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Jhansi News: पांच सालों में बढ़ी बालिका शिक्षा की दर, लिंगानुपात भी गया सुधर

Mon, 22 Jan 2024 12:26 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 22 Jan 2024 12:26 AM IST
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Girls education rate increased in five years, sex ratio also improved
अमर उजाला ब्यूरो
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झांसी। केंद्र सरकार के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान को शुरू हुए आठ साल पूरे हो चुके हैं। इस अभियान का असर झांसी में भी देखने को मिल रहा है। अब छह साल या उससे अधिक उम्र की 71.1 फीसदी बेटियां स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। पिछले पांच सालों में इसमें 6.3 फीसदी का इजाफा हुआ है। यही नहीं, प्रति हजार जन्मे बेटों की तुलना में बेटियों का लिंगानुपात भी सुधर गया है।
बेटा और बेटी के बीच सामाजिक भेदभाव को दूर करते हुए बेटियों को उच्च शिक्षित बनाने के उद्देश्य से बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य देश में बेटियों के घटते लिंगानुपात को सुधारना भी है। इस अभियान का असर अब धरातल पर दिख रहा है। इसकी पुष्टि एनएफएचएस की रिपोर्ट कर रही है। वर्ष 2015-16 में हुए नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-4 (एनएफएचएस) की रिपोर्ट को देखें तो झांसी में छह साल या उससे अधिक उम्र की 64.8 बच्चियां स्कूल में पढ़ाई करती थीं। जबकि, वर्ष 2020-21 के एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट में ये आंकड़ा सुधरा है। अब 71.1 फीसदी बच्चियां स्कूल में पढ़ रही हैं। बीते पांच साल में बेटियों का लिंगानुपात भी सुधरा है। एनएफएचएस-4 की रिपोर्ट में जहां प्रति हजार बेटों में 815 बेटियां जन्म लेती थीं। पांच साल में इसमें काफी सुधार हुआ है। एनएफएचएस-5 की रिपोर्ट बताती है कि अब प्रति हजार बेटों में 927 बेटियां जन्म ले रही हैं।
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पहले शादी के लिए पैसा जोड़ते थे, अब पढ़ाने में लगाते अभिभावक
बीकेडी के समाजशास्त्र विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सुरेंद्र नारायण का कहना है कि आज बेटियां किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। चाहें शिक्षा की बात हो या फिर रोजगार की, हर तरफ लगातार बेटियां आगे बढ़ रही हैं। पहले जहां बेटी पैदा होते ही उसकी शादी के लिए माता-पिता पैसे जोड़ने लगते थे। अब वो सोचते हैं कि ये पैसा बेटी की शिक्षा में लगाया जाए। ताकि, बेटी पढ़-लिखकर कुछ बन जाएगी तो शादी में भी कोई परेशानी नहीं आएगी। सरकारी योजनाओं ने भी बेटियों को आगे बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है। ऐसे में बेटियों के शिक्षा स्तर से लेकर लिंगानुपात में लगातार सुधर रहा है। मनोवैज्ञानिक डॉ. स्मिता जायसवाल का कहना है कि लोगों की सोच में अंतर आया है। अब बेटियां भी माता-पिता की देखरेख करने से अन्य कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। बेटियों को लोग अब पराया धन नहीं मानते हैं।
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ये है योजना का उद्देश्य
- बेटियों को शिक्षित बनाना
- बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना
- बालिकाओं को शोषण से बचाना
- सही-गलत के बारे में अवगत कराना



वर्जन..
फोटो..
अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर अब भ्रूण के लिंग की जांच नहीं होती है। स्वास्थ्य विभाग की एक टीम गठित है, जो सेंटरों की निगरानी करती है। अगर कहीं कोई गड़बड़ी सामने आती है तो कार्रवाई की जाती है। इससे भी लिंगानुपात में काफी सुधर हुआ है। - डॉ. आरके सोनी, एडी हेल्थ।


फोटो..
एक दशक में लिंगानुपात की खाई को भरने में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान ने अहम भूमिका निभाई है। इस अभियान से नागरिकों में बेटियों के प्रति सुरक्षा, सम्मान का भाव और भी सकारात्मक हुआ है। - आनंद चौबे, मंडलीय परियोजना प्रबंधक, एनएचएम।
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