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रानी की धरती पर अंतिम सांस ली थी चंद्रशेखर आजाद की मां जगरानी देवी ने
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झांसी। अमर शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का झांसी की धरती से गहरा नाता रहा है। यहीं रहकर वे अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम का तानाबाना बुना करते थे। इतना ही नहीं, आजाद की शहादत के बाद उनकी मां जगरानी देवी सालों झांसी में ही रहीं थीं और यहीं उन्होंने अंतिम सांसें ली थीं। सोमवार को उनकी 70वीं पुण्यतिथि है।
चंद्रशेखर आजाद का जन्म भले ही झांसी में नहीं हुआ था, लेकिन उनके क्रांतिकारी जीवन का केंद्र बिंदु झांसी ही रहा था। फिरंगियों को मात देने का तानाबाना उन्होंने इसी धरती से बुना था और सालों अज्ञातवास भी झांसी में ही काटा था। 27 फरवरी 1931 को उनकी शहादत हुई थी। आजाद की शहादत के कुछ समय बाद उनके पिता शिवराम तिवारी की मृत्यु हो गई थी। जबकि, उनके भाई पहले ही दिवंगत हो चुके थे। इन परिस्थितियों में आजाद की मां बिलकुल अकेली पड़ गईं थीं और मप्र के झाबुआ जिले के भाबरा गांव में गुमनामी में दिन बिताने लगीं थीं।
देश के आजाद होने के बाद उनके सहयोगी क्रांतिकारी सदाशिव राव मलकापुरकर 15 साल की कालापानी की सजा काटने के बाद जेल से बाहर आए। बाहर आकर सबसे पहले उन्होंने चंद्रशेखर आजाद की मां की खबर ली और वे उन्हें अपने साथ झांसी ले आए। आजाद की मां ने अपना अंतिम समय झांसी में ही काटा और 22 मार्च 1951 को उनका निधन हो गया था। उनका अंतिम संस्कार बड़ागांव गेट बाहर मुक्तिधाम पर किया गया था और उन्हें मुखाग्नि पुत्र की भांति सदाशिव राव ने ही दी थी। इसके बाद अंत्येष्टि स्थल पर समाधि बना दी गई थी, जो आज भी वहां मौजूद हैं। पुण्यतिथि पर तमाम लोग समाधि स्थल पर पहुंचकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
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कंडे और लकड़ी बेचकर किया गुजारा
झांसी। चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद उनकी मां बिलकुल अकेली पड़ गईं थीं। इसके अलावा उनके पास आय का कोई भी जरिया नहीं था। ऐसे में उन्होंने कंडे और लकड़ी बेचकर गुजारा किया था। उनके पास खाने के लिए भर पेट भोजन नहीं हुआ करता था। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष और इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि ताज्जुब की बात तो ये है कि देश के आजाद होने के दो साल बाद तक आजाद की मां की यही स्थिति बनी रही। सरकार की ओर से न तो उनकी खबर ली गई और न ही किसी तरह की सहायता उपलब्ध कराई गई। लेकिन, क्रांतिकारी सदाशिवराव मलकापुरकर ने अंत समय तक पुत्र का फर्ज निभाया। यहां तक की माता जगरानी देवी को उन्होंने चार धाम की यात्रा तक कराई थी।
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चंद्रशेखर आजाद का जन्म भले ही झांसी में नहीं हुआ था, लेकिन उनके क्रांतिकारी जीवन का केंद्र बिंदु झांसी ही रहा था। फिरंगियों को मात देने का तानाबाना उन्होंने इसी धरती से बुना था और सालों अज्ञातवास भी झांसी में ही काटा था। 27 फरवरी 1931 को उनकी शहादत हुई थी। आजाद की शहादत के कुछ समय बाद उनके पिता शिवराम तिवारी की मृत्यु हो गई थी। जबकि, उनके भाई पहले ही दिवंगत हो चुके थे। इन परिस्थितियों में आजाद की मां बिलकुल अकेली पड़ गईं थीं और मप्र के झाबुआ जिले के भाबरा गांव में गुमनामी में दिन बिताने लगीं थीं।
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देश के आजाद होने के बाद उनके सहयोगी क्रांतिकारी सदाशिव राव मलकापुरकर 15 साल की कालापानी की सजा काटने के बाद जेल से बाहर आए। बाहर आकर सबसे पहले उन्होंने चंद्रशेखर आजाद की मां की खबर ली और वे उन्हें अपने साथ झांसी ले आए। आजाद की मां ने अपना अंतिम समय झांसी में ही काटा और 22 मार्च 1951 को उनका निधन हो गया था। उनका अंतिम संस्कार बड़ागांव गेट बाहर मुक्तिधाम पर किया गया था और उन्हें मुखाग्नि पुत्र की भांति सदाशिव राव ने ही दी थी। इसके बाद अंत्येष्टि स्थल पर समाधि बना दी गई थी, जो आज भी वहां मौजूद हैं। पुण्यतिथि पर तमाम लोग समाधि स्थल पर पहुंचकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
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कंडे और लकड़ी बेचकर किया गुजारा
झांसी। चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद उनकी मां बिलकुल अकेली पड़ गईं थीं। इसके अलावा उनके पास आय का कोई भी जरिया नहीं था। ऐसे में उन्होंने कंडे और लकड़ी बेचकर गुजारा किया था। उनके पास खाने के लिए भर पेट भोजन नहीं हुआ करता था। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के उपाध्यक्ष और इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि ताज्जुब की बात तो ये है कि देश के आजाद होने के दो साल बाद तक आजाद की मां की यही स्थिति बनी रही। सरकार की ओर से न तो उनकी खबर ली गई और न ही किसी तरह की सहायता उपलब्ध कराई गई। लेकिन, क्रांतिकारी सदाशिवराव मलकापुरकर ने अंत समय तक पुत्र का फर्ज निभाया। यहां तक की माता जगरानी देवी को उन्होंने चार धाम की यात्रा तक कराई थी।