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ईद पर हुई बकरों की बिक्री
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He ghoat selling in bakreed
- फोटो : REPORTERS
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झांसी। ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार शनिवार को मनाया जाएगा। इसके लिए मुस्लिम परिवाराें ने खास तैयारियां कीं। दिनभर खरीदारी होती रही। साथ ही, महिलाओं और युवतियोें में मेहंदी लगवाने का उत्साह देखते ही बना। कुर्बानी के लिए शुक्रवार को गल्ला मंडी के पास देर रात बकरों की बिक्री का दौर चलता रहा। आठ हजार से लेकर पैंतीस हजार रुपये में बकरे बिके। कोरोना संक्रमण के कारण बाजारों में पिछले वर्षों की तरह तो रौनक नहीं रही पर घरों में खास उत्साह दिखा।
महिलाएं और युवतियां एक दूसरे के हाथों में मेहंदी लगाने में व्यस्त रहीं। पकवान बनने का सिलसिला भी चलता रहा। बकरों की खरीदारी अधिकांश ऑनलाइन होती रही। ईद-उल-अजहा से एक दिन पहले जरूर गल्ला मंडी के पास बाजार में बकरों की खरीद-फरोख्त सुबह से शुरू होकर देर रात चली। आठ हजार से लेकर 35 हजार में बकरे बिके। हालांकि, लॉकडाउन और महंगाई की वजह से बाजार में वो रौनक नहीं रही, जो पिछले सालों में देखने को मिलती थी। मुफ्ती साबिर कासमी ने बताया कि जिलहिज्जा इस्लामी साल का आखिरी महीना होता है।
इस महीने की दस तारीख को हजरत इब्राहीम की याद में जानवर की कुर्बानी कराई जाती है। अल्लाह के पैगंबरों में एक हजरत इब्राहीम अल्लाह की राह में अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हुए थे, लेकिन जब आंख पर पट्टी बांधकर वो बेटे की कुर्बानी करने गए तो बेटे की जगह दुंबा आ गया था और तभी से कुर्बानी की परंपरा शुरू हो गई। बकरीद पर होने वाली कुर्बानी के तीन हिस्से होते हैं, जिसमें एक हिस्सा गरीबों के लिए होता है।
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महिलाएं और युवतियां एक दूसरे के हाथों में मेहंदी लगाने में व्यस्त रहीं। पकवान बनने का सिलसिला भी चलता रहा। बकरों की खरीदारी अधिकांश ऑनलाइन होती रही। ईद-उल-अजहा से एक दिन पहले जरूर गल्ला मंडी के पास बाजार में बकरों की खरीद-फरोख्त सुबह से शुरू होकर देर रात चली। आठ हजार से लेकर 35 हजार में बकरे बिके। हालांकि, लॉकडाउन और महंगाई की वजह से बाजार में वो रौनक नहीं रही, जो पिछले सालों में देखने को मिलती थी। मुफ्ती साबिर कासमी ने बताया कि जिलहिज्जा इस्लामी साल का आखिरी महीना होता है।
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इस महीने की दस तारीख को हजरत इब्राहीम की याद में जानवर की कुर्बानी कराई जाती है। अल्लाह के पैगंबरों में एक हजरत इब्राहीम अल्लाह की राह में अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हुए थे, लेकिन जब आंख पर पट्टी बांधकर वो बेटे की कुर्बानी करने गए तो बेटे की जगह दुंबा आ गया था और तभी से कुर्बानी की परंपरा शुरू हो गई। बकरीद पर होने वाली कुर्बानी के तीन हिस्से होते हैं, जिसमें एक हिस्सा गरीबों के लिए होता है।
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