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Jhansi: रुक्मणी विवाह प्रसंग सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु, जय श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंजा मेहंदी बाग मंदिर
Mon, 27 Jul 2026 07:49 PM IST
दीपक महाजन
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
Published by: दीपक महाजन
Updated Mon, 27 Jul 2026 07:49 PM IST
सार
मेहंदी बाग में स्थित राम जानकी मंदिर में चल रही भागवत कथा के छठे दिन कथा व्यास धर्मदास महाराज ने प्रेम, समर्पण और अटूट श्रद्धा का संदेश देते हुए रुक्मणी विवाह की कथा का मार्मिक वर्णन किया।
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भागवत कथा में मौजूद श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
गुरु पूर्णिमा पर्व के अवसर पर मेहंदी बाग में स्थित राम जानकी मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन रुक्मणी विवाह का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कथा व्यास अयोध्या धाम से पधारे संत धर्मदास महाराज ने प्रेम, समर्पण और अटूट श्रद्धा का संदेश देते हुए रुक्मणी विवाह की कथा का मार्मिक वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि विदर्भ नरेश की पुत्री रुक्मणी बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं। लेकिन उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। इससे व्यथित रुक्मणी ने एक ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को गुप्त पत्र भेजकर उन्हें इस बंधन से मुक्त कराने की प्रार्थना की। पत्र मिलते ही भगवान श्रीकृष्ण रथ लेकर विदर्भ पहुंचे और विवाह के दिन मंदिर से रुक्मणी का हरण कर उन्हें अपने साथ ले गए। रास्ते में रुक्मी ने सेना के साथ उनका पीछा किया, लेकिन युद्ध में पराजित हुआ। रुक्मणी के आग्रह पर श्रीकृष्ण ने उसका वध नहीं किया। संत धर्मदास ने कहा कि यह प्रसंग सच्चे प्रेम, विश्वास और समर्पण की विजय का प्रतीक है।
कथा के दौरान पूरा पंडाल भक्तिमय माहौल में डूबा रहा और जय श्रीराधे-कृष्ण के जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठा। कथा के आयोजक महंत प्रेम नारायण दास हैं। कार्यक्रम में देव पूजा, शालू, मिस्का, गोविंदा, चतुर सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। कथा के समापन पर विजय वल्लभ महाराज ने आरती कराई।
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उन्होंने बताया कि विदर्भ नरेश की पुत्री रुक्मणी बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति मान चुकी थीं। लेकिन उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। इससे व्यथित रुक्मणी ने एक ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को गुप्त पत्र भेजकर उन्हें इस बंधन से मुक्त कराने की प्रार्थना की। पत्र मिलते ही भगवान श्रीकृष्ण रथ लेकर विदर्भ पहुंचे और विवाह के दिन मंदिर से रुक्मणी का हरण कर उन्हें अपने साथ ले गए। रास्ते में रुक्मी ने सेना के साथ उनका पीछा किया, लेकिन युद्ध में पराजित हुआ। रुक्मणी के आग्रह पर श्रीकृष्ण ने उसका वध नहीं किया। संत धर्मदास ने कहा कि यह प्रसंग सच्चे प्रेम, विश्वास और समर्पण की विजय का प्रतीक है।
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कथा के दौरान पूरा पंडाल भक्तिमय माहौल में डूबा रहा और जय श्रीराधे-कृष्ण के जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठा। कथा के आयोजक महंत प्रेम नारायण दास हैं। कार्यक्रम में देव पूजा, शालू, मिस्का, गोविंदा, चतुर सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। कथा के समापन पर विजय वल्लभ महाराज ने आरती कराई।
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