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Jhansi News: चंद्रमा की रोशनी में अभ्यास कर दद्दा ध्यानचंद ने सोने पर साधा था निशाना
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। ओलंपिक खेलों का शुक्रवार को आगाज होने जा रहा है। पूरे देश की निगाहें ओलंपिक में गए भारतीय दल पर टिकी हुई हैं। ओलंपिक खेलों में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भी खेलप्रेमी खूब याद कर रहे हैं। लेकिन, कम ही लोग जानते हैं कि दिन के उजाले में अपने करिश्माई खेल का प्रदर्शन करने वाले मेजर ध्यानचंद हॉकी का अभ्यास रात में चंद्रमा की रोशनी में किया करते थे।
सन 1928 में हुए ओलंपिक खेलों में भारत ने पहली बार स्वर्ण पदक जीता था। यह पदक हॉकी के नाम रहा था और इसमें बड़ी भूमिका मेजर ध्यानचंद की रही थी। इस सफलता ने गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत की जनता को गौरव का अहसास कराया था।
इसके बाद 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में भी भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक अपने नाम किए। भारत को ये तीनों सफलता मेजर ध्यानचंद के करिश्माई खेल के बूते मिली थी। इसी वजह से ध्यानचंद की पूरी दुनिया में पहचान हॉकी के जादूगर के रूप में हो गई थी। लेकिन, इस मुकाम पर पहुंचने के लिए ध्यानचंद को कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। महज 16 साल की उम्र में वह सिपाही के रूप में भारतीय सेना का हिस्सा बन गए थे। इसके साथ ही उन्होंने हॉकी खेलना शुरू कर दिया था।
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वह बाकी खिलाड़ियों के साथ दिन में हॉकी खेलते थे, जबकि रात में अकेले मैदान पर पहुंच जाते थे। चंद्रमा की रोशनी में वह घंटों सफेद बॉल को अपनी हॉकी के इशारे पर नचाते रहते थे। वह कहते थे कि रात में ज्यादा एकाग्रता से अभ्यास होता है। इसके अलावा अभ्यास के लिए समय भी पर्याप्त मिल जाता है। नवोदित खिलाड़ियों को भी वह कुछ समय अकेले में रहकर अभ्यास करने की सलाह देते थे। ी
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झांसी। ओलंपिक खेलों का शुक्रवार को आगाज होने जा रहा है। पूरे देश की निगाहें ओलंपिक में गए भारतीय दल पर टिकी हुई हैं। ओलंपिक खेलों में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भी खेलप्रेमी खूब याद कर रहे हैं। लेकिन, कम ही लोग जानते हैं कि दिन के उजाले में अपने करिश्माई खेल का प्रदर्शन करने वाले मेजर ध्यानचंद हॉकी का अभ्यास रात में चंद्रमा की रोशनी में किया करते थे।
सन 1928 में हुए ओलंपिक खेलों में भारत ने पहली बार स्वर्ण पदक जीता था। यह पदक हॉकी के नाम रहा था और इसमें बड़ी भूमिका मेजर ध्यानचंद की रही थी। इस सफलता ने गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत की जनता को गौरव का अहसास कराया था।
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इसके बाद 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में भी भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक अपने नाम किए। भारत को ये तीनों सफलता मेजर ध्यानचंद के करिश्माई खेल के बूते मिली थी। इसी वजह से ध्यानचंद की पूरी दुनिया में पहचान हॉकी के जादूगर के रूप में हो गई थी। लेकिन, इस मुकाम पर पहुंचने के लिए ध्यानचंद को कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। महज 16 साल की उम्र में वह सिपाही के रूप में भारतीय सेना का हिस्सा बन गए थे। इसके साथ ही उन्होंने हॉकी खेलना शुरू कर दिया था।
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वह बाकी खिलाड़ियों के साथ दिन में हॉकी खेलते थे, जबकि रात में अकेले मैदान पर पहुंच जाते थे। चंद्रमा की रोशनी में वह घंटों सफेद बॉल को अपनी हॉकी के इशारे पर नचाते रहते थे। वह कहते थे कि रात में ज्यादा एकाग्रता से अभ्यास होता है। इसके अलावा अभ्यास के लिए समय भी पर्याप्त मिल जाता है। नवोदित खिलाड़ियों को भी वह कुछ समय अकेले में रहकर अभ्यास करने की सलाह देते थे। ी