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संकट में खादी भंडार, 40 फीसदी तक सिमट गया व्यापार
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झांसी। स्वतंत्रता के आंदोलन में लोगों में देश प्रेम का संचार करने वाली खादी अब खतरे में है। बीते 10 साल में खादी की मांग लगातार गिरती जा रही है। खादी का व्यापार महज 40 फीसदी तक सिमट गया है। हालात यह हो चले हैं कि जिले में चल रहे खादी भंडारों का संचालन तक मुश्किल से हो पा रहा है। कर्मचारियों का वेतन, बिजली का बिल और किराया तक बमुश्किल जमा हो पा रहा है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों की होली जलाकर देशवासियों से हाथ से बुने खादी के कपड़ों को पहनने का आह्वान किया था। इसके बाद लोगों ने खादी को अपनाया और एक वक्त आया कि विदेशी कपड़ों की मांग कम हो गई। देश आजाद होने के बाद सरकार ने हर शहर और कस्बे में गांधी आश्रम और खादी भंडार शुरू कर बुनकरों के प्रोत्साहन का काम किया। शुरुआत में तो यह खादी भंडार ठीक-ठाक चले। जैसे-जैसे समय बदला तो खादी लोगों की पसंद से बाहर होने लगी। बीते 10 साल में खादी की मांग गिरकर 40 फीसदी पर आ गई है। बुनकरों के आगे रोजी-रोटी का संकट खड़ा हुआ, तो उन्होंने भी काम छोड़ दिया। झांसी में दो बुनकर समूह के करीब आठ केंद्र संचालित होते हैं। इन केंद्रों से 10 साल पहले तक हर साल करीब 60 से 70 लाख तक की बिक्री हुआ करती थी, जो अब महज 30 लाख तक सिमट गई है। क्षेत्रीय गांधी आश्रम खादी भंडार सैंयर गेट के व्यवस्थापक राम अवध चौबे बताते हैं कि खादी का कपड़ा महंगा होता है और इसे बनाने में समय और श्रम दोनों ज्यादा लगता है। एक तो महंगाई और दूसरा लोगों का रुझान कम होने से खादी की मांग कम हो रही है। हालात यह हैं कि 100 में महज 10 लोग ही खादी के कपड़े मांगते हैं। इससे माल भी ज्यादा नहीं मंगाते हैं।
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बुनकरों की कम हो रही संख्या
दया सागर कंपाउंड में संचालित खादी भंडार के व्यवस्थापक चतुर सिंह यादव बताते हैं कि खादी का क्रेज लगातार कम हो रहा है। इससे बुनकरों को भी काम नहीं मिल रहा है। पहले झांसी में ही 500 से ज्यादा बुनकर हुआ करते थे, अब महज 50 के आसपास ही बचे हैं।
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लिहाफ और कुर्ता पजामा तक सीमित है बिक्री
मानिक चौक स्थित गांधी भंडार के संचालक बताते हैं कि खादी के कपड़ों की मांग ज्यादा नहीं है। हर साल अक्तूबर में जब 20-30 फीसदी छूट का ऐलान होता है, तो लिहाफ और कुर्ता पजामा, सदरी की कुछ मांग बढ़ती है। कई बार तो ग्राहक छूट के बारे में पूछकर तो जाते हैं, लेकिन फिर आते ही नहीं हैं।
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तिरंगे से हुई कमाई
हर साल खादी भंडारों पर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगे की बिक्री की जाती है। पिछले सालों तक तो इसकी अधिक बिक्री नहीं हुई, लेकिन इस बार मंडल में खादी भंडार ने करीब एक हजार तिरंगों की बिक्री है। ललितपुर में डेढ़ लाख, मानिक चौक केंद्र से 35 हजार और गुसाईंपुरा केंद्र से 25 हजार रुपये के तिरंगा खरीदे गए। मांग अधिक होने से कुछ केंद्रों पर तो झंडे दोबारा मंगाने पड़े थे।
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स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों की होली जलाकर देशवासियों से हाथ से बुने खादी के कपड़ों को पहनने का आह्वान किया था। इसके बाद लोगों ने खादी को अपनाया और एक वक्त आया कि विदेशी कपड़ों की मांग कम हो गई। देश आजाद होने के बाद सरकार ने हर शहर और कस्बे में गांधी आश्रम और खादी भंडार शुरू कर बुनकरों के प्रोत्साहन का काम किया। शुरुआत में तो यह खादी भंडार ठीक-ठाक चले। जैसे-जैसे समय बदला तो खादी लोगों की पसंद से बाहर होने लगी। बीते 10 साल में खादी की मांग गिरकर 40 फीसदी पर आ गई है। बुनकरों के आगे रोजी-रोटी का संकट खड़ा हुआ, तो उन्होंने भी काम छोड़ दिया। झांसी में दो बुनकर समूह के करीब आठ केंद्र संचालित होते हैं। इन केंद्रों से 10 साल पहले तक हर साल करीब 60 से 70 लाख तक की बिक्री हुआ करती थी, जो अब महज 30 लाख तक सिमट गई है। क्षेत्रीय गांधी आश्रम खादी भंडार सैंयर गेट के व्यवस्थापक राम अवध चौबे बताते हैं कि खादी का कपड़ा महंगा होता है और इसे बनाने में समय और श्रम दोनों ज्यादा लगता है। एक तो महंगाई और दूसरा लोगों का रुझान कम होने से खादी की मांग कम हो रही है। हालात यह हैं कि 100 में महज 10 लोग ही खादी के कपड़े मांगते हैं। इससे माल भी ज्यादा नहीं मंगाते हैं।
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बुनकरों की कम हो रही संख्या
दया सागर कंपाउंड में संचालित खादी भंडार के व्यवस्थापक चतुर सिंह यादव बताते हैं कि खादी का क्रेज लगातार कम हो रहा है। इससे बुनकरों को भी काम नहीं मिल रहा है। पहले झांसी में ही 500 से ज्यादा बुनकर हुआ करते थे, अब महज 50 के आसपास ही बचे हैं।
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लिहाफ और कुर्ता पजामा तक सीमित है बिक्री
मानिक चौक स्थित गांधी भंडार के संचालक बताते हैं कि खादी के कपड़ों की मांग ज्यादा नहीं है। हर साल अक्तूबर में जब 20-30 फीसदी छूट का ऐलान होता है, तो लिहाफ और कुर्ता पजामा, सदरी की कुछ मांग बढ़ती है। कई बार तो ग्राहक छूट के बारे में पूछकर तो जाते हैं, लेकिन फिर आते ही नहीं हैं।
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तिरंगे से हुई कमाई
हर साल खादी भंडारों पर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगे की बिक्री की जाती है। पिछले सालों तक तो इसकी अधिक बिक्री नहीं हुई, लेकिन इस बार मंडल में खादी भंडार ने करीब एक हजार तिरंगों की बिक्री है। ललितपुर में डेढ़ लाख, मानिक चौक केंद्र से 35 हजार और गुसाईंपुरा केंद्र से 25 हजार रुपये के तिरंगा खरीदे गए। मांग अधिक होने से कुछ केंद्रों पर तो झंडे दोबारा मंगाने पड़े थे।