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Jhansi: डैम से निकले 5.67 करोड़ के ग्रेनाइट चोरी...कैग का खुलासा, अफसरों के साथ मिलकर ठेकेदारों ने किया खेल
Tue, 26 Aug 2025 10:03 AM IST
दीपक महाजन
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
Published by: दीपक महाजन
Updated Tue, 26 Aug 2025 10:03 AM IST
सार
करार के प्रावधानों के विपरीत पूरा ग्रेनाइट पत्थर ठेकेदार को निर्गत कर दिया गया। 1.28 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर का अभी तक पता नहीं चल सका। कैग ने इस मामले में सिंचाई अफसरों से जवाब मांगा है।
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कैग।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
लहचूरा बाध के निर्माण के समय निकले 5.67 करोड़ रुपये कीमत के ग्रेनाइट पत्थरों का आज तक पता नहीं चल सका। सिंचाई अफसरों के साथ ठेकेदारों ने मिलकर करोड़ों रुपये के बेशकीमती पत्थर गायब कर दिए। कैग ने अपनी लंबी जांच पड़ताल के दौरान यह गड़बड़ी पकड़ी। रिपोर्ट में ग्रेनाइट की लागत वसूल किए जाने समेत दोषी अफसरों की जवाबदेही तय करने की बात भी कही।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने बाणसागर नहर परियोजना एवं चौधरी चरण सिंह लहचूरा डैम आधुनिकीकरण परियोजना के सतत सिंचाई के प्रतिफल के निष्पादन कार्यों का ऑडिट किया था। इस रिपोर्ट में लहचूरा और पहाड़ी डैम में बरती गई कई अनियमितताएं उजागर हुई। डैम से निकले करोड़ों के ग्रेनाइट पत्थरों में भी घोटाला हुआ।
सात साल बाद भी कुछ नहीं पता
कैग रिपोर्ट के मुताबिक बांध निर्माण के दौरान ठेकेदार मेसर्स ईपीआई के साथ किए गए करार में प्रावधान था कि बांध एवं इसके साथ जुड़े कार्यों के लिए खुदाई के दौरान मिली सामग्रियों का इस्तेमाल परियोजना की विभिन्न संरचनाओं के निर्माण में होगा। लेखा परीक्षा के दौरान पाया गया कि 9 साल तक हुई खुदाई के दौरान 2.78 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर निकले। कार्यस्थल के पास यह पत्थर स्टॉक किया गया। स्टॉक लेखे में भी यह दर्ज हुआ, लेकिन करार के प्रावधानों के विपरीत पूरा ग्रेनाइट पत्थर ठेकेदार को निर्गत कर दिया गया। हालांकि इस दौरान करीब 1.50 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर का उपयोग निर्माण में हुआ। शेष 5.67 करोड़ रुपये कीमत का 1.28 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर का अभी तक पता नहीं चल सका। कैग ने इसके बारे में सिंचाई अफसरों से जवाब भी मांगा, लेकिन खंड के अफसर कार्य पूरा होने की तारीख से सात साल बाद भी ग्रेनाइट पत्थर ठेकेदार के पास होने के बारे में कुछ नहीं बता सके।
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अफसरों को किया गया तलब
कैग की आपत्ति के बाद भी सिंचाई अफसरों ने 1.28 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर की वापसी के लिए भी कोई पत्राचार किया और न ठेकेदार से ग्रेनाइट पत्थरों की कीमत आरोपित करके वसूली हुई। कैग के प्रतिवेदन शासन भेजा। शासन की और से दिए जवाब में कहा गया कि एमओयू के अनुसार खुदाई में प्राप्त सामग्रियां प्रयोग के लिए उपयुक्त न होने के कारण ठेकेदार से कोई बसूली नहीं हुई। कैग ने शासन के में इस जवाब को मानने से इन्कार करते के हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा कि खुदाई के दौरान निकले ग्रेनाइट को समुचित तौर पर स्टॉक किया गया क था। इस माह रिपोर्ट के आधार पर अफसरों को तलब भी किया गया।
लेटलतीफी पर भी कैग ने उठाए सवाल
कैग ने लहचूरा एवं पहाड़ी बांध की लेटलतीफी पर भी सवाल खड़े किए। कैग रिपोर्ट के मुताबिक लहचूरा एवं पहाड़ी जैम को संरचनाएं पुरानी एवं अप्रचलित हो गई थीं। इस कारण पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए मौजूदा शटर व्यवस्था मानसून के दौरान परिचालन में समस्या पैदा कर रही थी। लहचूरा डैम परियोजना फरवरी 1974 में 7.04 करोड़ की अनुमानित लागत पर अनुमोदित की गई थी। इससे जुड़ी पहाड़ी बांध परियोजना फरवरी 2008 में 76.68 करोड़ रुपये से अनुमोदित हुई। कार्यों की धीमी प्रगति के कारण लहचूरा बांध की लागत 2014 में बढ़कर 328.30 करोड़ हो गई जबकि पहाड़ी डैम की लागत बढ़कर 354.20 करोड़ हो गई। इस वजह से सरकारी खजाने को चपत लगी।
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भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने बाणसागर नहर परियोजना एवं चौधरी चरण सिंह लहचूरा डैम आधुनिकीकरण परियोजना के सतत सिंचाई के प्रतिफल के निष्पादन कार्यों का ऑडिट किया था। इस रिपोर्ट में लहचूरा और पहाड़ी डैम में बरती गई कई अनियमितताएं उजागर हुई। डैम से निकले करोड़ों के ग्रेनाइट पत्थरों में भी घोटाला हुआ।
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सात साल बाद भी कुछ नहीं पता
कैग रिपोर्ट के मुताबिक बांध निर्माण के दौरान ठेकेदार मेसर्स ईपीआई के साथ किए गए करार में प्रावधान था कि बांध एवं इसके साथ जुड़े कार्यों के लिए खुदाई के दौरान मिली सामग्रियों का इस्तेमाल परियोजना की विभिन्न संरचनाओं के निर्माण में होगा। लेखा परीक्षा के दौरान पाया गया कि 9 साल तक हुई खुदाई के दौरान 2.78 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर निकले। कार्यस्थल के पास यह पत्थर स्टॉक किया गया। स्टॉक लेखे में भी यह दर्ज हुआ, लेकिन करार के प्रावधानों के विपरीत पूरा ग्रेनाइट पत्थर ठेकेदार को निर्गत कर दिया गया। हालांकि इस दौरान करीब 1.50 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर का उपयोग निर्माण में हुआ। शेष 5.67 करोड़ रुपये कीमत का 1.28 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर का अभी तक पता नहीं चल सका। कैग ने इसके बारे में सिंचाई अफसरों से जवाब भी मांगा, लेकिन खंड के अफसर कार्य पूरा होने की तारीख से सात साल बाद भी ग्रेनाइट पत्थर ठेकेदार के पास होने के बारे में कुछ नहीं बता सके।
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अफसरों को किया गया तलब
कैग की आपत्ति के बाद भी सिंचाई अफसरों ने 1.28 लाख घन मीटर ग्रेनाइट पत्थर की वापसी के लिए भी कोई पत्राचार किया और न ठेकेदार से ग्रेनाइट पत्थरों की कीमत आरोपित करके वसूली हुई। कैग के प्रतिवेदन शासन भेजा। शासन की और से दिए जवाब में कहा गया कि एमओयू के अनुसार खुदाई में प्राप्त सामग्रियां प्रयोग के लिए उपयुक्त न होने के कारण ठेकेदार से कोई बसूली नहीं हुई। कैग ने शासन के में इस जवाब को मानने से इन्कार करते के हुए अपनी रिपोर्ट में लिखा कि खुदाई के दौरान निकले ग्रेनाइट को समुचित तौर पर स्टॉक किया गया क था। इस माह रिपोर्ट के आधार पर अफसरों को तलब भी किया गया।
लेटलतीफी पर भी कैग ने उठाए सवाल
कैग ने लहचूरा एवं पहाड़ी बांध की लेटलतीफी पर भी सवाल खड़े किए। कैग रिपोर्ट के मुताबिक लहचूरा एवं पहाड़ी जैम को संरचनाएं पुरानी एवं अप्रचलित हो गई थीं। इस कारण पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए मौजूदा शटर व्यवस्था मानसून के दौरान परिचालन में समस्या पैदा कर रही थी। लहचूरा डैम परियोजना फरवरी 1974 में 7.04 करोड़ की अनुमानित लागत पर अनुमोदित की गई थी। इससे जुड़ी पहाड़ी बांध परियोजना फरवरी 2008 में 76.68 करोड़ रुपये से अनुमोदित हुई। कार्यों की धीमी प्रगति के कारण लहचूरा बांध की लागत 2014 में बढ़कर 328.30 करोड़ हो गई जबकि पहाड़ी डैम की लागत बढ़कर 354.20 करोड़ हो गई। इस वजह से सरकारी खजाने को चपत लगी।