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आजादी की लड़ाई में झांसी के सपूतों की देश, विदेश में धाक
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jhansi freedom fighter
झांसी। देश की आजादी की लड़ाई में झांसी के रणबांकुरों की धाक देश, विदेश तक में रही है। गांधीवादी आंदोलन हो अथवा सशस्त्र क्रांति का रास्ता। इन दोनों ही सिद्धांतों पर झांसी के सपूतों ने अपनी अहम भूमिकाएं निभाई हैं। आज भी देश के ऐतिहासिक पन्नों में इनके नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं। जिन्होंने अंग्रेजों के दमन चक्र का मुंह तोड़ जवाब दिया।
वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई, महान क्त्रसंतिकारी चंद्रशेखर आजाद की कर्म भूमि झांसी में पंडित परमानंद का अहम नाम है। राठ में जन्मे पंडित परमानंद गदर पार्टी से भी जुड़े रहे। इनकी क्रांतिकारी गतिविधियां कोलकाता, रंगून, चीन, जापान और अमेरिका में भी रही। साहित्यकार जानकी शरण वर्मा बताते हैं कि यह लगभग छह हजार राइफल्स लेकर पानी के जहाज से आ रहे थे। लेकिन इन्हें बीच रास्ते में अंग्रेजों ने पकड़ लिया। हालांकि वह किसी प्रकार से बच गए और सिंगापुर पहुंच गए। देश की आजादी की लड़ाई में पंडित परमानंद का हमेशा अहम योगदान रहा है। 1923 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने झांसी में पार्टी की शाखा खोलने के लिए प्रसिद्ध क्त्रसंतिकारी शचीन्द्र नाथ बख्शी को नियुक्त किया। इसके बाद मास्टर रूद्र नारायण सिंह, भगवानदास माहौर, सदाशिव राव मलकापुरकर, विश्वनाथ गंगाधर वैशंपायन सहित कई युवा इस संगठन से जुड़े। जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना तन मन धन सब कुछ अर्पण कर दिया।
इसी प्रकार से महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आंदोलनों में भी झांसी के कई युवा जुडे। इनमें रघुनाथ विनायक धूलेकर, आत्माराम गोविंद खेर, कुंज बिहारी, शिवानी, रामेश्वर प्रसाद शर्मा, मास्टर छेदीलाल, बाबूलाल उदैनिया, सेठ मुरलीधर अग्रवाल, पुरुषोत्तम नारायण जोशी, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीनिवास गुप्ता रुस्तम, सेटिंन जी कालिका प्रसाद अग्रवाल, कालीचरन निगम आदि कई नाम हैं। भारत छोड़ो आंदोलन, नमक सत्याग्रह सहित कई आंदोलनों में सक्रिय है। यही वजह है कि झांसी के विशिष्ट योगदान को देखते हुए महात्मा गांधी करीब तीन बार झांसी आए। 30 नवंबर 1920 को महात्मा गांधी के स्वागत के लिए समूची झांसी नगरी को भव्यता के साथ सजाया गया था। गांधीजी के समक्ष ही विदेशी वस्त्रों की होली भी जलाई गई थी। इतिहासकार डॉ. चित्रगुप्त श्रीवास्तव के अनुसार शहर के अलावा ग्रामीण अंचलों में भी करो या मरो आंदोलन का व्यापक विस्तार हुआ था। चिरगांव, बरुआसागर, मऊरानीपुर, गुरसराय सहित कई ग्रामीण इलाकों में ग्रामीणों ने आंदोलन में हिस्सा लिया था।
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वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई, महान क्त्रसंतिकारी चंद्रशेखर आजाद की कर्म भूमि झांसी में पंडित परमानंद का अहम नाम है। राठ में जन्मे पंडित परमानंद गदर पार्टी से भी जुड़े रहे। इनकी क्रांतिकारी गतिविधियां कोलकाता, रंगून, चीन, जापान और अमेरिका में भी रही। साहित्यकार जानकी शरण वर्मा बताते हैं कि यह लगभग छह हजार राइफल्स लेकर पानी के जहाज से आ रहे थे। लेकिन इन्हें बीच रास्ते में अंग्रेजों ने पकड़ लिया। हालांकि वह किसी प्रकार से बच गए और सिंगापुर पहुंच गए। देश की आजादी की लड़ाई में पंडित परमानंद का हमेशा अहम योगदान रहा है। 1923 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने झांसी में पार्टी की शाखा खोलने के लिए प्रसिद्ध क्त्रसंतिकारी शचीन्द्र नाथ बख्शी को नियुक्त किया। इसके बाद मास्टर रूद्र नारायण सिंह, भगवानदास माहौर, सदाशिव राव मलकापुरकर, विश्वनाथ गंगाधर वैशंपायन सहित कई युवा इस संगठन से जुड़े। जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना तन मन धन सब कुछ अर्पण कर दिया।
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इसी प्रकार से महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले राष्ट्रीय आंदोलनों में भी झांसी के कई युवा जुडे। इनमें रघुनाथ विनायक धूलेकर, आत्माराम गोविंद खेर, कुंज बिहारी, शिवानी, रामेश्वर प्रसाद शर्मा, मास्टर छेदीलाल, बाबूलाल उदैनिया, सेठ मुरलीधर अग्रवाल, पुरुषोत्तम नारायण जोशी, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीनिवास गुप्ता रुस्तम, सेटिंन जी कालिका प्रसाद अग्रवाल, कालीचरन निगम आदि कई नाम हैं। भारत छोड़ो आंदोलन, नमक सत्याग्रह सहित कई आंदोलनों में सक्रिय है। यही वजह है कि झांसी के विशिष्ट योगदान को देखते हुए महात्मा गांधी करीब तीन बार झांसी आए। 30 नवंबर 1920 को महात्मा गांधी के स्वागत के लिए समूची झांसी नगरी को भव्यता के साथ सजाया गया था। गांधीजी के समक्ष ही विदेशी वस्त्रों की होली भी जलाई गई थी। इतिहासकार डॉ. चित्रगुप्त श्रीवास्तव के अनुसार शहर के अलावा ग्रामीण अंचलों में भी करो या मरो आंदोलन का व्यापक विस्तार हुआ था। चिरगांव, बरुआसागर, मऊरानीपुर, गुरसराय सहित कई ग्रामीण इलाकों में ग्रामीणों ने आंदोलन में हिस्सा लिया था।
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