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गोपियों जैसे अनुराग से ही प्रभु की प्राप्ति संभव
झांसी/ब्यूरो
Updated Sun, 21 Feb 2016 12:51 AM IST
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मोंठ (झांसी)। मोंठ महोत्सव के छठवें दिन श्रीमद् भागवत कथा में परमात्मा के महारास की लीला का वर्णन किया। श्रीकृष्ण रुक्मणि विवाह के प्रसंग के दौरान कथा पंडाल में श्रोताओं ने नृत्य किया।
कथा व्यास साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी ने कहा कि जीवन में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति बृज की गोपियों जैसा अनुराग, प्रेम और समर्पण की जरुरत है तभी परमात्मा से नाता जुड़ पाएगा, जिस तरह गोपियों ने सब से नाता तोड़कर परमात्मा से नाता जोड़ा था, दुनिया के सब नाते झूठे हैं, केवल परमात्मा से जोड़ा गया नाता ही सच्चा एवं कल्याणकारी है।
जिस दिन गोपी का चरित्र अंदर समाहित हो जाएगा, उसी दिन परमात्मा के महारास का आनंद स्वत: मिलने लगेगा। उन्होंने कहा कि भगवान के चरणसेवक बनने में जो मिठास है, वह किसी और में नहीं है। खासकर भगवान ने समय-समय पर अहंकार को नष्ट करने के लिये विभिन्न रुपों में अवतार लिया और अहंकार को नष्ट किया।
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कथा व्यास ने कहा कि जो व्यक्ति अपने अपमान से दुखी हो जाए, समझ लो वह अभिमानी है। अहंकार ही दुख का कारण है। इंसान अपने दुख से दुखी नहीं है,बल्कि दूसरों के सुखों से दुखी है। यही प्रवृत्ति अभिमान और अहंकार को प्रदर्शित करती है।
परमात्मा पर विश्वास करें और अपना सब कुछ उसी को अर्पण करें। जीवन में अच्छा, बुरा जो भी होगा, परमात्मा की मर्जी से होगा। उसमें ही अपनी मर्जी समावेश करें। कथा व्यास ने कहा कि जीवन में एक बेटी का विवाह व कन्यादान सभी को करना चाहिए,
जिस तरह विधायक गरौठा दीपनारायण सिंह पिछले कई सालों से अनवरत समाज की सभी जाति, उपजातियों की परिवार की कन्याओं का विवाह संस्कार कार्यक्रम बढ़चढ़कर करा रहे हैं, उसमें परमात्मा की कृपा स्वत: ही समाविष्ट हो गई है। यह एक पुनीत कार्य है। इससे बड़ा धर्म और पुण्य दूसरा नहीं है।
समाज के मंगल कार्यों में खुद को शामिल करने से संतों का आशीर्वाद, पद,सम्मान और प्रतिष्ठा सभी प्राप्त होता है। राज्यसभा सांसद डॉ. चन्द्रपाल सिंह यादव तथा कथा परीक्षित विधायक दीपनारायण सिंह एवं उनकी पत्नी श्रीमती मीरा यादव ने श्रीमद् भागवत की आरती की।
इस मौके पर सुभाष यादव, चरण सिंह यादव, अरविंद यादव, विश्वनाथ यादव, मयंक मोहन गुप्त, डॉ. राजेंद्र खरे, अनुरुद्ध यादव, बृजेंद्र यादव, अनिल यादव, सुदेश गौर, रामनरेश यादव, कैलाश यादव, नरेंद्र कुशवाहा, कप्तान सिंह पारीछा, लाली यादव,
डॉ. नेत्रपाल सिंह, तिलक यादव, गौरव यादव, बृजमोहन नगाइच, विकास अग्रवाल, दयाराम कुशवाहा, वीरु यादव, देवीदयाल यादव, गजेंद्र राजपूत, तेज सिंह कुशवाहा, भज्जू यादव, झुण्डी पाल, अमर सिंह यादव, हरीव्यास, महेश मुदगिल, यशपाल बापू, कल्लू खां, जगमोहन यादव, फारुख खां,डॉ. प्रणव त्रिपाठी, डॉ. इंदल शास्त्री, संतोष चौरसिया आदि मौजूद रहे।
हनुमान जी का भक्ति का किया वर्णन
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महंत वैदेही बल्लभ जी महाराज ने मानस प्रवचन में भक्त शिरोमणि हनुमान जी महाराज के चरित्र का सुंदर वर्णन करते हुए कहा कि उन्होंने परमात्मा श्रीराम के नाम से सौ योजन समुद्र लांघ लिया था।
हनुमान जी ग्यारहवें रुद्र अवतार के रुप में जनकल्याण के लिए आज भी जगह-जगह मौजूद हैं। हनुमान जी की साधना और भक्ति के बलबूते पर भगवान श्रीराम की भक्ति पाई जा सकती है। उन्होंने अनेक प्रसंगों के माध्यम से श्री हनुमान जी की भक्ति का वर्णन किया।
प्रभु की कथाओं से मिलता है आनंद
मानस प्रवक्ता रामलखन वेदांती जी ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि लोक की भांति जो लीला करके एहसास कराए, उसे रास लीला कहते हैं। परमात्मा के आनंद को प्राप्त करने के लिए उसके रस में रसना पड़ता है।
आनंद, सत और चैतन्य जिसमें है वहीं परमब्रह्म परमात्मा है और जिसमें सत और चैतन्य मात्र है वह जीव है। जीव को ईश्वर के अनुरूप बनने के लिए आनंद की खोज करनी पड़ती है और आनंद केवल ईश्वर की कथाओं के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।
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कथा व्यास साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी ने कहा कि जीवन में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति बृज की गोपियों जैसा अनुराग, प्रेम और समर्पण की जरुरत है तभी परमात्मा से नाता जुड़ पाएगा, जिस तरह गोपियों ने सब से नाता तोड़कर परमात्मा से नाता जोड़ा था, दुनिया के सब नाते झूठे हैं, केवल परमात्मा से जोड़ा गया नाता ही सच्चा एवं कल्याणकारी है।
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जिस दिन गोपी का चरित्र अंदर समाहित हो जाएगा, उसी दिन परमात्मा के महारास का आनंद स्वत: मिलने लगेगा। उन्होंने कहा कि भगवान के चरणसेवक बनने में जो मिठास है, वह किसी और में नहीं है। खासकर भगवान ने समय-समय पर अहंकार को नष्ट करने के लिये विभिन्न रुपों में अवतार लिया और अहंकार को नष्ट किया।
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कथा व्यास ने कहा कि जो व्यक्ति अपने अपमान से दुखी हो जाए, समझ लो वह अभिमानी है। अहंकार ही दुख का कारण है। इंसान अपने दुख से दुखी नहीं है,बल्कि दूसरों के सुखों से दुखी है। यही प्रवृत्ति अभिमान और अहंकार को प्रदर्शित करती है।
परमात्मा पर विश्वास करें और अपना सब कुछ उसी को अर्पण करें। जीवन में अच्छा, बुरा जो भी होगा, परमात्मा की मर्जी से होगा। उसमें ही अपनी मर्जी समावेश करें। कथा व्यास ने कहा कि जीवन में एक बेटी का विवाह व कन्यादान सभी को करना चाहिए,
जिस तरह विधायक गरौठा दीपनारायण सिंह पिछले कई सालों से अनवरत समाज की सभी जाति, उपजातियों की परिवार की कन्याओं का विवाह संस्कार कार्यक्रम बढ़चढ़कर करा रहे हैं, उसमें परमात्मा की कृपा स्वत: ही समाविष्ट हो गई है। यह एक पुनीत कार्य है। इससे बड़ा धर्म और पुण्य दूसरा नहीं है।
समाज के मंगल कार्यों में खुद को शामिल करने से संतों का आशीर्वाद, पद,सम्मान और प्रतिष्ठा सभी प्राप्त होता है। राज्यसभा सांसद डॉ. चन्द्रपाल सिंह यादव तथा कथा परीक्षित विधायक दीपनारायण सिंह एवं उनकी पत्नी श्रीमती मीरा यादव ने श्रीमद् भागवत की आरती की।
इस मौके पर सुभाष यादव, चरण सिंह यादव, अरविंद यादव, विश्वनाथ यादव, मयंक मोहन गुप्त, डॉ. राजेंद्र खरे, अनुरुद्ध यादव, बृजेंद्र यादव, अनिल यादव, सुदेश गौर, रामनरेश यादव, कैलाश यादव, नरेंद्र कुशवाहा, कप्तान सिंह पारीछा, लाली यादव,
डॉ. नेत्रपाल सिंह, तिलक यादव, गौरव यादव, बृजमोहन नगाइच, विकास अग्रवाल, दयाराम कुशवाहा, वीरु यादव, देवीदयाल यादव, गजेंद्र राजपूत, तेज सिंह कुशवाहा, भज्जू यादव, झुण्डी पाल, अमर सिंह यादव, हरीव्यास, महेश मुदगिल, यशपाल बापू, कल्लू खां, जगमोहन यादव, फारुख खां,डॉ. प्रणव त्रिपाठी, डॉ. इंदल शास्त्री, संतोष चौरसिया आदि मौजूद रहे।
हनुमान जी का भक्ति का किया वर्णन
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महंत वैदेही बल्लभ जी महाराज ने मानस प्रवचन में भक्त शिरोमणि हनुमान जी महाराज के चरित्र का सुंदर वर्णन करते हुए कहा कि उन्होंने परमात्मा श्रीराम के नाम से सौ योजन समुद्र लांघ लिया था।
हनुमान जी ग्यारहवें रुद्र अवतार के रुप में जनकल्याण के लिए आज भी जगह-जगह मौजूद हैं। हनुमान जी की साधना और भक्ति के बलबूते पर भगवान श्रीराम की भक्ति पाई जा सकती है। उन्होंने अनेक प्रसंगों के माध्यम से श्री हनुमान जी की भक्ति का वर्णन किया।
प्रभु की कथाओं से मिलता है आनंद
मानस प्रवक्ता रामलखन वेदांती जी ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि लोक की भांति जो लीला करके एहसास कराए, उसे रास लीला कहते हैं। परमात्मा के आनंद को प्राप्त करने के लिए उसके रस में रसना पड़ता है।
आनंद, सत और चैतन्य जिसमें है वहीं परमब्रह्म परमात्मा है और जिसमें सत और चैतन्य मात्र है वह जीव है। जीव को ईश्वर के अनुरूप बनने के लिए आनंद की खोज करनी पड़ती है और आनंद केवल ईश्वर की कथाओं के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।