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मजदूरों की पुलियों पर बढ़ी ग्रामीणों की भीड़
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 19 Apr 2016 12:40 AM IST
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dry bundelkhand, jhasni news
- फोटो : amar ujala
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झांसी। बुंदेलखंड में सूखे के संकट का सामना कर रहे किसान महानगर में मजदूरी करने के लिए आने को मजबूर हो रहे हैं। यहीं कारण है कि पिछले एक साल में मजदूरों की संख्या नगर की सभी पुलियों पर तीन गुना तक पहुंच गई है। मजदूरों की बढ़ी संख्या के कारण माह में बारह से पंद्रह दिन ही एक व्यक्ति को काम मिल पा रहा है।
बुंदेलखंड में सूखे की त्रासदी झेल रहे हजारों किसानों के समक्ष अब पेट पालने के लिए मजदूरी ही एक विकल्प बचा है। एक तरफ जहां हजारों किसान अपने परिवार के साथ पलायन कर दिल्ली, पंजाब समेत दूसरे महानगरों में मजदूरी कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ शेष बचे गरीब किसान आसपास के नगरों में ही दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए काम के लिए जंग लड़ रहे हैं। यह कड़वा सच प्रतिदिन झांसी महानगर में देखा जा सकता है।
दो वक्त की रोटी के लिए महानगर में प्रतिदिन दस- बीस किलोमीटर नहीं बल्कि पचास- पचास किलोमीटर दूर गांवों से गरीब किसान मजदूरी करने आ रहे हैं। महानगर में सीपरी बाजार, बड़ा बाजार, शिवाजी नगर, सदर बाजार व नई बस्ती में मजदूरों की पुलिया बनी हुई हैं। प्रत्येक पुलिया पर एक साल पहले तक दो से ढाई सौ मजदूर ही जुटते थे और अधिकांश हाथों को काम मिल जाता था। मगर अब मजदूरों की संख्या बढ़ने से स्थितियां बदल गई हैं।
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इन सभी जगह सुबह साढ़े सात बजे से मजदूरों का जुटना शुरू हो जाता है। यह संख्या अब तीन गुना से अधिक पर पहुंच गई हैं। इस कारण हर हाथ को अब काम मिल पाना रोज संभव नहीं हो पा रहा है। सैकड़ों किसानों को आए दिन काम न मिलने पर मायूस होकर घर लौटना पड़ रहा है। काम न मिलने पर आने- जाने का किराया अलग से चुकाना पड़ता है। इनमें पढ़े- लिखे युवाओं की संख्या भी कम नहीं हैं, जो परिवार की जिम्मेदारियों के कारण नौकरी की तलाश को भूल मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं। ढाई सौ की मजदूरी न मिले तो दौ सौ रुपये में भी काम करने को तैयार रहते हैं।
मजदूरी नहीं करेंगे तो कैसे पालेेंगे पेट
मजदूरी करने आ रहे बुंदेलखंड के हर किसान का दर्द एक सा ही नजर आता है। उनका कहना है कि मजदूरी नहीं करेंगे तो पेट कैसे पालेंगे।
मऊरानीपुर क्षेत्र के ग्राम पचवारा निवासी राकेश हाईस्कूल पास व सात बीघा जमीन का कास्तकार है। पिछले तीन साल से वह पत्नी व बच्चों के साथ आईटीआई पर किराए के मकान में रहकर मजदूरी कर रहा है। उसने बताया है कि उसकी सात बीघा जमीन सूखे के कारण बंजर पड़ी हैं।
पहले महीने में बीस से पच्चीस दिन काम मिल जाता था, मगर अब मजदूरों की संख्या बढ़ने से पंद्रह दिन काम मिल जाए तो बहुत बड़ी बात है। मजदूरी भी ढाई सौ की जगह अगर दो सौ रुपये भी देने को तैयार हो जाता है, तो वह काम कर लेता है। मध्य प्रदेश के दतिया क्षेत्र के इंदरगढ़ स्थित ग्राम पूरा निवासी रज्जन का कहना है कि पत्नी व तीन बच्चे हैं। सूखे से उसकी दस बीघा जमीन में एक अन्न का दाना नहीं हुआ है। मजबूरन वह पचास किलोमीटर दूर से रोज मजदूरी करने झांसी आता है। अक्सर काम न मिलने के कारण उसे वापस लौटना पड़ता है। चिरुला निवासी 18 वर्षीय सौरभ पढ़ने की उम्र में पिछले एक साल से मजदूरी करने आ रहा है, उसकी माने तो उसके पिता खेती पर ही निर्भर है।
पिछले दो साल से खेती सूखी पड़ी है। पिता ऐसी अवस्था में नहीं हैं कि वह मजदूरी कर सकें, इस कारण परिवार के सदस्यों का पेट भरने के लिए उसे मजदूरी करनी पड़ रही है। सूखे से जूझ रहे पृथ्वीपुर क्षेत्र के ग्राम जीरौन निवासी कहर, शिवपुरी क्षेत्र के पिछोर निवासी मुकेश, टीकमगढ़ क्षेत्र ग्वाल धमना निवासी भगवान दास, पिछोर क्षेत्र के ग्राम खुरौल निवासी अमान सिंह आदि ने भी कुछ ऐसा ही दर्द बया किया।
सबका मालिक एक पर खाते है खाना
चित्रा चौराहे पर स्थित ‘सबका मालिक एक’ पर चल रहा लंगर दर्जनों मजदूरों की प्रतिदिन भूख मिटा रहा है। दरअसल, दूर- दूर क्षेत्रों से आने वाले मजदूरों को जब काम नहीं मिलता है तो वह सबका मालिक एक पर ही खाना खा लाते है। किराया न होने पर रेलवे स्टेशन परिसर या फुटपाथ पर सोकर रात गुजार लेते हैं।
दो दिनों की नहीं दी मजदूरी
गरीब की मजबूरी का फायदा उठाने में कुछ शहरी लोग भी पीछे नहीं है। समथर निवासी 18 वर्षीय राजा ने अपने दोस्त के साथ आवास विकास स्थित फौजी चौराहा पर एक दबंग व्यक्ति के घर काम किया था। दो दिन काम कराने के बाद बिना मजदूरी दिए ही दबंग ने दोनों को भगा दिया। वह अपनी पीड़ा न तो किसी को बता सके और न ही किसी से उनको मदद मिल सकी।
केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं का नहीं मिल पा रहा लाभ
जनशक्ति निर्माण श्रमिक मजदूर यूनियन के दुलीचंद्र अहिरवार ने बताया कि श्रम विभाग मजदूरों का पंजीयन करने से पहले नब्बे दिन के काम का लेखा जोखा मांगता है, जो मजदूर के लिए उपलब्ध करा पाना संभव नहीं हो पाता है। इस कारण, मजदूरों को केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा न तो मजदूरों के खड़ा होने के लिए कोई उचित स्थान है और न ही उनकी मजदूरी बढ़ पा रही है। इस संबंध में वह महापौर को कई बार ज्ञापन दे चुके हैं, मगर कोई मदद अब तक उन्हें नहीं मिल सकी है।
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बुंदेलखंड में सूखे की त्रासदी झेल रहे हजारों किसानों के समक्ष अब पेट पालने के लिए मजदूरी ही एक विकल्प बचा है। एक तरफ जहां हजारों किसान अपने परिवार के साथ पलायन कर दिल्ली, पंजाब समेत दूसरे महानगरों में मजदूरी कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ शेष बचे गरीब किसान आसपास के नगरों में ही दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए काम के लिए जंग लड़ रहे हैं। यह कड़वा सच प्रतिदिन झांसी महानगर में देखा जा सकता है।
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दो वक्त की रोटी के लिए महानगर में प्रतिदिन दस- बीस किलोमीटर नहीं बल्कि पचास- पचास किलोमीटर दूर गांवों से गरीब किसान मजदूरी करने आ रहे हैं। महानगर में सीपरी बाजार, बड़ा बाजार, शिवाजी नगर, सदर बाजार व नई बस्ती में मजदूरों की पुलिया बनी हुई हैं। प्रत्येक पुलिया पर एक साल पहले तक दो से ढाई सौ मजदूर ही जुटते थे और अधिकांश हाथों को काम मिल जाता था। मगर अब मजदूरों की संख्या बढ़ने से स्थितियां बदल गई हैं।
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इन सभी जगह सुबह साढ़े सात बजे से मजदूरों का जुटना शुरू हो जाता है। यह संख्या अब तीन गुना से अधिक पर पहुंच गई हैं। इस कारण हर हाथ को अब काम मिल पाना रोज संभव नहीं हो पा रहा है। सैकड़ों किसानों को आए दिन काम न मिलने पर मायूस होकर घर लौटना पड़ रहा है। काम न मिलने पर आने- जाने का किराया अलग से चुकाना पड़ता है। इनमें पढ़े- लिखे युवाओं की संख्या भी कम नहीं हैं, जो परिवार की जिम्मेदारियों के कारण नौकरी की तलाश को भूल मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं। ढाई सौ की मजदूरी न मिले तो दौ सौ रुपये में भी काम करने को तैयार रहते हैं।
मजदूरी नहीं करेंगे तो कैसे पालेेंगे पेट
मजदूरी करने आ रहे बुंदेलखंड के हर किसान का दर्द एक सा ही नजर आता है। उनका कहना है कि मजदूरी नहीं करेंगे तो पेट कैसे पालेंगे।
मऊरानीपुर क्षेत्र के ग्राम पचवारा निवासी राकेश हाईस्कूल पास व सात बीघा जमीन का कास्तकार है। पिछले तीन साल से वह पत्नी व बच्चों के साथ आईटीआई पर किराए के मकान में रहकर मजदूरी कर रहा है। उसने बताया है कि उसकी सात बीघा जमीन सूखे के कारण बंजर पड़ी हैं।
पहले महीने में बीस से पच्चीस दिन काम मिल जाता था, मगर अब मजदूरों की संख्या बढ़ने से पंद्रह दिन काम मिल जाए तो बहुत बड़ी बात है। मजदूरी भी ढाई सौ की जगह अगर दो सौ रुपये भी देने को तैयार हो जाता है, तो वह काम कर लेता है। मध्य प्रदेश के दतिया क्षेत्र के इंदरगढ़ स्थित ग्राम पूरा निवासी रज्जन का कहना है कि पत्नी व तीन बच्चे हैं। सूखे से उसकी दस बीघा जमीन में एक अन्न का दाना नहीं हुआ है। मजबूरन वह पचास किलोमीटर दूर से रोज मजदूरी करने झांसी आता है। अक्सर काम न मिलने के कारण उसे वापस लौटना पड़ता है। चिरुला निवासी 18 वर्षीय सौरभ पढ़ने की उम्र में पिछले एक साल से मजदूरी करने आ रहा है, उसकी माने तो उसके पिता खेती पर ही निर्भर है।
पिछले दो साल से खेती सूखी पड़ी है। पिता ऐसी अवस्था में नहीं हैं कि वह मजदूरी कर सकें, इस कारण परिवार के सदस्यों का पेट भरने के लिए उसे मजदूरी करनी पड़ रही है। सूखे से जूझ रहे पृथ्वीपुर क्षेत्र के ग्राम जीरौन निवासी कहर, शिवपुरी क्षेत्र के पिछोर निवासी मुकेश, टीकमगढ़ क्षेत्र ग्वाल धमना निवासी भगवान दास, पिछोर क्षेत्र के ग्राम खुरौल निवासी अमान सिंह आदि ने भी कुछ ऐसा ही दर्द बया किया।
सबका मालिक एक पर खाते है खाना
चित्रा चौराहे पर स्थित ‘सबका मालिक एक’ पर चल रहा लंगर दर्जनों मजदूरों की प्रतिदिन भूख मिटा रहा है। दरअसल, दूर- दूर क्षेत्रों से आने वाले मजदूरों को जब काम नहीं मिलता है तो वह सबका मालिक एक पर ही खाना खा लाते है। किराया न होने पर रेलवे स्टेशन परिसर या फुटपाथ पर सोकर रात गुजार लेते हैं।
दो दिनों की नहीं दी मजदूरी
गरीब की मजबूरी का फायदा उठाने में कुछ शहरी लोग भी पीछे नहीं है। समथर निवासी 18 वर्षीय राजा ने अपने दोस्त के साथ आवास विकास स्थित फौजी चौराहा पर एक दबंग व्यक्ति के घर काम किया था। दो दिन काम कराने के बाद बिना मजदूरी दिए ही दबंग ने दोनों को भगा दिया। वह अपनी पीड़ा न तो किसी को बता सके और न ही किसी से उनको मदद मिल सकी।
केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं का नहीं मिल पा रहा लाभ
जनशक्ति निर्माण श्रमिक मजदूर यूनियन के दुलीचंद्र अहिरवार ने बताया कि श्रम विभाग मजदूरों का पंजीयन करने से पहले नब्बे दिन के काम का लेखा जोखा मांगता है, जो मजदूर के लिए उपलब्ध करा पाना संभव नहीं हो पाता है। इस कारण, मजदूरों को केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा न तो मजदूरों के खड़ा होने के लिए कोई उचित स्थान है और न ही उनकी मजदूरी बढ़ पा रही है। इस संबंध में वह महापौर को कई बार ज्ञापन दे चुके हैं, मगर कोई मदद अब तक उन्हें नहीं मिल सकी है।