurs day : sath nhi magar har pal pas hai papa
सचिन यादव अपने पिता अर्जुन सिंह व मां और भाई के साथ। (फाइल फोटो)
किसको कहें हैप्पी फादर्स डे: साथ नहीं मगर हर पल पास हैं पापा
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झांसी। पिता ऐसा रिश्ता जो बिना किसी स्वार्थ के ताउम्र अपने बच्चों की खुशियों के लिए जीता है। अपना सब कुछ बच्चों पर न्योछावर करता है। बच्चों की हर उपलब्धि उसे अपनी लगती है। उसके बच्चे ही उसके दिल की धड़कन होते हैं। जरा सोचिए, कोरोना काल ने जिनके पिता का साया उनसे छीन लिया, उनके आंसू कैसे रुके होंगे। वो बच्चे जो हर साल अपने प्यारे को सुबह-सुबह ‘हैप्पी फादर्स डे’ कहकर इसे सेलिब्रेट करते थे, वह उनके बिना कितना सूनापन महसूस कर रहे हैं। मगर संक्रमण ने कई परिवारों पर ऐसा प्रहार किया है, कई बच्चों के पापा उनसे दूर हो गए। अमर उजाला आज आपको ऐसे ही बच्चों की दास्तां बता रहा है।
बेटी बनाती थी ग्रीटिंग कार्ड, बेटा करता था विश
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में पत्रकारिता संस्थान के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. सीपी पैन्यूली की कोरोना से मौत हो चुकी है। वह अपनी पीछे पत्नी और बेटा-बेटी को छोड़ गए हैं। बेटा हर्षित बीयू कैंपस से ही बीएससी कर रहा है। हर्षित ने बताया कि हर बार फादर्स डे पर वह पिता को विश करता था। बाहर घूमने और रेस्टोरेंट में खाना खाने भी जाते थे। डॉ. पैन्यूली की दस साल की बेटी खुद ग्रीटिंग कार्ड बनाकर देती थी। हर्षित ने बताया कि पिता जरूर नहीं हैं, मगर उनकी सीख साथ है। पिता ने हमेशा ईमानदारी से रहने की बात कही। अब इसी सीख को लेकर वो आगे बढ़ेंगे। वह मजबूती से परिवार को संभालेगा। हालांकि, पिता की कमी हमेशा महसूस होगी।
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...इस सुबह नहीं कर पाऊंगा हैप्पी फादर्स डे
शिक्षा विभाग में क्लर्क रहे प्रेमगंज निवासी मनोज सक्सेना 29 दिन तक कोरोना से जंग लड़ते रहे। परिवार के हर संभव प्रयास के बावजूद वो बच नहीं पाए। उनका 18 साल का बेटा अंश सक्सेना दिन भर पिता की देखरेख में जुटा रहा। अंश ने बताया कि वह, उसका छोटा भाई और बड़ी बहन अंशी हर साल फादर्स डे पर पिता को सुबह उठकर विश करते थे। इस पल का उन्हें बेसब्री से इंतजार भी रहता था, मगर इस बार उनके चले जाने से सब कुछ अधूरा है। अंश ने बताया कि पिता हमेशा कहते थे कि आलस्य दिमाग को नष्ट कर देता है। हमेशा मेहनत करते रहो। अब ये सीख अपने छोटे भाई को दूंगा। उनके सपनों को पूरा करने की कोशिश करूंगा। पिता का सपना था कि एक बेटा पीसीएस अफसर बने, इसके लिए दिन-रात मेहनत करूंगा।
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किसके लिए सजाएं घर
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के आईटीएचएम विभाग में कार्यरत डॉ. शैलेंद्र तिवारी के बेटे प्रसर तिवारी (16) और बेटी प्रतिष्ठा (13) रविवार को उनकी फोटो रखकर फादर्स डे मनाएंगे। प्रखर ने बताया कि हर बार बहन प्रतिष्ठा पिता के लिए रंगीन ग्रीटिंग कार्ड बनाती थी। जबकि, वह गुब्बारे से घर और कमरे को सजा देता था। पिता भी इससे काफी खुश होते थे। पिछले बार उसने पिता को गणेश जी की मूर्ति फादर्स डे पर भेंट की थी। इस बार भी काफी उत्साह के साथ फादर्स डे मनाने की योजना थी लेकिन कोरोना ने पिता का साया उठा दिया। अचानक पिता से बिछड़ जाने की वजह से दोनों बच्चे और पूरा परिवार बहुत दुखी है। मगर पिता की खुशी के लिए वह इस बार भी फादर्स डे मनाएंगे। प्रखर ने बताया कि पिता को घर के सभी सदस्यों को जोड़कर रखना अच्छा लगता था। वह परिवार के साथ समय भी खूब बिताते थे। इसलिए सभी लोग मिलकर रहेंगे, ताकि वो जहां भी हों देखकर संतुष्ट रहें।
महसूस होता है कि पापा हमेशा साथ हैं
जेडीए कॉलोनी वीरांगना नगर निवासी देवव्रत के पिता हाकिम सिंह कौरव की मौत हाल ही में कोविड से हो गई थी। देवव्रत बताते हैं कि महज 48 वर्ष की उम्र में पिता का चले जाना घरवालों पर दुखों का पहाड़ टूटने जैसा है। उनकी दो बहनें कीर्ति और प्राप्ति सिंह और वह सब मिलकर हर साल पापा व मां साधना सिंह के साथ फादर्स डे मनाते थे। इस बार पापा नहीं हैं तो लग रहा है कि सब कुछ चला गया। सारी खुशियां मिट सी गई हैं। उन्हें अपने बिजनेसमैन पापा पर गर्व था और हमेशा रहेगा क्योंकि उन्होंने हमेशा अपने बच्चों की खुशी को ही तवज्जो दी। देवव्रत (21 वर्ष) बताते हैं कि वह अपने पापा के दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं। दोनों बहनों, मां और अपना ख्याल रखते हैं। अब वह पापा का बिजनेस संभाल रहे हैं। उन्हें महसूस होता है कि पापा का हाथ और उनकी आशाएं हमेशा उनके साथ हैं।
मेरे लिए सुपरमैन थे पापा
महज 12 वर्ष की बेटी सृष्टि का साथ छोड़कर गए उसके पापा प्रदीप द्विवेदी उसके लिए सुपरमैन थे। सृष्टि बताती हैं कि वे दुनिया के बेस्ट पापा थे। सिद्धेश्वर नगर कॉलोनी निवासी प्रदीप द्विवेदी पेशे से प्रॉपर्टी डीलर थे। इसी वर्ष वह कोरोना संक्रमित हुए और मात्र 47 वर्ष की उम्र में उनकी मौत हो गई। सृष्टि बताती है कि वह अपनी मां पल्लवी द्विवेदी और परिवार के बाकी लोगों के साथ रहती है। पापा ही उसकी पूरी दुनिया थे। हर साल वह अपने हाथों से कार्ड बनाकर सुबह-सुबह पापा को फादर्स डे विश करती थी। शाम को सब लोग आउटिंग पर जाते थे। इस बार पापा उसके साथ नहीं हैं, वह पापा की फोटो पर फूल चढ़ाकर फादर्स डे विश करेगी।। सृष्टि कहती हैं कि उसके पापा उसे कभी नाराज नहीं करते थे। अब वह भी पापा की तरह अपनी मां का ख्याल रखती है।
पापा के बिन अधूरा है सब कुछ
बीती एक मई को सचिन के पिता अर्जुन सिंह यादव (प्रधान) इस दुनिया को छोड़कर चले गए। करगुवां जी में रहने वाले सचिन यादव बताते हैं कि उनके पिता ग्राम कोलवां जिला झांसी से प्रधान का चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन मतगणना से पहले ही इसी वर्ष एक मई को कोरोना संक्रमण से उनका निधन हो गया। महज चार-पांच दिन में उनके परिवार की सारी खुशियां छिन गईं। पापा के न रहने पर उन्हें निर्विरोध प्रधान चुन लिया गया है, लेकिन वह अपने पापा के बिना खुद को अधूरा महसूस करते हैं। वह पापा का ट्रांसपोर्ट का बिजनेस भी संभालने लगे हैं। मां मालती यादव और छोटे भाई नरेंद्र यादव की देखभाल भी कर रहे हैं लेकिन पापा को खोने का दर्द दिल में हमेशा महसूस करते हैं। सचिन बताते हैं कि मात्र 42-43 वर्ष की उम्र में पापा का यूं साथ छोड़ जाना उनके लिए असहनीय है। पापा थे तो वह सब मिलकर फादर्स डे मनाते थे। अब सिर्फ पापा की यादें ही रह गई हैं।
भाई-बहन मिलकर केक मंगाते थे, गिफ्ट देते थे
कोरोना संक्रमण से तकरीबन डेढ़ महीने तक जूझते रहे शिवा भट्ट के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। शहर की मास्टर कॉलोनी में रहने वाले शिवा बताते हैं कि उनके पापा रवींद्र कुमार भट्ट की 59 वर्ष की उम्र में 11 अक्तूबर 2020 को मौत हो गई थी। उनके पापा झांसी के शिक्षा विभाग में वरिष्ठ लिपिक थे। शिवा बताते हैं कि पापा थे तब सब भाई-बहन मिलकर केक मंगाते थे और पापा के साथ फादर्स डे मनाते थे। उन्हें गिफ्ट देते थे। पापा भी बच्चों के साथ रहकर उस दिन खूब खुश होते थे, लेकिन इस साल पापा नहीं हैं, हर तीज-त्योहार उनके बिना खाली सा लगता है। मां मालती देवी, बड़े भाई विनय द्विवेदी, भाभी नीलम द्विवेदी, बहनें सपना शर्मा और रचना राणा सभी पापा को याद करते हैं। शिवा बताते हैं कि इस बार पापा की तस्वीर पर फूल माला चढ़ाकर उन्हें नमन करेंगे। उन्होंने बताया कि तीन जुलाई को उनकी शादी होनी है, पापा होते तो बात ही कुछ और होती।
मौत से दस दिन पहले ही मनाया था पापा का बर्थडे
शहर में खंडेराव गेट गांधी भवन के पास रहने वाली अंकिता मिश्रा के पापा देव नारायण मिश्रा आज इस दुनिया में नहीं हैं। एक साल तक कैंसर की बीमारी से जूझते हुए कोरोना काल में इसी वर्ष 20 अप्रैल को उनकी मौत हो गई थी। अंकिता बताती हैं कि सब भाई-बहन हर साल पापा के साथ बहुत ही बढ़िया तरीके से फादर्स डे और पापा का बर्थ डे मनाते थे। पापा की मौत से मात्र 10 दिन पहले 10 अप्रैल को पापा का बर्थडे था। कोरोना काल में मार्केट बंद था इसलिए घर पर ही केक बनाकर पूरे परिवार के साथ सेलिब्रेट किया था। पिछले साल फादर्स डे पर बड़ा सेलिब्रेशन किया था। रविवार को फादर्स डे है, पापा हमारे साथ नहीं हैं, लेकिन उनका आशीर्वाद हमेशा हम सबके साथ है। पापा ठेकेदारी का काम करते थे। परिवार में छोटा भाई अभिशेष (लॉ स्टूडेंट), मां किरन मिश्रा और दो शादीशुदा बड़ी बहनें आकांक्षा दीक्षित और अंजू विनीत हैं। अंकिता ने बताया अब वह भी नौकरी करने लगी हैं।

एक पिता की व्यथा: इस बार न तोहफा आएगा न बेटा
कोरोना काल में बेटे अर्पित जैन (28) और पत्नी सुनीता दोनों को खो चुके ललितपुर के सिविल लाइन निवासी अवनीश जैन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। अवनीश ने बताया कि 20 मार्च को ही उनके बेटे की शादी हुई थी। परिवार का हर व्यक्ति बहुत खुद था मगर ये खुशियां चंद दिनों की मेहमान थी। कोविड की वजह से 14 अप्रैल को पत्नी और 20 को बेटे की मौत हो गई। उन्होंने बताया कि इंजीनियर बेटा गुरुग्राम में नौकरी करता था। मगर लगातार फोन पर हालचाल लेता रहता था। हर फादर्स डे पर सबसे पहला फोन बेटे का आता था। अगर वह घर नहीं आ पाता तो ऑनलाइन तोहफा भेजता था। इस फादर्स पर ये सबकुछ नहीं होगा। उन्होंने बताया कि माता-पिता दोनों से बेटे को बहुत प्यार था। हालत बिगड़ने पर उसने पहले मां को रेमडेसिविर इंजेक्शन लगाने के लिए कहा और खुद को मना कर दिया। तब एक-एक रेमडेसिविर की व्यवस्था बहुत मुश्किल से हो पा रही थी।
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