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जीवनपर्यंत हिंदी के लिए लड़ते रहे दद्दा
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झांसी। बुंदेलखंड के चिरगांव कसबे में जन्मे राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जीवनपर्यंत हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए लड़ाई लड़ते रहे। मंगलवार को उनकी जयंती पर चिरगांव स्थित समाधि स्थल पर हिंदी प्रेमियों का जमावड़ा रहा। सभी ने उनके हिंदी प्रेम की चर्चा कर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए हिंदी के विकास का संकल्प लिया।
जिस दौर में कवियों पर ब्रज भाषा का और समाज पर अंग्रेजियत का प्रभाव था, उस दौर में मैथिली शरण गुप्त के साहित्यिक गुरु महावीर प्रसाद द्विवेदी खड़ी बोली, अवधी को मिश्रित कर हिंदी के विकास में लगे थे। उन्होंने अपने शिष्य मैथिलीशरण गुप्त को खड़ी बोली में काव्य सृजन के लिए प्रोत्साहित किया। साकेत, भारतभारती, यशोधरा, पंचवटी जैसी कृतियों का सृजन कर मैथिली शरण ने हिंदी को साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित किया।
हिंदी को भय नहीं किसी का मैंने अपनी व्यथा कही...
चिरगांव निवासी साहित्यकार रामप्रकाश गुप्ता बताते हैं कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में काफी संघर्ष रहा। उन्होंने अपने साहित्यिक गुरु महावीर प्रसाद द्विवेदी के निर्देश पर ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली को अपनी काव्य भाषा के रूप में अपनाकर हिंदी को स्थापित करने में विशिष्ट योगदान दिया। बुंदेलखंड के लोग उन्हें दद्दा के रूप में संबोधित करते थे। उनके हिंदी प्रेम को देखकर उनके समकालीन कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने लिखा था- मैथिली शरण थे हिंदी के हित आए।
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रामप्रकाश गुप्त बताते हैं कि दद्दा जी का हिंदी प्रेम इस हद तक था कि जब उन्हें राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया गया तो वह सदन में अपना भाषण भी हिंदी की कविता के रूप में ही देते थे। 1963 में जब राजभाषा विधेयक पर चर्चा हो रही थी, तब कुछ लोगों द्वारा अंग्रेजी भाषा का समर्थन कि ए जाने पर उन्होंने कहा था, हिंदी को भय नहीं किसी का मैंने अपनी व्यथा कही, मत देने को मैं स्वतंत्र हूं, मुझे एक संतोष यही।
जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं, वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
कवि अर्जुन सिंह चांद कहते हैं कि मैथिली शरण गुप्त की पीढ़ी से पहले महाकवि तुलसी दास ने खड़ी बोली में रामचरित मानस का सृजन कर हिंदी को साहित्य की भाषा में विकसित करने का प्रयास किया था अन्यथा इसके पहले वाल्मीकि की रामायण संस्कृत में थी, महाकवि केशव की रामचंद्रिका कठिन हिंदी में थी जो आमजन की भाषा और समझ से काफी दूर थी। इन ग्रंथों के नायक श्रीराम सिर्फ अभिजात्य और विद्वानों के राम बनकर रह गए थे, पर जब बाबा तुलसी ने खड़ी बोली में रामचरित मानस की रचना की तो राम जन नायक बन गए । इसके बाद मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत, पंचवटी जैसी रचनाओं का सृजन कर श्रीराम को जन नायक से जन जन के राम बना दिया। आम आदमी की समझ और सोच से सीधा सरोकार रखने वाली सरल हिंदी में साहित्य सृजन कर उन्होंने जन की भाषा से संवेदनाओं को जोड़ दिया। सरल हिंदी के बड़े ही सपाट शब्दों में मैथिली शरण गुप्त लिखते हैं- अबला जीवन हाय ,तुम्हारी यही कहानी। आंचल में हैं दूध और आंखों में पानी। चांद कहते हैं राष्ट्रकवि की रचनाएं स्वदेश प्रेम का भी संदेश देती है, उन्होंने लिखा है- जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं। वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
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जिस दौर में कवियों पर ब्रज भाषा का और समाज पर अंग्रेजियत का प्रभाव था, उस दौर में मैथिली शरण गुप्त के साहित्यिक गुरु महावीर प्रसाद द्विवेदी खड़ी बोली, अवधी को मिश्रित कर हिंदी के विकास में लगे थे। उन्होंने अपने शिष्य मैथिलीशरण गुप्त को खड़ी बोली में काव्य सृजन के लिए प्रोत्साहित किया। साकेत, भारतभारती, यशोधरा, पंचवटी जैसी कृतियों का सृजन कर मैथिली शरण ने हिंदी को साहित्यिक भाषा के रूप में विकसित किया।
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हिंदी को भय नहीं किसी का मैंने अपनी व्यथा कही...
चिरगांव निवासी साहित्यकार रामप्रकाश गुप्ता बताते हैं कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में काफी संघर्ष रहा। उन्होंने अपने साहित्यिक गुरु महावीर प्रसाद द्विवेदी के निर्देश पर ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली को अपनी काव्य भाषा के रूप में अपनाकर हिंदी को स्थापित करने में विशिष्ट योगदान दिया। बुंदेलखंड के लोग उन्हें दद्दा के रूप में संबोधित करते थे। उनके हिंदी प्रेम को देखकर उनके समकालीन कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने लिखा था- मैथिली शरण थे हिंदी के हित आए।
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रामप्रकाश गुप्त बताते हैं कि दद्दा जी का हिंदी प्रेम इस हद तक था कि जब उन्हें राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया गया तो वह सदन में अपना भाषण भी हिंदी की कविता के रूप में ही देते थे। 1963 में जब राजभाषा विधेयक पर चर्चा हो रही थी, तब कुछ लोगों द्वारा अंग्रेजी भाषा का समर्थन कि ए जाने पर उन्होंने कहा था, हिंदी को भय नहीं किसी का मैंने अपनी व्यथा कही, मत देने को मैं स्वतंत्र हूं, मुझे एक संतोष यही।
जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं, वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
कवि अर्जुन सिंह चांद कहते हैं कि मैथिली शरण गुप्त की पीढ़ी से पहले महाकवि तुलसी दास ने खड़ी बोली में रामचरित मानस का सृजन कर हिंदी को साहित्य की भाषा में विकसित करने का प्रयास किया था अन्यथा इसके पहले वाल्मीकि की रामायण संस्कृत में थी, महाकवि केशव की रामचंद्रिका कठिन हिंदी में थी जो आमजन की भाषा और समझ से काफी दूर थी। इन ग्रंथों के नायक श्रीराम सिर्फ अभिजात्य और विद्वानों के राम बनकर रह गए थे, पर जब बाबा तुलसी ने खड़ी बोली में रामचरित मानस की रचना की तो राम जन नायक बन गए । इसके बाद मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत, पंचवटी जैसी रचनाओं का सृजन कर श्रीराम को जन नायक से जन जन के राम बना दिया। आम आदमी की समझ और सोच से सीधा सरोकार रखने वाली सरल हिंदी में साहित्य सृजन कर उन्होंने जन की भाषा से संवेदनाओं को जोड़ दिया। सरल हिंदी के बड़े ही सपाट शब्दों में मैथिली शरण गुप्त लिखते हैं- अबला जीवन हाय ,तुम्हारी यही कहानी। आंचल में हैं दूध और आंखों में पानी। चांद कहते हैं राष्ट्रकवि की रचनाएं स्वदेश प्रेम का भी संदेश देती है, उन्होंने लिखा है- जो भरा नहीं है भावों से, जिसमें बहती रसधार नहीं। वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।