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चार साल का रिकॉर्ड खंगाल रही जांच समिति, कर्मचारी पर गिर सकती गाज
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झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज से पासआउट 30 जूनियर और सीनियर डॉक्टरों को आठ महीने तक मानदेय देने के मामले में जांच समिति पिछले चार साल का रिकॉर्ड खंगाल रही है। जांच के दौरान ही 60 फीसदी डॉक्टरों ने पैसा वापस कर दिया है। वहीं, इस मामले में पटल देखने वाले पूर्व कर्मचारी पर शक गहराया हुआ है। कर्मचारी पर गाज गिर सकती है।
मेडिकल कॉलेज में वित्तीय अनियमितता का मामला अमर उजाला ने 26 अक्तूबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसके बाद जांच समिति का गठन किया गया। मामला सीधे तौर पर एक करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितता का है, ऐसे में समिति फूंक-फूंककर कदम रख रही है। सिर्फ आठ महीने ही नहीं समिति ने वर्ष 2016 के रिकॉर्डों की पड़ताल शुरू कर दी है। पिछले चार सालों में कुछ भी गड़बड़ी मिलती है तो समिति उससे पहले के भी रिकॉर्ड जांचेंगी। चूंकि, एक बाबू लगभग एक दशक तक पटल पर तैनात रहा है, ऐसे में समिति का शक उस पर गहराया हुआ है। समिति इस बिंदु पर भी जांच कर रही है कि बाबू की तरफ से ही नो ड्यूज बनवाने के बाद भी डॉक्टरों को कैसे भुगतान किया जाता रहा। चूंकि, 70-80 जेआर, एसआर पासआउट होकर हर साल निकलते हैं, ऐसे में गिने-चुने के खाते में ही क्यों भुगतान हुआ। ऐसे में उसके खिलाफ कार्रवाई तय मानी जा रही है। वहीं, बताया गया कि अब तक 60 फीसदी जूनियर और सीनियर डॉक्टरों से पैसे की रिकवरी हो गई है। बाकियों से भी बातचीत चल रही है।
न बदलते पटल तो दबा रहता मामला
यह मामला बाबुओं के पटल परिवर्तन के बाद सामने आया है। ऐसे में अगर पटल परिवर्तन न होता तो पासआउट जेआर, एसआर डॉक्टरों को मानदेय भुगतान का यह सिलसिला जारी रहता। साथ ही यदि एरियर के पैसे का भी भुगतान कर दिया जाता तो रिकवरी और मुश्किल हो जाती।
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मेडिकल कॉलेज में वित्तीय अनियमितता का मामला अमर उजाला ने 26 अक्तूबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसके बाद जांच समिति का गठन किया गया। मामला सीधे तौर पर एक करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितता का है, ऐसे में समिति फूंक-फूंककर कदम रख रही है। सिर्फ आठ महीने ही नहीं समिति ने वर्ष 2016 के रिकॉर्डों की पड़ताल शुरू कर दी है। पिछले चार सालों में कुछ भी गड़बड़ी मिलती है तो समिति उससे पहले के भी रिकॉर्ड जांचेंगी। चूंकि, एक बाबू लगभग एक दशक तक पटल पर तैनात रहा है, ऐसे में समिति का शक उस पर गहराया हुआ है। समिति इस बिंदु पर भी जांच कर रही है कि बाबू की तरफ से ही नो ड्यूज बनवाने के बाद भी डॉक्टरों को कैसे भुगतान किया जाता रहा। चूंकि, 70-80 जेआर, एसआर पासआउट होकर हर साल निकलते हैं, ऐसे में गिने-चुने के खाते में ही क्यों भुगतान हुआ। ऐसे में उसके खिलाफ कार्रवाई तय मानी जा रही है। वहीं, बताया गया कि अब तक 60 फीसदी जूनियर और सीनियर डॉक्टरों से पैसे की रिकवरी हो गई है। बाकियों से भी बातचीत चल रही है।
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न बदलते पटल तो दबा रहता मामला
यह मामला बाबुओं के पटल परिवर्तन के बाद सामने आया है। ऐसे में अगर पटल परिवर्तन न होता तो पासआउट जेआर, एसआर डॉक्टरों को मानदेय भुगतान का यह सिलसिला जारी रहता। साथ ही यदि एरियर के पैसे का भी भुगतान कर दिया जाता तो रिकवरी और मुश्किल हो जाती।
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