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‘57 से 47’ आजादी के लिए लड़ता रहा झांसी
amarujala
Updated Tue, 15 Aug 2017 12:50 AM IST
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fort jhansi news
- फोटो : demo
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झांसी।
देश की आजादी के इतिहास में झांसी की बड़ी भूमिका रही है। स्वराज्य की खातिर 1857 में रानी लक्ष्मीबाई की अगुवाई में क्रांति का सूत्रपात झांसी से हुआ था। बाद में आगे की पीढ़ी के क्रांतिकारी रानी की गौरवशाली परंपरा का परचम हाथ में थामे रहे। गांधी जी के अहिंसक आंदोलनों को झांसी से जमकर समर्थन मिला, तो गर्म दल के क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का भी यहां के लोगों ने भरपूर साथ दिया।
1857 की क्रांति
देश की आजादी के नब्बे साल पहले झांसी में स्वराज्य का बिगुल फूंक दिया गया था। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहली बार संग्राम झांसी से शुरू हुआ था। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में झांसी ने 1857 में अंग्रेजी फौज से लोहा लिया। इस युद्ध रानी का साथ उनकी सेना के अलावा झांसी की पूरी जनता ने दिया था। न जाति-धर्म का भेद था और न ही स्त्री पुरुष का। महिलाओं ने इस युद्ध में बड़ी भूमिका अदा की थी। रानी की महिला सैनिकों की टुकड़ी ने अंग्रेजी फौज के छक्के छुड़ा दिए थे और रानी के प्राणों की रक्षा के लिए वीरांगना झलकारी बाई अपनी जान हंसते-हंसते देने को तैयार हो गईं थीं। गुलमा गौस खां ने अपनी तोपों से फिरंगी फौजों पर हमला बोला, तो पठान सैनिकों की टुकड़ी साये की तरह रानी की आखिरी सांस तक उनके साथ रही।
1920 में झांसी आए थे गांधी
अंग्रेजों के खिलाफ छेड़े गए असहयोग आंदोलन के लिए सहयोग मांगने महात्मा गांधी 30 नवंबर 1920 को झांसी आए थे। यहां उन्होंने सार्वजनिक सभा कर लोगों को अंग्रेजी सरकार का असहयोग करने को प्रेरित किया था, जिसका खास असर हुआ था। गांव-गांव में विदेश कपड़ों की होली जलाई गई थी। किसान से लेकर व्यापारी तक असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए थे। झांसी में गांधी जी एसपीआई इंटर कॉलेज में ठहरे थे और उन्होंने विद्यालय के लिए लोगों से चंदा देने की भी अपील की थी।
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मेरठ षणयंत्र केस
मार्च 1929 में अनेक साम्यवादी नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर केस चलाए गए। यही केस मेरठ षणयंत्र केस के नाम से जाना जाता है। इसमें झांसी के अयोध्या प्रसाद और लक्ष्मण राव कदम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार से समझौता करने के लिए दो मार्च 1930 को लार्ड इरविन को पत्र लिखा, इसका संतोषजनक जवाब न आने पर महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का सहारा लिया।
नमक सत्याग्रह
छह अप्रैल 1930 को महात्मा गांधी ने समुद्र तट पर नमक बनाकर नमक सत्याग्रह शुरू किया। झांसी में नमक सत्याग्रह 12 अप्रैल को शुरू हुआ। इसे सफल बनाने के लिए झांसी में रघुनाथ विनायक धुलेकर के नेतृत्व में तीन जत्थे बनाए गए, जिनकी कमान सीताराम भास्कर भागवत, कुंज बिहारी लाल शिवानी और लक्ष्मण राव कदम को सौंपी गई। सभी जत्थे अलग-अलग मार्गों से गुजरते हुए गांव-गांव में आजादी की अलख जलाते हुए औपारा पहुंचे। यहां हजारों लोगों की मौजूदगी में नमक बनाकर ब्रिटिश हुकूमत के नमक कानून को भंग किया गया।
अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन
गांधी जी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ 1942 में छेड़े गए अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में झांसी में जगह-जगह हड़तालें हुईं और विरोध प्रदर्शन करते हुए जुलूस निकाले गए। सरकारी कार्यालयों में तोड़फोड़ की गई, रेल की पटरियां उखाड़ी गईं और डाकखानों में आग लगा दी गई। ब्रिटिश पुलिस ने आत्माराम गोविंद खेर, कुंजबिहारी लाल शिवानी, लक्ष्मण राव कदम, रामेश्वर प्रसाद शर्मा, कृष्ण गोपाल शर्मा, मुरलीधर अग्रवाल समेत कई क्रांतिकारियों ने गिरफ्तारी दी।
झांसी में रहकर आजाद लड़े अंग्रेजों से
अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने अपनी जिंदगी के कई साल झांसी और आस पास के जंगलों में बिताए। ओरछा मार्ग स्थित सातार नदी के तट पर वह सन्यासी वेश में रहे। लेकिन अंग्रेज उन्हें छू भी नहीं सके। इस दौरान उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का विस्तार कर युवाओं में देश प्रेम का संचार किया। झांसी में उनके प्रमुख सहयोगियों में मास्टर रुद्रनारायण, सदाशिव राव मल्कापुर, विश्वनाथ गंगाधर वैशंपायन, भगवान माहौर आदि रहे। आजाद की स्मृतियां आज भी झांसी में लोगों को जुबानी याद है। उनकी मां जगरानी के जीवन अंतिम वर्ष भी झांसी में बीते थे।
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देश की आजादी के इतिहास में झांसी की बड़ी भूमिका रही है। स्वराज्य की खातिर 1857 में रानी लक्ष्मीबाई की अगुवाई में क्रांति का सूत्रपात झांसी से हुआ था। बाद में आगे की पीढ़ी के क्रांतिकारी रानी की गौरवशाली परंपरा का परचम हाथ में थामे रहे। गांधी जी के अहिंसक आंदोलनों को झांसी से जमकर समर्थन मिला, तो गर्म दल के क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का भी यहां के लोगों ने भरपूर साथ दिया।
1857 की क्रांति
देश की आजादी के नब्बे साल पहले झांसी में स्वराज्य का बिगुल फूंक दिया गया था। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहली बार संग्राम झांसी से शुरू हुआ था। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में झांसी ने 1857 में अंग्रेजी फौज से लोहा लिया। इस युद्ध रानी का साथ उनकी सेना के अलावा झांसी की पूरी जनता ने दिया था। न जाति-धर्म का भेद था और न ही स्त्री पुरुष का। महिलाओं ने इस युद्ध में बड़ी भूमिका अदा की थी। रानी की महिला सैनिकों की टुकड़ी ने अंग्रेजी फौज के छक्के छुड़ा दिए थे और रानी के प्राणों की रक्षा के लिए वीरांगना झलकारी बाई अपनी जान हंसते-हंसते देने को तैयार हो गईं थीं। गुलमा गौस खां ने अपनी तोपों से फिरंगी फौजों पर हमला बोला, तो पठान सैनिकों की टुकड़ी साये की तरह रानी की आखिरी सांस तक उनके साथ रही।
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1920 में झांसी आए थे गांधी
अंग्रेजों के खिलाफ छेड़े गए असहयोग आंदोलन के लिए सहयोग मांगने महात्मा गांधी 30 नवंबर 1920 को झांसी आए थे। यहां उन्होंने सार्वजनिक सभा कर लोगों को अंग्रेजी सरकार का असहयोग करने को प्रेरित किया था, जिसका खास असर हुआ था। गांव-गांव में विदेश कपड़ों की होली जलाई गई थी। किसान से लेकर व्यापारी तक असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए थे। झांसी में गांधी जी एसपीआई इंटर कॉलेज में ठहरे थे और उन्होंने विद्यालय के लिए लोगों से चंदा देने की भी अपील की थी।
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मेरठ षणयंत्र केस
मार्च 1929 में अनेक साम्यवादी नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर केस चलाए गए। यही केस मेरठ षणयंत्र केस के नाम से जाना जाता है। इसमें झांसी के अयोध्या प्रसाद और लक्ष्मण राव कदम को भी गिरफ्तार कर लिया गया। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार से समझौता करने के लिए दो मार्च 1930 को लार्ड इरविन को पत्र लिखा, इसका संतोषजनक जवाब न आने पर महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का सहारा लिया।
नमक सत्याग्रह
छह अप्रैल 1930 को महात्मा गांधी ने समुद्र तट पर नमक बनाकर नमक सत्याग्रह शुरू किया। झांसी में नमक सत्याग्रह 12 अप्रैल को शुरू हुआ। इसे सफल बनाने के लिए झांसी में रघुनाथ विनायक धुलेकर के नेतृत्व में तीन जत्थे बनाए गए, जिनकी कमान सीताराम भास्कर भागवत, कुंज बिहारी लाल शिवानी और लक्ष्मण राव कदम को सौंपी गई। सभी जत्थे अलग-अलग मार्गों से गुजरते हुए गांव-गांव में आजादी की अलख जलाते हुए औपारा पहुंचे। यहां हजारों लोगों की मौजूदगी में नमक बनाकर ब्रिटिश हुकूमत के नमक कानून को भंग किया गया।
अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन
गांधी जी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ 1942 में छेड़े गए अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में झांसी में जगह-जगह हड़तालें हुईं और विरोध प्रदर्शन करते हुए जुलूस निकाले गए। सरकारी कार्यालयों में तोड़फोड़ की गई, रेल की पटरियां उखाड़ी गईं और डाकखानों में आग लगा दी गई। ब्रिटिश पुलिस ने आत्माराम गोविंद खेर, कुंजबिहारी लाल शिवानी, लक्ष्मण राव कदम, रामेश्वर प्रसाद शर्मा, कृष्ण गोपाल शर्मा, मुरलीधर अग्रवाल समेत कई क्रांतिकारियों ने गिरफ्तारी दी।
झांसी में रहकर आजाद लड़े अंग्रेजों से
अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने अपनी जिंदगी के कई साल झांसी और आस पास के जंगलों में बिताए। ओरछा मार्ग स्थित सातार नदी के तट पर वह सन्यासी वेश में रहे। लेकिन अंग्रेज उन्हें छू भी नहीं सके। इस दौरान उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का विस्तार कर युवाओं में देश प्रेम का संचार किया। झांसी में उनके प्रमुख सहयोगियों में मास्टर रुद्रनारायण, सदाशिव राव मल्कापुर, विश्वनाथ गंगाधर वैशंपायन, भगवान माहौर आदि रहे। आजाद की स्मृतियां आज भी झांसी में लोगों को जुबानी याद है। उनकी मां जगरानी के जीवन अंतिम वर्ष भी झांसी में बीते थे।