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बीयू की फर्जी वेबसाइट बनाकर चल रहा जालसाजी का खेल
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झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की फर्जी वेबसाइट बनाकर जालसाजी का खेल सात-आठ साल से चल रहा है। यह फर्जी वेबसाइट हूबहू बीयू की असली वेबसाइट की तरह ही होती है। एक नजर में तो कोई यह देखकर पता ही नहीं लगा सकता कि कौन सी वेबसाइट फर्जी है और कौन सी असली। इसी वेबसाइट पर प्रवेश दिलाकर फर्जी परीक्षा कराई जाती है। बाद में फर्जी मार्कशीट और डिग्री थमा दी जाती है।
बीयू की फर्जी डिग्री, मार्कशीट बनाने के गिरोह के सदस्य दो तरह से छात्र-छात्राओं को अपने जाल में फंसाते हैं। एक तरीका तो ऐसा होता है, जिसमें छात्र खुद फर्जी मार्कशीट, डिग्री बनने के बाद वेरिफिकेशन तक का ठेका देता है। इसमें छात्र से तीन से चार लाख रुपये तक वसूले जाते हैं। वहीं, दूसरा तरीका ऐसा होता है, जिसमें छात्र विधिवत रूप से डिग्री लेना चाहता है। गिरोह के सदस्यों ने देश के कई राज्यों में बीयू के नाम से सेंटर खोल रखे हैं। जालसाजों ने ठगी के लिए बीयू की असली वेबसाइट से मिलती-जुलती कई फर्जी वेबसाइट बनाई हैं। इन्हीं फर्जी वेबसाइट पर छात्र को ऑनलाइन प्रवेश दिलाया जाता है। बाद में परीक्षा का नोटिस भी इसी फर्जी वेबसाइट पर जारी होता है। किसी सेंटर पर फर्जी परीक्षा कराकर जाली मार्कशीट और डिग्री थमा देते हैं। इसके लिए वह एक से डेढ़ लाख रुपये वसूलते हैं।
डिस्पैच रजिस्टर में नहीं चढ़ाते थे नंबर
झांसी। बीयू में फर्जी सत्यापन के मामले में कई बातें निकलकर सामने आई हैं। सूत्रों ने बताया कि जनसूचना विभाग से सत्यापन होने के बाद डिस्पैच रजिस्टर में जारी किए गए पत्र का नंबर नहीं चढ़ाया जाता था, जिससे यह पता ही नहीं चल पाता है कि कौन सा सत्यापन विभाग की तरफ से भेजा गया और कौन सा बाहर ही बाहर कर दिया गया। जबकि, सत्यापन कर जो पत्र भेजा जाता था, उसमें बकायदा डिस्पैच नंबर होता था। यह खेल जानबूझकर किया जाता रहा। ताकि, पकड़ होने पर यह लगे कि बीयू की तरफ से सत्यापन हुआ ही नहीं है।
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रुपये ऐंठने के लिए सही को गलत कर देते
झांसी। बीयू कर्मचारी रुपये ऐंठने के लिए सही दस्तावेजों को भी सत्यापन के दौरान फर्जी करार देते हुए रिपोर्ट भेज देते हैं। इसके बाद छात्र भागते-भागते विश्वविद्यालय आता है तो उसे टालामटोली करते हुए पैसे देने का दबाव बनाया जाता है। बाद में मजबूरी में छात्र कुछ न कुछ सुविधा शुल्क देकर जाता है। हाल ही में इस तरह का मामला बीयू अधिकारियों के संज्ञान में आ चुका है।
22 जनवरी 2016 को एक युवक बीए तृतीय वर्ष की मार्कशीट लेकर डिग्री निकलवाने के लिए आया था। एक अधिकारी ने छात्र से प्रथम और द्वितीय वर्ष की मार्कशीट मांगी तो उसने मार्कशीट होने से इंकार कर दिया। इसके बाद युवक को पकड़कर बैठा लिया गया। पूछताछ में युवक ने बताया कि दिल्ली के मुनारिका इलाके में संचालित एक इंस्टीट्यूट संचालक से उसने मार्कशीट बनवाई थी। कॉलेज संचालक ने प्रथम और द्वितीय की मार्कशीट उसे नहीं दी। बाद में वह सेंटर बंद करके भाग गया। इन्हीं दोनों सालों की मार्कशीट लेने के लिए वह बीयू आ गया। उसने बताया कि मार्कशीट बनवाने के लिए उससे एक लाख रुपये लिए गए थे।
जालंधर के लजहत नगर का रहने वाला छात्र एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। उसका संपर्क बीयू की फर्जी डिग्री, मार्कशीट बनाने वाले गिरोह के सदस्य से हो गया। वर्ष 2014 में उसने विधिवत तरीके से बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के नाम से प्रवेश फॉर्म भरवाया। प्रवेश दिलाने के बाद परीक्षा भी कराई। इन सबके लिए उसने सवा लाख रुपये लिए। बाद में उसे पास की मार्कशीट पकड़ा दिया। अगस्त 2015 में छात्र जब विश्वविद्यालय में मार्कशीट की डुप्लीकेट कॉपी निकलवाने आया तो किसी तरह यह मामला पकड़ में आ गया। इसके बाद विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने छात्र को पुलिस के हवाले कर दिया।
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बीयू की फर्जी डिग्री, मार्कशीट बनाने के गिरोह के सदस्य दो तरह से छात्र-छात्राओं को अपने जाल में फंसाते हैं। एक तरीका तो ऐसा होता है, जिसमें छात्र खुद फर्जी मार्कशीट, डिग्री बनने के बाद वेरिफिकेशन तक का ठेका देता है। इसमें छात्र से तीन से चार लाख रुपये तक वसूले जाते हैं। वहीं, दूसरा तरीका ऐसा होता है, जिसमें छात्र विधिवत रूप से डिग्री लेना चाहता है। गिरोह के सदस्यों ने देश के कई राज्यों में बीयू के नाम से सेंटर खोल रखे हैं। जालसाजों ने ठगी के लिए बीयू की असली वेबसाइट से मिलती-जुलती कई फर्जी वेबसाइट बनाई हैं। इन्हीं फर्जी वेबसाइट पर छात्र को ऑनलाइन प्रवेश दिलाया जाता है। बाद में परीक्षा का नोटिस भी इसी फर्जी वेबसाइट पर जारी होता है। किसी सेंटर पर फर्जी परीक्षा कराकर जाली मार्कशीट और डिग्री थमा देते हैं। इसके लिए वह एक से डेढ़ लाख रुपये वसूलते हैं।
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डिस्पैच रजिस्टर में नहीं चढ़ाते थे नंबर
झांसी। बीयू में फर्जी सत्यापन के मामले में कई बातें निकलकर सामने आई हैं। सूत्रों ने बताया कि जनसूचना विभाग से सत्यापन होने के बाद डिस्पैच रजिस्टर में जारी किए गए पत्र का नंबर नहीं चढ़ाया जाता था, जिससे यह पता ही नहीं चल पाता है कि कौन सा सत्यापन विभाग की तरफ से भेजा गया और कौन सा बाहर ही बाहर कर दिया गया। जबकि, सत्यापन कर जो पत्र भेजा जाता था, उसमें बकायदा डिस्पैच नंबर होता था। यह खेल जानबूझकर किया जाता रहा। ताकि, पकड़ होने पर यह लगे कि बीयू की तरफ से सत्यापन हुआ ही नहीं है।
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रुपये ऐंठने के लिए सही को गलत कर देते
झांसी। बीयू कर्मचारी रुपये ऐंठने के लिए सही दस्तावेजों को भी सत्यापन के दौरान फर्जी करार देते हुए रिपोर्ट भेज देते हैं। इसके बाद छात्र भागते-भागते विश्वविद्यालय आता है तो उसे टालामटोली करते हुए पैसे देने का दबाव बनाया जाता है। बाद में मजबूरी में छात्र कुछ न कुछ सुविधा शुल्क देकर जाता है। हाल ही में इस तरह का मामला बीयू अधिकारियों के संज्ञान में आ चुका है।
22 जनवरी 2016 को एक युवक बीए तृतीय वर्ष की मार्कशीट लेकर डिग्री निकलवाने के लिए आया था। एक अधिकारी ने छात्र से प्रथम और द्वितीय वर्ष की मार्कशीट मांगी तो उसने मार्कशीट होने से इंकार कर दिया। इसके बाद युवक को पकड़कर बैठा लिया गया। पूछताछ में युवक ने बताया कि दिल्ली के मुनारिका इलाके में संचालित एक इंस्टीट्यूट संचालक से उसने मार्कशीट बनवाई थी। कॉलेज संचालक ने प्रथम और द्वितीय की मार्कशीट उसे नहीं दी। बाद में वह सेंटर बंद करके भाग गया। इन्हीं दोनों सालों की मार्कशीट लेने के लिए वह बीयू आ गया। उसने बताया कि मार्कशीट बनवाने के लिए उससे एक लाख रुपये लिए गए थे।
जालंधर के लजहत नगर का रहने वाला छात्र एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। उसका संपर्क बीयू की फर्जी डिग्री, मार्कशीट बनाने वाले गिरोह के सदस्य से हो गया। वर्ष 2014 में उसने विधिवत तरीके से बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के नाम से प्रवेश फॉर्म भरवाया। प्रवेश दिलाने के बाद परीक्षा भी कराई। इन सबके लिए उसने सवा लाख रुपये लिए। बाद में उसे पास की मार्कशीट पकड़ा दिया। अगस्त 2015 में छात्र जब विश्वविद्यालय में मार्कशीट की डुप्लीकेट कॉपी निकलवाने आया तो किसी तरह यह मामला पकड़ में आ गया। इसके बाद विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने छात्र को पुलिस के हवाले कर दिया।