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पिता ने टैक्सी चलाकर किया पालन पोषण, अब हॉकी में बड़ा नाम

Fri, 12 Jan 2018 01:24 AM IST
jhansi
jhansi Updated Fri, 12 Jan 2018 01:24 AM IST
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hockey player anoop share his story
jhansi, sports news - फोटो : demo pic
टैक्सी चालक का बेटे आज हॉकी का बेहतरीन खिलाड़ी है। एचआईएल और आस्ट्रेलिया लीग जैसे कई मैचों में अब तक शानदार प्रदर्शन कर चुके हैं मुंबई के अनूप बाल्मीकि, हॉकी खिलाड़ी युवराज बाल्मीकि के छोटे भाई हैं। अनूप ने अपने जीवन के संघर्ष को अमर उजाला के साथ साझा किया।
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हॉकी खिलाड़ी अनूप ने बताया कि उनके पिता सुनील किराए की टैक्सी चला कर परिवार का भरण पोषण करते थे। संघर्ष पूर्ण जीवन होने के बावजूद उनके पिता ने बड़े बेटे का हॉकी में लगाव देखा और एक उम्मीद के साथ उन्हें आगे बढ़ाया। बड़े भाई को देख अनूप के अंदर का जज्बा जागा और लकड़ी के माध्यम से आसपास के बच्चों के साथ हॉकी खेलना शुरू कर दी। लकड़ी से हॉकी खेल कर उन्होंने अपने अंदर छिपी प्रतिभा को उभारा। 2007 में उन्हें स्कूल चैंपियनशिप में उन्हें खेलने का मौका मिला पर जिस स्कूल में थे उस स्कूल में हॉकी की कोई व्यवस्था नहीं थी। बिखरते सपने को साकार करने के लिए उन्होंने बीच सेशन में ही स्कूल बदलने का फैसला लिया और दूसरे स्कूल में दाखिला लिया।
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बस, वहीं से ही उनकी किस्मत ने करवट लेना शुरू कर दिया। अंडर 16 की ओर से स्कूल चैंपियनशिप खेल कर अपने खेल को और निखारा। 2008 में स्टेट नेशनल जूनियर चैंपियनशिप में खेलने का मौका मिला और तीन साल तक टीम की कप्तानी संभाली। 2012 में ओलंपिक कैंप के लिए चुने गए और उसी साल हॉकी इंडियन लीग में मुंबई मेजबानी में खेलने का मौका मिला। 2013 में खास उपलब्धि नहीं मिली और अगले साल दोबारा हॉकी इंडियन लीग से दोबारा मुंबई दबंग की ओर से खेलने का मौका मिला। लीग खेलने के बाद इंजरी से जूझे और कैंप से भी बाहर हो गए। इंजरी से उबरने के बाद 2015 में जर्मन लीग, 2017 में आस्ट्रेलिया हॉकी लीग में एक बार कैंबेरिया लेकर्स और दूसरी बार कैपिटल लीग की ओर से खेलने का मौका मिला।
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भूले नहीं भूलता वो दिन
अनूप ने बताया कि पिता की आमदनी ज्यादा नहीं थी फिर भी हॉकी खेलने का हौसला कम नहीं हो रहा था। हॉकी खेलने के लिए जूते नहीं थे। इसलिए पुराने फटे जूतों को रोज रात को सिल कर अगले दिन मैदान में पहन कर पहुंचते थे। स्टेडियम में एक दिन हॉकी खिलाड़ी धनराज पिल्लई का खेल चल रहा था। खेल समाप्त होने के बाद उनके दोस्तों की टोली स्टेडियम में खेलने पहुंचे। उस वक्त धनराज पिल्लई स्टेडियम में मौजूद थे और लकड़ी से खेल रहे मैच को बड़ी तन्मयता के साथ निहार रहे थे। मैच के अंत में उन्होंने अनूप के हुनर को परखते हुए अपने पास बुलाया और नंगे पैर खेलने का कारण पूछा। कारण सुन कर वह भावविभोर हो गए। उन्होंने तत्काल अपने बैग से पांच सौ रुपये निकाले और जूते खरीदने के लिए पांच सौ रुपए दिए। उस पांच सौ रुपये ने उनकी जिंदगी और खेल दोनों को ही बदल दिया। धनराज पिल्लई की मदद उन्हें आज तक याद है। उसी यादों के कारण वह हर गरीब खिलाड़ी की मदद करने के लिए आगे आते हैं।
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