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झांसी: ध्यानचंद ने ठुकरा दिया था जर्मनी सेना का ऊंचा ओहदा
Sun, 29 Aug 2021 01:52 AM IST
झांसी ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झांसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झांसी
Published by: झांसी ब्यूरो
Updated Sun, 29 Aug 2021 01:52 AM IST
सार
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद में राष्ट्रप्रेम कूट-कूट के भरा हुआ था। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने देश की खातिर जर्मनी सेना में ऊंचे ओहदे का प्रस्ताव एक झटके में ठुकरा दिया था। रविवार को दद्दा का जन्मदिवस है। झांसी के लिए ये दिन किसी त्योहार से कम नहीं है। समूचा झांसी खेल और हॉकी के रंग में रंगा नजर आ रहा है।
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मेजर ध्यानचंद।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद में राष्ट्रप्रेम कूट-कूट के भरा हुआ था। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने देश की खातिर जर्मनी सेना में ऊंचे ओहदे का प्रस्ताव एक झटके में ठुकरा दिया था। रविवार को दद्दा का जन्मदिवस है। झांसी के लिए ये दिन किसी त्योहार से कम नहीं है। समूचा झांसी खेल और हॉकी के रंग में रंगा नजर आ रहा है।
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मेजर ध्यानचंद के करिश्माई खेल के दीवाने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में थे। साल 1928, 1932 और 1936 तीन ओलंपिक खेलों में उन्होंने भारतीय टीम को स्वर्ण पदक दिलाए थे। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले डॉन ब्रेडमैन और जर्मनी के तानाशाह हिटलर तक उनके खेल के मुरीद थे। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम की कमान मेजर ध्यानचंद के हाथ में ही थी। फाइनल मुकाबले में भारतीय टीम ने उस दौर की दुनिया की सबसे सशक्त टीम जर्मनी को 8-1 से हराकर विश्व पटल पर भारत का परचम फहराया था। तब हिटलर ने उन्हें जर्मनी में की सेना में ऊंचे ओहदे का प्रस्ताव दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था। तब ध्यानचंद ने कहा कि था कि उनके लिए हॉकी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि लाखों - करोड़ों भारतीयों को गौरव का अहसास कराने का जरिया है। खेलूंगा तो सिर्फ अपने देश के लिए ही। उनका ये जवाब सुनकर तानाशाह हिटलर भी चौंक गया था। उसे गुलाम भारत के किसी नागरिक की ओर से ऐसे जवाब की कतई उम्मीद नहीं थी।
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प्रयागराज में जन्में और झांसी के होकर रह गए ‘दद्दा’
झांसी। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को प्रयागराज में हुआ था। उनके पिता सोमेश्वर दत्त सिंह सेना में थे। जब ध्यानचंद छह साल के थे, तब उनके पिता का तबादला झांसी हो गया था। वे पूरे परिवार के साथ झांसी आ गए थे। इसके बाद से ध्यानचंद झांसी के ही होकर रह गए। यहां के लोग उन्हें सम्मान में ‘दद्दा’ कहते थे। ये संबोधन सुनना उन्हें भी बेहद अच्छा लगता था। ध्यानचंद कहते थे कि दद्दा में अपनत्व झलकता है और ये संबोधन उन्हें सिर्फ झांसी में ही सुनने को मिलता है।
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उपलब्धियों पर कभी नहीं किया अभिमान
झांसी। मेजर ध्यानचंद के बेटे पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद ने अमर उजाला से हुई बातचीत में बताया कि मेजर ध्यानचंद ने कभी अपनी उपलब्धियों पर अभिमान नहीं किया। दुनिया में भले ही उनकी हॉकी की तूती बोलती थी, लेकिन वे बेहद साधारण जीवन जीते थे। शहर भर में उनके तमाम दोस्त थे, जिनके साथ वे नियमित बैठते थे। हीरोज ग्राउंड में वे बच्चों और युवाओं को हॉकी की बारीकियां बताते हुए अपना सुबह और शाम का वक्त गुजारा करते थे। परिवार पर भी उनकी पूरी नजर रहती थी। उन्होंने कहा कि दद्दा का ये जन्मदिवस खास है। क्योंकि, हाल ही में सरकार ने खेल के सर्वोच्च सम्मान का नामकरण ध्यानचंद के नाम पर किया है।