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झांसी की बिजली भी होगी निजी हाथों में
Jhansi
Updated Tue, 20 Mar 2018 01:34 AM IST
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- फोटो : demo
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आने वाले एक-दो साल में महानगर की बिजली व्यवस्था की कमान निजी हाथों में होगी। उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन इस नीति पर काम करने में जुटा है। पहले चरण में पांच महानगरों का चयन किया गया है। दूसरे चरण में झांसी भी शामिल है।
तमाम प्रयासों के बाद बिजली का घाटा कम नहीं हो पा रहा है। पिछले पंद्रह सालों में अलग-अलग तरह के तीन मीटर व एबीसी कंडक्टर तार बदलने के बाद भी चालीस प्रतिशत बिजली चोरी अब भी हो रही है। विभागीय जानकारी के अनुसार प्रदेश में हर माह आठ अरब रुपये और झांसी जिले में पांच से छह करोड़ रुपये की बिजली चोरी हो जाती है। इसके अलावा ट्रांसफार्मर की खराबी, टूटे तार बदलना, नए खंभे लगवाना आदि कार्यों में अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं। इसे ध्यान में रखकर उत्तर प्रदेश कारपोरेशन बड़े शहरों में बिजली चोरी व मरम्मत के कामों से निजात पाने के लिए बिजली संचालन व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहा है। इस बार प्रदेश कैबिनेट ने मुरादाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, लखनऊ को निजी हाथों में देने की मंजूरी दी है। दूसरे चरण में झांसी, गोरखपुर, इलाहाबाद आदि शहरों के नाम शामिल हैं।
वहीं, उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन निजी हाथों में बिजली सौंपने से पहले अधिक से अधिक बकाया राजस्व वसूलना चाहता है। इस कड़ी में पिछले साल एक मुश्त समाधान योजना में शत-प्रतिशत ब्याज में छूट देकर कारपोरेशन बकायेदारों से अधिक से अधिक राजस्व वसूलने का प्रयास करता रहा। पांच हजार से ऊपर बिल होते ही कनेक्शन काटे जा रहे हैं। इसी तरह कर्मचारियों की भारी कमी के बाद भी नई भर्तियां नहीं की जा रही हैं। मार्च के बाद बिना नोटिस दिए ही बकायेदारों की आरसी काटने की तैयारी है। इन सभी कारणों के चलते अनुमान लगाया जा रहा है कि कारपोरेशन जल्द से जल्द व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहा है। अफसर व कर्मचारी भी इस बात को भलीभांति जानते हैं, लेकिन सभी कारपोरेशन की व्यवस्था बताकर कुछ भी कहने से इंकार कर रहे हैं।
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सरकारी बकाये ने बिगाड़ रखा गणित
उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन हर महीने आने वाले राजस्व से संबंधित शहर या ग्रामीण क्षेत्र के थ्रू रेट (बिजली खपत की तुलना में आने वाले राजस्व को भाग देकर निकाली जाने वाली गणना) का आकलन करता है। जबकि, बकाये में सबसे ज्यादा हिस्सा सरकारी विभागों का होता है, जो मार्च के महीने में ही समायोजन के रूप में ही मिलता है। जैसे कि, सूतीमिल सबस्टेशन के थापक बाग फीडर से जलसंस्थान का दतिया गेट फिल्टर का कनेक्शन जुड़ा है। इस कनेक्शन से हर महीने करीब 22 लाख रुपये की बिजली की खपत है। जबकि, फीडर पर हर महीने औसतन 38 से 39 लाख की बिजली की खपत है। विभाग, 38 लाख के हिसाब से क्षेत्र का थ्रू रेट निकालता है। जबकि, 22 लाख रुपये तो विभाग के पास आए ही नहीं हैं। अगर 22 लाख रुपये मिल जाते तो थ्रू रेट 9.61 रुपये होता, लेकिन आंकड़ों में तो 4.80 रुपये ही आ रहा है। यही हाल पूरे प्रदेश के सरकारी विभागों का है।
आगरा में टोरंट पावर को निजी हाथों में देने के परिणाम अच्छे नहीं हैं। इससे कारपोरेशन को नुकसान उठाना पड़ा। निजीकरण से आम लोगों की भी दिक्कतें बढ़ेंगी। पता चला है कि दूसरे चरण में झांसी का नाम भी शामिल है।
गौरव कुमार, अधिशासी अभियंता (प्रथम)
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तमाम प्रयासों के बाद बिजली का घाटा कम नहीं हो पा रहा है। पिछले पंद्रह सालों में अलग-अलग तरह के तीन मीटर व एबीसी कंडक्टर तार बदलने के बाद भी चालीस प्रतिशत बिजली चोरी अब भी हो रही है। विभागीय जानकारी के अनुसार प्रदेश में हर माह आठ अरब रुपये और झांसी जिले में पांच से छह करोड़ रुपये की बिजली चोरी हो जाती है। इसके अलावा ट्रांसफार्मर की खराबी, टूटे तार बदलना, नए खंभे लगवाना आदि कार्यों में अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं। इसे ध्यान में रखकर उत्तर प्रदेश कारपोरेशन बड़े शहरों में बिजली चोरी व मरम्मत के कामों से निजात पाने के लिए बिजली संचालन व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहा है। इस बार प्रदेश कैबिनेट ने मुरादाबाद, वाराणसी, गोरखपुर, लखनऊ को निजी हाथों में देने की मंजूरी दी है। दूसरे चरण में झांसी, गोरखपुर, इलाहाबाद आदि शहरों के नाम शामिल हैं।
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वहीं, उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन निजी हाथों में बिजली सौंपने से पहले अधिक से अधिक बकाया राजस्व वसूलना चाहता है। इस कड़ी में पिछले साल एक मुश्त समाधान योजना में शत-प्रतिशत ब्याज में छूट देकर कारपोरेशन बकायेदारों से अधिक से अधिक राजस्व वसूलने का प्रयास करता रहा। पांच हजार से ऊपर बिल होते ही कनेक्शन काटे जा रहे हैं। इसी तरह कर्मचारियों की भारी कमी के बाद भी नई भर्तियां नहीं की जा रही हैं। मार्च के बाद बिना नोटिस दिए ही बकायेदारों की आरसी काटने की तैयारी है। इन सभी कारणों के चलते अनुमान लगाया जा रहा है कि कारपोरेशन जल्द से जल्द व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रहा है। अफसर व कर्मचारी भी इस बात को भलीभांति जानते हैं, लेकिन सभी कारपोरेशन की व्यवस्था बताकर कुछ भी कहने से इंकार कर रहे हैं।
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सरकारी बकाये ने बिगाड़ रखा गणित
उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन हर महीने आने वाले राजस्व से संबंधित शहर या ग्रामीण क्षेत्र के थ्रू रेट (बिजली खपत की तुलना में आने वाले राजस्व को भाग देकर निकाली जाने वाली गणना) का आकलन करता है। जबकि, बकाये में सबसे ज्यादा हिस्सा सरकारी विभागों का होता है, जो मार्च के महीने में ही समायोजन के रूप में ही मिलता है। जैसे कि, सूतीमिल सबस्टेशन के थापक बाग फीडर से जलसंस्थान का दतिया गेट फिल्टर का कनेक्शन जुड़ा है। इस कनेक्शन से हर महीने करीब 22 लाख रुपये की बिजली की खपत है। जबकि, फीडर पर हर महीने औसतन 38 से 39 लाख की बिजली की खपत है। विभाग, 38 लाख के हिसाब से क्षेत्र का थ्रू रेट निकालता है। जबकि, 22 लाख रुपये तो विभाग के पास आए ही नहीं हैं। अगर 22 लाख रुपये मिल जाते तो थ्रू रेट 9.61 रुपये होता, लेकिन आंकड़ों में तो 4.80 रुपये ही आ रहा है। यही हाल पूरे प्रदेश के सरकारी विभागों का है।
आगरा में टोरंट पावर को निजी हाथों में देने के परिणाम अच्छे नहीं हैं। इससे कारपोरेशन को नुकसान उठाना पड़ा। निजीकरण से आम लोगों की भी दिक्कतें बढ़ेंगी। पता चला है कि दूसरे चरण में झांसी का नाम भी शामिल है।
गौरव कुमार, अधिशासी अभियंता (प्रथम)