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चुनाव से पहले बढ़ी बाउंसरों की डिमांड, सुरक्षा के लिए 25 नेताओं ने एजेंसियों से साधा संपर्क
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झांसी। विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ बाउंसरों की डिमांड बढ़ गई है। अचानक मांग बढ़ने पर फीस भी बढ़ा दी गई। पहले तीस हजार प्रतिमाह के हिसाब से एक बाउंसर को देते थे लेकिन अब चालीस हजार हो गया है। झांसी में ही 25 नेताओं ने अपनी सुरक्षा के लिए सिक्योरिटी एजेंसियों से संपर्क साधा है। एजेंसियों का कहना है कि अभी भी झांसी में 12 और ललितपुर में सात लोगों ने बाउंसर ले रखे हैं।
सुरक्षाकर्मियों को लेकर चलना स्टेटस सिंबल बन गया है लेकिन, अब कई सारे नियम बन जाने से सरकारी सुरक्षा आसानी से नहीं मिलती। ऐसे में बाउंसर की मांग बढ़ी है। काली सफारी सूट में सजे करीब छह फीट ऊंचे, हट्टे-कट्टे बदन वाले बाउंसर कई नेताओं के साथ अक्सर घूमते दिखते हैं। टिकट के लिए ताल ठोंक रहे नेता भी दो-तीन बाउंसर लेकर साथ में घूम रहे हैं। जनसभा और जनता से मिलने के लिए जाते समय भी यह बाउंसर उनके साथ साये की तरह दिखते हैं हालांकि इनमें अधिकांश को सुरक्षा संबंधी कोई परेशानी नहीं है लेकिन, सिर्फ स्टेटस सिंबल के लिए यह नेता हर महीने भारी-भरकम खर्चा उठा रहे हैं।
इनकी देखा-देखी दूसरे नेताओं में भी बाउंसरों की मांग शुरू हो गई है। बाउंसर मुहैया कराने वाली एजेंसी संचालक गौरव गोयल के मुताबिक विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने से मांग में बढ़ोत्तरी हुई है। झांसी में अगले दो माह के भीतर पचास बाउंसर मांगे गए हैं। सर्वाधिक मांग नेताओं की ओर से की गई है। सियासी लोगों के संग चलने वाले बाउंसरों को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। उनको भीड़ काबू में रखने के तरीके भी सिखाए जाते हैं। व्यवसायी एवं रियल स्टेट कारोबारियों के साथ चलने वाले बाउंसर अलग होते हैं। ट्रेड बाउंसर पर हर माह करीब 35-40 हजार रुपये तक का खर्च है। उनके रहने एवं खाने का इंतजाम भी करना होता है। हरियाणा के गुडगांव से अधिकांश एजेंसियां कमीशन पर बाउंसर मांगती हैं।
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डॉक्टरों में भी बाउंसरों का क्रेज
नेताओं के बाद डॉक्टरों में भी बाउंसरों का खासा क्रेज है। नर्सिग होम में सुरक्षा गार्ड के साथ ही कई डॉक्टरों ने अपने साथ बाउंसर रखे हुए हैं। यह बाउंसर उनके साथ साये की तरह रहते हैं। डॉक्टरों के अलावा रियल स्टेट कारोबारी भी यह स्टेटस सिंबल के लिए इनको रख रहे हैं। शहर के आधा दर्जन से अधिक रियल स्टेट कारोबारियों के पास यह बाउंसर देखे जा सकते हैं।
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सुरक्षाकर्मियों को लेकर चलना स्टेटस सिंबल बन गया है लेकिन, अब कई सारे नियम बन जाने से सरकारी सुरक्षा आसानी से नहीं मिलती। ऐसे में बाउंसर की मांग बढ़ी है। काली सफारी सूट में सजे करीब छह फीट ऊंचे, हट्टे-कट्टे बदन वाले बाउंसर कई नेताओं के साथ अक्सर घूमते दिखते हैं। टिकट के लिए ताल ठोंक रहे नेता भी दो-तीन बाउंसर लेकर साथ में घूम रहे हैं। जनसभा और जनता से मिलने के लिए जाते समय भी यह बाउंसर उनके साथ साये की तरह दिखते हैं हालांकि इनमें अधिकांश को सुरक्षा संबंधी कोई परेशानी नहीं है लेकिन, सिर्फ स्टेटस सिंबल के लिए यह नेता हर महीने भारी-भरकम खर्चा उठा रहे हैं।
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इनकी देखा-देखी दूसरे नेताओं में भी बाउंसरों की मांग शुरू हो गई है। बाउंसर मुहैया कराने वाली एजेंसी संचालक गौरव गोयल के मुताबिक विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने से मांग में बढ़ोत्तरी हुई है। झांसी में अगले दो माह के भीतर पचास बाउंसर मांगे गए हैं। सर्वाधिक मांग नेताओं की ओर से की गई है। सियासी लोगों के संग चलने वाले बाउंसरों को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। उनको भीड़ काबू में रखने के तरीके भी सिखाए जाते हैं। व्यवसायी एवं रियल स्टेट कारोबारियों के साथ चलने वाले बाउंसर अलग होते हैं। ट्रेड बाउंसर पर हर माह करीब 35-40 हजार रुपये तक का खर्च है। उनके रहने एवं खाने का इंतजाम भी करना होता है। हरियाणा के गुडगांव से अधिकांश एजेंसियां कमीशन पर बाउंसर मांगती हैं।
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डॉक्टरों में भी बाउंसरों का क्रेज
नेताओं के बाद डॉक्टरों में भी बाउंसरों का खासा क्रेज है। नर्सिग होम में सुरक्षा गार्ड के साथ ही कई डॉक्टरों ने अपने साथ बाउंसर रखे हुए हैं। यह बाउंसर उनके साथ साये की तरह रहते हैं। डॉक्टरों के अलावा रियल स्टेट कारोबारी भी यह स्टेटस सिंबल के लिए इनको रख रहे हैं। शहर के आधा दर्जन से अधिक रियल स्टेट कारोबारियों के पास यह बाउंसर देखे जा सकते हैं।