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नेहरू जी के संदेश को अनदेखा कर चुनाव मैदान में डटे रहे थे डॉ. वृंदावन लाल वर्मा
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झांसी। बात है 1952 के विधानसभा चुनाव की। डा. वृंदावन लाल वर्मा झांसी विधानसभा से कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे, पर उन्हें टिकट नहीं मिला। उनकी जगह पार्टी ने आत्माराम गोविंद खेर को मैदान में उतार दिया। नाराज वृंदावन लाल वर्मा निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में आ गए। अपनी टीम के साथ पूरे दमखम से चुनाव लड़ा। हालांकि उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा पर वह पीछे नहीं हटे। इसी दौरान कांग्रेस प्रत्याशी खेर के प्रचार के लिए जीआईसी मैदान में पं. जवाहर लाल नेहरू आए। उन्होंने सभा को संबोधित करने के बाद डा. वृंदावन लाल वर्मा के मित्र राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के माध्यम से उन्हें संदेश भेजा कि कांग्रेस उन्हें कहीं और समायोजित कर लेगी, फिलहाल वह कांग्रेस प्रत्याशी को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दें।
डा. वृंदावन लाल वर्मा के पौत्र लक्ष्मीकांत वर्मा बताते हैं कि मैथिलीशरण गुप्त ने नेहरू जी का संदेश वर्मा जी को बताया तो वह मुस्कराए तथा कहा कि अब मैदान से हटने का कोई सवाल ही नहीं उठता। यह सब बातें नामांकन वापसी के पहले तक की थीं और उन्होंने पूरी ताकत के साथ कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ा। उन्होंने बताया कि इस बात से नेहरू जी नाराज हो गए तथा डा. वृंदावन लाल वर्मा को पद्मभूषण से अलंकृत करने की लंबे समय से चल रही मांग को अनदेखा कर दिया। बाद में लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में उन्हें इस सम्मान से अलंकृत किया गया।
तांगों से होता था प्रचार
उस दौर में ऑटो और कारों की संख्या न के बराबर थी, इसलिए तांगे में माइक बांधकर जगह-जगह जाकर वर्मा जी का प्रचार किया जाता था। इसके अलावा उनके ऊंट चुनाव चिह्न वाले परचे भी बांटे जाते थे। लक्ष्मीकांत बताते हैं कि तांगे वालों का वृंदावन जी से इतना लगाव था कि काफी आग्रह के बाद भी उन्होंने प्रचार के आधे पैसे लिए थे।
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डा. वृंदावन लाल वर्मा के पौत्र लक्ष्मीकांत वर्मा बताते हैं कि मैथिलीशरण गुप्त ने नेहरू जी का संदेश वर्मा जी को बताया तो वह मुस्कराए तथा कहा कि अब मैदान से हटने का कोई सवाल ही नहीं उठता। यह सब बातें नामांकन वापसी के पहले तक की थीं और उन्होंने पूरी ताकत के साथ कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ा। उन्होंने बताया कि इस बात से नेहरू जी नाराज हो गए तथा डा. वृंदावन लाल वर्मा को पद्मभूषण से अलंकृत करने की लंबे समय से चल रही मांग को अनदेखा कर दिया। बाद में लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में उन्हें इस सम्मान से अलंकृत किया गया।
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तांगों से होता था प्रचार
उस दौर में ऑटो और कारों की संख्या न के बराबर थी, इसलिए तांगे में माइक बांधकर जगह-जगह जाकर वर्मा जी का प्रचार किया जाता था। इसके अलावा उनके ऊंट चुनाव चिह्न वाले परचे भी बांटे जाते थे। लक्ष्मीकांत बताते हैं कि तांगे वालों का वृंदावन जी से इतना लगाव था कि काफी आग्रह के बाद भी उन्होंने प्रचार के आधे पैसे लिए थे।
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