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फंसे शव और मदद को हिलते लहूलुहान हाथ
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 21 Nov 2016 12:46 AM IST
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- फोटो : demo
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कानपुर देहात में पुखरायां और मलासा के बीच जिस वक्त इंदौर-पटना एक्सप्रेस दुघर्टनाग्रस्त हुई, उस वक्त उसमें झांसी की नगरिया कॉलोनी, खुशीपुरा निवासी रिटायर रेल अधिकारी शंभू दयाल भी अपनी बेटी माधवी के साथ सफर कर रहे थे। झांसी लौटकर उन्होंने अमर उजाला से घटनास्थल का हाल बयान किया। जैसा उन्होंने देखा और सुना, उन्हीं जुबानी ज्यों की त्यों प्रस्तुत है...
रात लगभग तीन बजे तेज झटका लगा और मेरी नींद खुल गई। मैंने अपने एस-10 कोच की बर्थ नंबर-19 से बाहर झांका देखा तो दृश्य बहुत ही भयावह था। अंधेरे के बीच चीख पुकार मची थी। इस बीच हमारे आसपास के यात्री भी जाग गए। हम सभी समझ चुके थे कि ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। यात्री सहमे थे और कुछ तो कांप रहे थे।
मैंने बगल में सो रही अपनी बेटी माधवी पर नजर डाली तो वह और सुरक्षित थी। जान में जान आई। अंधेरा था तो मेरी और अन्य यात्रियों की कोच से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पड़ी। सभी दहशत में थे। मैंने देखा कि आसपास गांवों के लोग ट्रेन की तरफ आ रहे हैं। देखते ही देखते वे कोचों में फंसे यात्रियों की मदद करने लगे। किसी ने घायल को निकाला तो कोई किसी को बाहर निकालने की कोशिश में जुटा था। कुछ समय बाद ही पुलिस और रेल के अधिकारी आ गए। मेरे कोच में भी आए और खैरियत पूछकर चले गए। अब धीरे-धीरे अंधेरा छट रहा था और हादसे की काली तस्वीर सामने आती जा रही थी। आवाज आई, 20 मर गए, फिर 25, 30, 40, 60, 70.....लगातार बढ़ रही संख्या सुनकर बेहोशी छा रही थी।
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अल सुबह मैं कोच से उतरा और देखा कि चारो ओर कोहराम मचा है। हर तरफ खून, कोचों में फंसे शव, फंसे घायलों के मदद के लिए हिलते हाथ, चीखें और भीड़। यह नजारा देख मेरी बेटी सहमी थी। गांव वालों से रास्ता पूछता हुआ पैदल बेटी के साथ आधा किलोमीटर दूर तक आया। वहां से बस से उरई और फिर झांसी आ गया। मैं झांसी से लखनऊ एसी कोच में जाना चाहता था पर रिजर्वेशन नहीं मिला तो तत्काल में स्लीपर का टिकट करवा लिया। लखनऊ में बेटी को पावर कारपोरेशन में नियुक्ति के लिए परीक्षा देनी थी। अब सोचता हूं कि यदि एसी में रिजर्वेशन मिल जाता तो शायद मैं और मेरी बेटी भी हादसे का शिकार हो सकती थी। हादसे का वह मंजर अब भी दिल दिमाग में घूम रहा है। बेटी तो बुरी तरह सहमी है।
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रात लगभग तीन बजे तेज झटका लगा और मेरी नींद खुल गई। मैंने अपने एस-10 कोच की बर्थ नंबर-19 से बाहर झांका देखा तो दृश्य बहुत ही भयावह था। अंधेरे के बीच चीख पुकार मची थी। इस बीच हमारे आसपास के यात्री भी जाग गए। हम सभी समझ चुके थे कि ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। यात्री सहमे थे और कुछ तो कांप रहे थे।
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मैंने बगल में सो रही अपनी बेटी माधवी पर नजर डाली तो वह और सुरक्षित थी। जान में जान आई। अंधेरा था तो मेरी और अन्य यात्रियों की कोच से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पड़ी। सभी दहशत में थे। मैंने देखा कि आसपास गांवों के लोग ट्रेन की तरफ आ रहे हैं। देखते ही देखते वे कोचों में फंसे यात्रियों की मदद करने लगे। किसी ने घायल को निकाला तो कोई किसी को बाहर निकालने की कोशिश में जुटा था। कुछ समय बाद ही पुलिस और रेल के अधिकारी आ गए। मेरे कोच में भी आए और खैरियत पूछकर चले गए। अब धीरे-धीरे अंधेरा छट रहा था और हादसे की काली तस्वीर सामने आती जा रही थी। आवाज आई, 20 मर गए, फिर 25, 30, 40, 60, 70.....लगातार बढ़ रही संख्या सुनकर बेहोशी छा रही थी।
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अल सुबह मैं कोच से उतरा और देखा कि चारो ओर कोहराम मचा है। हर तरफ खून, कोचों में फंसे शव, फंसे घायलों के मदद के लिए हिलते हाथ, चीखें और भीड़। यह नजारा देख मेरी बेटी सहमी थी। गांव वालों से रास्ता पूछता हुआ पैदल बेटी के साथ आधा किलोमीटर दूर तक आया। वहां से बस से उरई और फिर झांसी आ गया। मैं झांसी से लखनऊ एसी कोच में जाना चाहता था पर रिजर्वेशन नहीं मिला तो तत्काल में स्लीपर का टिकट करवा लिया। लखनऊ में बेटी को पावर कारपोरेशन में नियुक्ति के लिए परीक्षा देनी थी। अब सोचता हूं कि यदि एसी में रिजर्वेशन मिल जाता तो शायद मैं और मेरी बेटी भी हादसे का शिकार हो सकती थी। हादसे का वह मंजर अब भी दिल दिमाग में घूम रहा है। बेटी तो बुरी तरह सहमी है।