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भरपेट नहीं मिल रहा दाना, हर रोज मर रहे पांच सौ मुर्गे
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झांसी। कोरोना व लॉकडाउन के चलते जनपद में मुर्गा कारोबार ठप पड़ गया है। फार्म हाउस संचालक मुर्गों को भरपेट दाना तक नहीं खिला पा रहे हैं, जिससे रोजाना पांच सौ से अधिक मुर्गों की भूख से मौत हो रही है। इस समय झांसी के फार्म हाउसों में दो लाख से अधिक मुर्गे हैं। घाटा इस तरह हो रहा है कि कई संचालकों की पूंजी तक डूब गई है। संचालक लॉकडाउन में ढील से उम्मीद लगाए बैठे हैं, ताकि उनके बचे मुर्गे बाजार में बिक सकें।
जनपद में दो सौ से अधिक मुर्गी फार्म हाउस हैं। इस कारोबार में 50 करोड़ से ज्यादा की पूंजी कारोबारियों ने लगा रखी है। पिछले एक महीने से कोरोना व लॉकडाउन के चलते मुर्गा की बिक्री पूरी तरह ठप है। इसकी शुरुआत फरवरी से ही हो गई थी। इसके पहले फार्म हाउस का मुर्गा डेढ़ सौ से दो सौ रुपये तक बिक रहा था। इस बीच भ्रम फैल गया कि इसे खाने से कोरोना संक्रमण हो सकता है। इस कारण दाम घटते- घटते 15 से 20 रुपये तक आ गए। लॉकडाउन के बाद मुर्गों का बिकना बंद हो गया। कारोबारियों के लिए अब मुर्गों को जिंदा रखना चुनौती बना हुआ है। इस समय झांसी के फार्म हाउसों में दो लाख से अधिक मुर्गे हैं। जिन दुकानदारों के पास पहले से दाना उपलब्ध था, उनके पास से ही कारोबारियों को बहुत मुश्किलों से थोड़ा बहुत दाना मिल पा रहा है। एक मुर्गे को जिंदा रखने के लिए करीब सात रुपये प्रतिदिन का दाना लगता है।
कारोबारी मुर्गों को बचाने के लिए लाखों रुपये का दाना अब तक खिला चुके हैं। वहीं, भरपेट दाना नहीं मिलने से रोजाना सौ से अधिक मुर्गों की भूख से मौत हो रही है। जो मुर्गे मरते हैं या तो उनको दफना दिया जाता है या कुत्तों को खाने के लिए डाल दिए जाते हैं। कई फार्म हाउस संचालक मरे मुर्गों को ऐसी ही फेंक देते हैं, जिससे महामारी का भी संकट बना हुआ है। एक फार्म हाउस संचालक ने बताया कि तीन महीने से परेशान हो रहे हैं। उनको प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं दी जा रही है। चिकित्सकों का सहयोग नहीं मिल रहा है। लॉकडाउन में ढील मिलने पर मांस की दुकानें खुलने लगेंगी। इसी उम्मीद से मुर्गों को जिंदा रखे हैं कि मांस की दुकानें खुलने पर फार्म हाउस में रखे मुर्गे बिक जाएंगे।
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जनपद में दो सौ से अधिक मुर्गी फार्म हाउस हैं। इस कारोबार में 50 करोड़ से ज्यादा की पूंजी कारोबारियों ने लगा रखी है। पिछले एक महीने से कोरोना व लॉकडाउन के चलते मुर्गा की बिक्री पूरी तरह ठप है। इसकी शुरुआत फरवरी से ही हो गई थी। इसके पहले फार्म हाउस का मुर्गा डेढ़ सौ से दो सौ रुपये तक बिक रहा था। इस बीच भ्रम फैल गया कि इसे खाने से कोरोना संक्रमण हो सकता है। इस कारण दाम घटते- घटते 15 से 20 रुपये तक आ गए। लॉकडाउन के बाद मुर्गों का बिकना बंद हो गया। कारोबारियों के लिए अब मुर्गों को जिंदा रखना चुनौती बना हुआ है। इस समय झांसी के फार्म हाउसों में दो लाख से अधिक मुर्गे हैं। जिन दुकानदारों के पास पहले से दाना उपलब्ध था, उनके पास से ही कारोबारियों को बहुत मुश्किलों से थोड़ा बहुत दाना मिल पा रहा है। एक मुर्गे को जिंदा रखने के लिए करीब सात रुपये प्रतिदिन का दाना लगता है।
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कारोबारी मुर्गों को बचाने के लिए लाखों रुपये का दाना अब तक खिला चुके हैं। वहीं, भरपेट दाना नहीं मिलने से रोजाना सौ से अधिक मुर्गों की भूख से मौत हो रही है। जो मुर्गे मरते हैं या तो उनको दफना दिया जाता है या कुत्तों को खाने के लिए डाल दिए जाते हैं। कई फार्म हाउस संचालक मरे मुर्गों को ऐसी ही फेंक देते हैं, जिससे महामारी का भी संकट बना हुआ है। एक फार्म हाउस संचालक ने बताया कि तीन महीने से परेशान हो रहे हैं। उनको प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं दी जा रही है। चिकित्सकों का सहयोग नहीं मिल रहा है। लॉकडाउन में ढील मिलने पर मांस की दुकानें खुलने लगेंगी। इसी उम्मीद से मुर्गों को जिंदा रखे हैं कि मांस की दुकानें खुलने पर फार्म हाउस में रखे मुर्गे बिक जाएंगे।
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