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देश और दुनिया में झांसी वालों ने परचम फहराया , बढ़ाया मान

Thu, 19 Mar 2020 01:45 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 19 Mar 2020 01:45 AM IST
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मसहूर गीतकार इंदीवर। (फाइल फोटो)
झांसी। पिछड़े माने जाने वाले बुंदेलखंड जैसे भूभाग में होने के बाद भी झांसी किसी पहचान की मोहताज नहीं है। इसकी वजह यहां के लोग हैं, जिन्होंने समय-समय पर झांसी का नाम केवल देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के पटल पर रोशन किया है। इसमें वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सबसे पहले आता है। इसके अलावा हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, उपन्यास सम्राट डा. वृंदावन लाल वर्मा व गीतकार इंदीवर ने पूरे देश में अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी। वर्तमान दौर में राज शांडिल्य जैसी प्रतिभाएं झांसी का परचम फहरा रही हैं।
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विदेशी धरती पर ध्यानचंद ने भारत का बढ़ाया था मान
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद ने अपने करिश्माई खेल के जरिये गुलाम भारत का पूरे विश्व में मान बढ़ाने का काम किया था। पहली बार 1926 में विदेशी धरती पर उन्हें खेलने का मौका मिला था। शानदार खेल प्रदर्शन के चलते 1928 के ओलंपिक में भारतीय टीम की ओर से ध्यानचंद को खेलने का मौका मिला। फाइनल में ध्यानचंद के तीन गोलों की वजह से इस ओलंपिक में भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक हासिल किया था। 1932 के ओलंपिक में ध्यानचंद हीरो बनकर उभरे। फाइनल मुकाबले में ध्यानचंद के अद्भुत खेल प्रदर्शन के बूते पर भारत चैंपियन बना। अमेरिका को तो 24-1 से करारी शिकस्त दी थी। 1936 में भी ध्यानचंद की जादूगरी बरकरार रही और भारत ने लगातार तीसरे ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल किया। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को हुआ था, जबकि 1979 में उनका निधन हुआ था। मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग लंबे समय से की जा रही है।
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कालजयी है डा. वृंदावन लाल वर्मा की कलम
वैसे तो वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। लेकिन, विश्व पटल पर रानी की गौरव गाथा को पहुंचाने में साहित्यकार डा. वृंदावन लाल वर्मा की कलम की बड़ी भूमिका रही। 1946 में डा. वर्मा द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘झांसी की रानी लक्ष्मीबाई’ की आज के दौर में भी मांग बनी हुई है। 09 जनवरी 1889 को मऊरानीपुर कस्बे में जन्मे डा. वर्मा के उपन्यासों की श्रृंखला काफी लंबी है। गढ़कुंडार, विराटा की पद्मिनी, कचनार, टूटे कांटे, मृगनयनी आदि सर्वाधिक प्रसिद्ध उपन्यासों में से एक हैं। इसके अलावा नाटक और कहानी संग्रहों की फेहरिस्त भी काफी लंबी है। खास बात ये है कि उनके ज्यादातर साहित्य में बुंदेलखंड की कला, संस्कृति को करीब से जानने का मौका मिलता है। उनकी इस उपलब्धि पर भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण की उपाधि से नवाजा गया। इतना ही नहीं, 23 फरवरी 1969 को डाक टिकट भी जारी किया गया।
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खड़ी बोली को सम्मान दिलाया था राष्ट्रकवि ने
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हिंदी साहित्य के इतिहास के खड़ी बोली के प्रथम महत्वपूर्ण कवि हैं। उन्हें साहित्य जगत में ‘दद्दा’ के नाम से संबोधित किया जाता था। उनकी कृति ‘भारत भारती’ देश के स्वतंत्रता संग्राम में बेहद प्रभावशाली सिद्ध हुई थी। इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें राष्ट्रकवि की पदवी प्रदान की थी। तीन अगस्त को उनकी जयंती कवि दिवस के रूप में मनाई जाती है। सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। राष्ट्रकवि ने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया। कविता के जरिये खड़ी बोली को एक काव्य भाषा के रूप में निर्मित करने में अथक प्रयास किया। हिंदी कविता के इतिहास में गुप्त जी का ये महत्वपूर्ण योगदान रहा। पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय संबंधों की रक्षा उनके काव्य के प्रथम गुण रहे, जिसकी झलक उनकी कृति ‘पंचवटी’ से लेकर जयद्रथ वध, यशोधरा और साकेत तक में नजर आती है। साकेत को उनकी रचना का सर्वोच्च शिखर माना जाता है।
हिंदी फिल्मों को अपने गीतों से सजाया इंदीवर ने
जहां खूबसूरती की तारीफ होती है वहां चंदन सा बदन, चंचल चितवन... जैसा फिल्मी गीत स्वत: ही जुबां पर आ जाता है। मैं तो भूल चली बाबुल का देश..., ताल मिले नदी के जल में..., होठों को छू लो तुम..., दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है..., तुम मिले दिल खिले..., ये तेरी आंखें झुकी-झुकी... जैसे लगभग एक हजार गीत इंदीवर ने लिखे थे। झांसी के बरुआसागर में जन्मे श्यामलाल आजाद को बॉलीवुड में इंदीवर नाम से जाना गया। तीन सौ से अधिक फिल्मों के लिए उन्होंने गीत लिखे। उनके ज्यादातर गीत आज भी लोगों की जुबां पर आ जाते हैं। 1975 में प्रदर्शित हुई अमानुष फिल्म के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड प्रदान किया गया था। उनके लिखे गीतों को रुपहले पर्दे के सभी बड़े कलाकारों पर फिल्माया गया। इंदीवर के भतीजे अजीत राय ने बताया कि 15 अगस्त 1921 को उनका जन्म हुआ था, जबकि 28 फरवरी 1997 को देहांत। तीन दशक से अधिक समय तक वे हिंदी फिल्मों को अपने गीतों से सजाते रहे।

स्क्रिप्ट लिखने से शुरू हुआ राज का सफर फिल्म निर्माता तक पहुंचा
बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री में राज शांडिल्य किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। हाल ही में उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म ड्रीम गर्ल ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाढ़े हैं। नगर के खाती बाबा इलाके के रहने वाले राज की शुरुआत कॉमेडी सर्कस के लिए स्क्रिप्ट लिखने से हुई थी। कॉमेडी नाइट भी विद कपिल में भी काम करने का मौका मिला। दोनों सीरियल के लिए उन्होंने रिकॉर्ड दो हजार स्क्रिप्ट लिखीं। वेलकम बैक फिल्म से उन्होंने बॉलीवुड में कदम रखे। इस फिल्म के लिए उन्होंने डायलॉग लिखे थे। इसके अलावा सलमान प्रोडक्शन की फिल्म फ्रिकी अली, संजय दत्त की फिल्म भूमि व जबरिया जोड़ी के लिए भी डायलॉग लिखने का काम किया। राज के निर्देशन में बनी फिल्म ड्रीमगर्ल ने खासी सफलता हासिल की है। पहली फिल्म के लिए राज को फिल्म फेयर अवार्ड की बेस्ट डायरेक्टर की कैटेगिरी में नामांकित किया गया था। जल्द ही वे सलमान खान के साथ मिलकर ‘बुलबुल मैरिज हॉल’ प्रोड्यूस करने जा रहे हैं।

राज शांडिल्य।

राज शांडिल्य।

किले की तलहटी में स्थापित वृंदावन लाल वर्मा की प्रतिमा।

किले की तलहटी में स्थापित वृंदावन लाल वर्मा की प्रतिमा।

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