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ब्लैक फंगस: स्टेरॉयड और शुगर के अलावा इस कारण से भी हो सकते हैं शिकार, डॉक्टरों ने शुरू किया शोध
Sun, 30 May 2021 01:47 PM IST
प्राची प्रियम
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: प्राची प्रियम
Updated Sun, 30 May 2021 01:47 PM IST
सार
झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों द्वारा ब्लैक फंगस पर किए जा रहे शोध में यह बात सामने आई है कि स्टेरॉयड और हाई शुगर के साथ-साथ एंटीबायोटिक का अंधाधुंध सेवन भी इसके लिए जिम्मेदार है।
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ब्लैक फंगस (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
ब्लैक फंगस को लेकर झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने शोध कार्य शुरू कर दिया है। 20 मरीजों पर की गई जांच-पड़ताल में शुरूआती दौर में यह बात सामने आई है कि स्टेरॉयड और हाई शुगर के साथ-साथ एंटीबायोटिक का अंधाधुंध सेवन भी ब्लैक फंगस के लिए जिम्मेदार है।
डॉक्टर बताते हैं कि खूब एंटीबायोटिक खाने से नाक और मुंह के अंदर के नॉर्मल कमेन्सेल बैक्टीरिया मर जाते हैं, इस कारण ब्लैक फंगस पनप जाता है। कोरोना महामारी के बीच ब्लैक फंगस कहर बनकर टूटने लगा है। झांसी में पिछले दो सप्ताह में लगभग 50 मामले इस बीमारी के सामने आ चुके हैं।
अब ब्लैक फंगस पर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने शोध शुरू कर दिया है। 20 से अधिक मरीजों की जांच कराई गई है। मेडिकल कॉलेज के उप प्राचार्य और एनेस्थीसिया विभाग के प्रोफेसर डॉ. अंशुल जैन ने बताया कि म्यूकोर और राइजोपास दो मुख्य प्रजातियां हैं, जो म्यूकर माइकोसिस का कारण बनती है।
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दोनों सर्वव्यापी हैं और लोग आमतौर पर हर दिन सूक्ष्म कवक बीजाणुओं के संपर्क में आते हैं। इसलिए संभवत: म्यूकोर्मिसेट्स के संपर्क में आने से पूरी तरह से बचना असंभव है। हालांकि, ये मनुष्यों के लिए तब तक हानिकारक नहीं हैं, जब तक कि प्रतिरोधक क्षमता कमजोर न हो। प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर फंगस के बीजाणुओं में सांस लेने में फेफड़ों या साइनस में संक्रमण हो सकता है, जो शरीर के अन्य भागों में फैल जाता है।
डॉ. अंशुल के मुताबिक कोविड में स्टेरॉयड का तर्कहीन उपयोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार है और एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल नाक और मुंह के सामान्य जीवाणु वनस्पति को परेशान कर रहे हैं, जो अवसरवादी फंगल संक्रमण के खिलाफ रक्षा के रूप में कार्य करता है। इस कारण वातावरण में चारों तरफ रहने वाला ये संक्रमण नाक के जरिए मनुष्य के शरीर में पहुंच जाता है। उन्होंने बताया कि एक सप्ताह में शोध के पूरे परिणाम सामने आ जाएंगे।
ऐसे कर रहे जांच
डॉ. अंशुल ने बताया कि ब्लैक फंगस के मरीजों के नाक का स्वैब बैक्टीरियल कल्चर के लिए भी लिया जा रहा है और ये देखा जाएगा कि इन मरीजों का बैक्टीरियल फ्लोरा (जीवाणुओं का समूह) अन्य लोगों की तरह है या नहीं। उन्होंने बताया कि नाक में कई तरह के जीवाणु रहते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस को पनपने से रोकते हैं।
इन दावों को किया खारिज
उप प्राचार्य ने औद्योगिक ऑक्सीजन के इस्तेमाल या फिर किसी खास कंपनी का मास्क पहनने से ब्लैक फंगस पनपने के दावों को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि इन कारणों से यह बीमारी नहीं होती है।
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डॉक्टर बताते हैं कि खूब एंटीबायोटिक खाने से नाक और मुंह के अंदर के नॉर्मल कमेन्सेल बैक्टीरिया मर जाते हैं, इस कारण ब्लैक फंगस पनप जाता है। कोरोना महामारी के बीच ब्लैक फंगस कहर बनकर टूटने लगा है। झांसी में पिछले दो सप्ताह में लगभग 50 मामले इस बीमारी के सामने आ चुके हैं।
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अब ब्लैक फंगस पर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने शोध शुरू कर दिया है। 20 से अधिक मरीजों की जांच कराई गई है। मेडिकल कॉलेज के उप प्राचार्य और एनेस्थीसिया विभाग के प्रोफेसर डॉ. अंशुल जैन ने बताया कि म्यूकोर और राइजोपास दो मुख्य प्रजातियां हैं, जो म्यूकर माइकोसिस का कारण बनती है।
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दोनों सर्वव्यापी हैं और लोग आमतौर पर हर दिन सूक्ष्म कवक बीजाणुओं के संपर्क में आते हैं। इसलिए संभवत: म्यूकोर्मिसेट्स के संपर्क में आने से पूरी तरह से बचना असंभव है। हालांकि, ये मनुष्यों के लिए तब तक हानिकारक नहीं हैं, जब तक कि प्रतिरोधक क्षमता कमजोर न हो। प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर फंगस के बीजाणुओं में सांस लेने में फेफड़ों या साइनस में संक्रमण हो सकता है, जो शरीर के अन्य भागों में फैल जाता है।
डॉ. अंशुल के मुताबिक कोविड में स्टेरॉयड का तर्कहीन उपयोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार है और एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल नाक और मुंह के सामान्य जीवाणु वनस्पति को परेशान कर रहे हैं, जो अवसरवादी फंगल संक्रमण के खिलाफ रक्षा के रूप में कार्य करता है। इस कारण वातावरण में चारों तरफ रहने वाला ये संक्रमण नाक के जरिए मनुष्य के शरीर में पहुंच जाता है। उन्होंने बताया कि एक सप्ताह में शोध के पूरे परिणाम सामने आ जाएंगे।
ऐसे कर रहे जांच
डॉ. अंशुल ने बताया कि ब्लैक फंगस के मरीजों के नाक का स्वैब बैक्टीरियल कल्चर के लिए भी लिया जा रहा है और ये देखा जाएगा कि इन मरीजों का बैक्टीरियल फ्लोरा (जीवाणुओं का समूह) अन्य लोगों की तरह है या नहीं। उन्होंने बताया कि नाक में कई तरह के जीवाणु रहते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया और फंगस को पनपने से रोकते हैं।
इन दावों को किया खारिज
उप प्राचार्य ने औद्योगिक ऑक्सीजन के इस्तेमाल या फिर किसी खास कंपनी का मास्क पहनने से ब्लैक फंगस पनपने के दावों को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि इन कारणों से यह बीमारी नहीं होती है।