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झांसी में हर माह 15 प्रतिशत जन्म लेने वाले बच्चे प्री मैच्योर

Mon, 05 Apr 2021 01:58 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Mon, 05 Apr 2021 01:58 AM IST
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every month 15 percent birth in premature un jhansi
झांसी। जिले में हर महीने जन्म लेने वाले बच्चों में 15 प्रतिशत प्री मैच्योर हो रहे हैं। इसके पीछे का बड़ा कारण कुपोषण, एनीमिया भी है जो कि झांसी समेत बुंदेलखंड में काफी ज्यादा मिलता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि जननी सुरक्षा और जननी शिशु सुरक्षा योजना के तहत लोगों में जागरूकता आई है और घर पर प्रसव कराने की परंपरा खत्म हो रही है। इस कारण प्री मैच्योर डिलीवरी के आंकड़े बढ़े तो हैं मगर ज्यादातर बच्चों की जान बचाई जा रही है।
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कई मामलों में तो प्री मैच्योर डिलीवरी का कारण पता ही नहीं होता है मगर विशेषज्ञ हाइपरटेंशन, बच्चे दानी का मुंह सामान्य न होना, मधुमेह, खून की कमी, कुपोषण आदि को इसकी वजह मानते हैं। प्री मैच्योर डिलीवरी में बच्चे का विकास सही से नहीं हो पाता है। इस कारण उसे निक्कू में भर्ती करना पड़ता है। बुंदेलखंड में बच्चे से लेकर बड़ों तक में कुपोषण से लेकर एनीमिया बड़ी समस्या है। मेडिकल कॉलेज में पिछले तीन महीनों के ही आंकड़ों को देखें तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि झांसी में लगभग 15 प्रतिशत प्री मैच्योर डिलीवरी हो रही हैं।
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हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि जननी सुरक्षा और जननी शिशु योजना के तहत लोगों में जागरूकता आई है। इस कारण आशाएं भी गर्भवती महिलाओं को समय से अस्पताल ला रही हैं। घर पर प्रसव के मामलों में भी कमी आई है। इसलिए सरकारी आंकड़ों में तो प्री मैच्योर डिलवरी कुछ बढ़ी तो हैं मगर अस्पताल आने की वजह से ज्यादातर बच्चों को जान भी बचाई जा पा रही है।
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प्री मैच्योर डिलीवरी से मां को होने वाली जटिलताएं
जिन महिलाओं का प्रसव 37वें हफ्ते से पहले हो जाता है, उन्हें प्रसव के दौरान और भविष्य में कुछ जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। जैसे कि सिजेरियन, स्तनपान करवाने में समस्या, कमजोरी और थकान की वजह से शिशु को उठाने में समस्या, मधुमेह, मिर्गी, खून की कमी, उच्च रक्तचाप, प्रसव के बाद होने वाला अवसाद और तनाव, कम नींद आना, ध्यान लगाने में कठिनाई आदि।
फेफड़े विकसित करने के लिए निक्कू में रखते
37 सप्ताह से भी कम समय के लिए गर्भ में रहे शिशुओं को गहन देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे में उन्हें एसएनसीयू में रखने की जरूरत पड़ सकती है। प्री मैच्योर नवजातों के फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं। इसकी वजह से उन्हें कई बार ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। वहीं, उन्हें पीलिया और कई तरह के संक्रमण होने का भी डर रहता है। ऐसे में उन्हें एनआईसीयू केयर की जरूरत पड़ती है। कई बार प्लांड प्री मैच्योर डिलीवरी करवाने में डॉक्टर मां को पहले से ही दवाएं देना शुरू कर देती हैं, जिससे बच्चे का लंग्स अच्छे से विकसित हो जाएं।
ये हैं प्रमुख कारण
-18 से कम या 35 वर्ष से ज्यादा उम्र के बाद की गर्भावस्था
- पिछली गर्भावस्था में प्रीमैच्योर डिलीवरी होना
- गर्भ में जुड़वा या उससे ज्यादा भ्रूण होना
- मधुमेह
- उच्च रक्तचाप
- पोषक तत्वों की कमी
- योनी समेत अन्य संक्रमण
- यूट्रस का असामान्य आकार
मेडिकल कॉलेज के आंकड़े
- जनवरी में 226 प्रसव में 38 प्री मैच्योर डिलीवरी यानी 16.81 प्रतिशत
- फरवरी में 159 प्रसव में 37 प्री मैच्योर डिलीवरी यानी 23 प्रतिशत
- मार्च में 175 प्रसव में 26 प्री मैच्योर डिलीवरी यानी 15.11 प्रतिशत
ये बोले विशेषज्ञ
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ज्यादातर मामलों में प्री मैच्योर डिलीवरी का कारण पता नहीं होता है। मगर एनीमिया, कुपोषण, हाईपरटेंशन, देर से शादी, मधुमेह आदि कारणों की वजह से प्री मैच्योर डिलीवरी हो जाती है। वहीं, कई मामलों में यूट्रस का सामान्य आकार न होना भी कारण होता है। जिनकी प्री मैच्योर डिलीवरी पहले हो चुकी होती है। ऐसे 20 प्रतिशत मामलों में फिर से प्री मैच्योर डिलीवरी होने की संभावना रहती है। - डॉ. संजय शर्मा, विभागाध्यक्ष गायनी, मेडिकल कॉलेज झांसी।

जननी सुरक्षा व जननी शिशु योजना से लोगों में जागरूकता आई है। ऐसे में घरेलू प्रसव कम हुए हैं। इस कारण सरकारी आंकड़ों में प्री मैच्योर डिलीवरी कुछ बढ़ी हैं। मगर ज्यादातर बच्चों की जान बचाई जा पा रही है। समय से अस्पताल आ जाने पर इंजेक्शन देकर प्रसव पीड़ा को 48 घंटे तक रोक देते हैं। इस दौरान बच्चे के लंग्स को ठीक कर देते हैं। फिर प्री मैच्योर डिलीवरी के बाद भी बच्चे को सांस लेने में दिक्कत नहीं होती है। - डॉ. रजनी गौतम, सहायक आचार्य, मेडिकल कॉलेज।
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