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देशप्रेम: बुखार में तपते हुए खेलकर ध्यानचंद ने भारत को दिलाया था ओलंपिक का पहला गोल्ड मेडल

Sun, 28 Aug 2022 12:18 AM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, झांसी।
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी। Published by: झांसी ब्यूरो Updated Sun, 28 Aug 2022 12:18 AM IST
सार

फाइनल मुकाबला मेजबान देश हॉलैंड के साथ होना था। उस समय हॉलैंड की टीम को दुनिया की मजबूत टीमों में से एक माना जाता था। लेकिन, मुकाबले के एक दिन पहले ध्यानचंद बुखार की चपेट में आ गए। उन्हें 103 डिग्री बुखार था।

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Dhyan Chand had given India the first gold medal of the Olympics by playing while burning in fever.
मेजर ध्यानचंद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के अंदर का सैनिक उनके खेल में भी नजर आता था। 1928 में हॉलैंड ओलंपिक का फाइनल मैच उन्होंने बुखार में तपते हुए खेला था और एक के बाद एक तीन गोल दागकर भारत को ओलंपिक का पहला स्वर्ण पदक दिलाया था। हालांकि, मैच से पहले टीम मैनेजर ने उन्हें मैदान में उतारने से साफ मना कर दिया था। लेकिन, वे माने नहीं थे और अपनी जिद से मैच खेला था। तब दद्दा ने कहा था ‘सैनिक हूं, युद्ध के अंजाम तक पहुंचने से पहले पीठ नहीं दिखा सकता’।

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साल 1928 भारत के लिए बेहद अहम साबित हुआ था। इस साल भारत को पहली बार ओलंपिक का हिस्सा बनने का मौका मिला था। हालांकि, उस समय दुनिया में भारत की पहचान गुलाम देश के रूप में थी। भारतीय हॉकी टीम को भी अन्य देश बेहद कमतर आंक रहे थे। स्थिति ये थी कि ओलंपिक मैचों के दौरान स्टेडियमों में भारतीय टीम का उत्सावर्धन करने वालों की संख्या इक्का-दुक्का ही होती थी। लेकिन, ओलंपिक के पहले मैच से ही मेजर ध्यानचंद ने अपना करिश्माई खेल दिखाना शुरू कर दिया। भारतीय टीम एक के बाद एक मैच जीतती गई और फाइनल में पहुंच गई। तब दुनिया का ध्यान भारतीय टीम और उसके अहम सदस्य मेजर ध्यानचंद की ओर गया।
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फाइनल मुकाबला मेजबान देश हॉलैंड के साथ होना था। उस समय हॉलैंड की टीम को दुनिया की मजबूत टीमों में से एक माना जाता था। लेकिन, मुकाबले के एक दिन पहले ध्यानचंद बुखार की चपेट में आ गए। उन्हें 103 डिग्री बुखार था। चिकित्सकों की सलाह पर टीम मैनेजर पंकज गुप्ता ने ध्यानचंद को फाइनल मैच में उतरने से मना कर दिया था। लेकिन, वे नहीं माने थे। उन्होंने साफ कह दिया था कि वे एक सैनिक हैं और ये मुकाबला उनके लिए युद्ध के समान है। इसमें जीत मिलने पर गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारतीयों को दुनिया के सामने अपना सिर फक्र से ऊंचा करने का मौका मिलेगा। वे ये मैच जरूर खेलेंगे। दद्दा की जिद के आगे टीम मैनेजर भी नरम पड़ गए थे।
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भारतीय टीम मैदान में उतरी। सामने थी दुनिया की दिग्गज टीम हॉलैंड। स्टेडियम में 45-50 हजार दर्शक थे, जो हॉलैंड की टीम का उत्साह बढ़ा रहे थे। खेल शुरू हुआ, इसके बाद मैदान में हॉलैंड की टीम के ज्यादातर सदस्य ध्यानचंद के पीछे ही भागते नजर आए। ध्यानचंद ने हालैंड के खिलाड़ियों की हॉकी को बॉल के पास तक पहुंचने का मौका ही नहीं दिया। इस मैच में ध्यानचंद ने एक के बाद एक तीन गोल दागे थे। इसके साथ ही भारतीय टीम ने हॉलैंड को 3-0 से करारी शिकस्त देकर ओलंपिक का पहला गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया था। हालांकि, मैच के बाद ध्यानचंद की हालत बिगड़ गई थी और उन्हें ठीक होने में कई दिन लगे थे। उनके इस जज्बे को ब्रिटिश सरकार के अफसरों ने भी सराहा था।

रग-रग में भरा था देशप्रेम: अशोक
मेजर ध्यानचंद के बेटे पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद ने बताया कि उनके दादा समेश्वर दत्त सिंह सेना में सूबेदार थे। सैन्य माहौल में ही ध्यानचंद की परवरिश हुई थी। महज 16 साल की आयु में ध्यानचंद सेना में शामिल हो गए थे। उन्हें जितना फक्र खिलाड़ी होने का था, उतना ही एक सैनिक होने का भी। ध्यानचंद हमेशा कहते थे कि वे देश के लिए खेलते थे। हर जीत वे देशवासियों को समर्पित करते थे, जबकि हार की जिम्मेदारी वे खुद उठाते थे। देश प्रेम उनके रग-रग मेें भरा था।


ध्यानचंद के कहने पर दोस्त ने बांट दी थी ट्रॉफी
सदर बाजार निवासी प्रेमनारायण अग्रवाल ध्यानचंद के जिगरी दोस्तों में से एक थे। प्रेमनारायण भी हॉकी खेलते थे और वे अपनी टीम के कप्तान थे, जिससे उन्हें प्रेम कप्तान के नाम से जाना जाता था। प्रेम कप्तान के पास विभिन्न मैचों में जीती हुईं कई ट्राफियां थीं। प्रेम कप्तान के पुत्र अनूप अग्रवाल व पुत्री अंजू काजरिया ने बताया कि बात 1970 की है। सदर बाजार से सटे एक मैदान में हॉकी मैच का आयोजन किया गया था, जिसे देखने मेजर ध्यानचंद भी पहुंचे थे। वे नवोदित खिलाड़ियों के खेल से बेहद प्रभावित हो गए थे। ध्यानचंद ने खुश होकर कहा कि वे इन खिलाड़ियों को विशेष उपहार देना चाहते हैं और अचानक प्रेम कप्तान से बोले कि तुम अपने घर पर रखीं ट्राफियां उठा लाओ। प्रेम कप्तान तत्काल ट्रॉफी लेकर मैदान में पहुंच गए। उन्होंने अपने हाथों से नवोदित खिलाड़ियों को ट्रॉफियां दीं। इसके बाद ध्यानचंद अपने दोस्त से बोले कि तुम्हारी हर एक ट्रॉफी इन खिलाड़ियों में ऐसी कई-कई ट्रॉफियां हासिल करने का जज्बा पैदा करेगी।

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