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बुंदेलखंड पानी को तरसा, रोटी के लाले

Fri, 08 Apr 2016 01:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 08 Apr 2016 01:04 AM IST
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Bundelkhand Trsa water, bread Lale
dry bundelkhand, jhansi news - फोटो : amarujala
झांसी। बुंदेलखंड में गेहूं की फसल चौपट होनेे के साथ गर्मी की शुरूआत में ही अकाल अब विकराल रूप लेता नजर आ रहा है। पानी, अनाज के लिए किसान और मवेशी तड़प रहे हैं। भूगर्भ जल सूखने से कुएं-हैंडपंप जवाब दे रहे हैं। गेहूं की फसल चौपट होने से किसानों के चेहरों पर मायूसी साफ झलक रही है। सरकारी योजनाएं केवल सपा की चुनावी तैयारी का तमाशा साबित हो रही हैँ, इसकी तस्दीक के लिए किसी सुदूर ग्रामीण इलाके में जाने की जरूरत नहीं है, बल्कि झांसी जिला मुख्यालय से सटे गांवों में ही यह नजारा देखने को मिल रहा है।
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बबीना विकासखंड के ग्राम खजराहा खुर्द जिला मुख्यालय से महज 29 किलोमीटर की दूरी पर है, जबकि झांसी-ललितपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से गांव की दूरी सिर्फ नौ किमी है। शहर से नजदीकी का गांव में असर भी है। मोबाइल और इंटरनेट नेटवर्क यहां धड़ल्ले से काम करता है। गलियां एपेक्स की बनी हुई एकदम सपाट हैं। गांव के कुछ हिस्से में 12-14 घंटे बिजली भी मिल जाती है। प्राथमिक पाठशाला गांव में है और स्वास्थ्य केंद्र की भी सुविधा है। नहीं है तो सिर्फ पानी और खाने का इंतजाम। कुएं पिछली गर्मी में ही सूख गए थे। बारिश न होने से दुबारा नहीं भर पाए। कुओं में झांकने पर तली की सूखी मिट्टी नजर आती है। वैसे गांव में 59 हैंडपंप हैं, लेकिन इनमें से पानी सिर्फ आठ में ही कड़ी मशक्कत से निकलता है।
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दो-तीन बाल्टी खींचने के बाद कम से कम आधा घंटे इंतजार करना पड़ जाता है। इन्हीं हैंडपंपों के भरोसे है गांव की लगभग 10 हजार की मानव और दो हजार की पशु आबादी। घर तक पानी लाने के लिए चार-पांच किलोमीटर चलना यहां आम बात हो चुकी है। पानी की समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों के सामने गेहूं की कटाई के बाद अनाज का संकट भी पैदा हो गया है। सूखे के चलते पहले ही यहां केवल पच्चीस फीसदी खेतों में रबी की फसल बोई गई थी। कुछ किसानों ने ही विषम परिस्थितियों में यह हिम्मत जुटाई थी। लेकिन, नतीजा नाउम्मीदी लेकर आया। किसान वसंत ने बताया कि उसके पास पांच एकड़ जमीन है, लेकिन गेहूं की फसल सवा बीघा में ही बोई थी, ताकि घर के लिए अनाज का इंतजाम हो जाए।
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50 किलो गेहूं बोया था और मिला सिर्फ तीन क्विंटल, वह भी पतले दाने का। किसान ने बताया कि उत्पादन की अपेक्षा लागत कहीं अधिक आई है और मेहनत का तो कोई मोल ही नहीं है। यह स्थिति केवल खजराहा खुर्द की ही नहीं, बल्कि आसपास के खजराहा बुजुर्ग, किल्चवारा, कोटि चमरऊआ, बैदोरा, सरवां, मुरारी आदि समेत दर्जनों गांवों की भी है। ग्रामीणों के पास पेट की आग और गले की प्यास बुझाने का कोई इंतजाम नहीं है। सूखे से निपटने को बनाई जा रहीं सरकारी योजनाएं धरातल पर सिफर साबित हो रही हैं।

खराब फसल का नहीं मिला मुआवजा
झांसी। खजराहा बुजुर्ग के पूर्व प्रधान वीरेंद्र सिंह ने बताया कि गांव के दो सौ किसानों को अब तक पिछले वर्ष हुई अतिवृष्टि/ओलावृष्टि का मुआवजा नहीं मिला है। सूखे के मुआवजे की तो बात दूर है, जबकि इसके लिए ग्रामीण लगातार लेखपाल से संपर्क कर रहे हैं, परंतु हाथ कुछ नहीं आया है।
तीन माह से नहीं मिली मनरेगा मजदूरी
झांसी। खजराहा खुर्द की प्रधान सीमा देवी ने बताया कि गांव में 365 लोगों के पास मनरेगा के जॉब कार्ड हैं, इनमें से सौ ने काम किया है। लेकिन, उन्हें तीन महीने से एक पाई भी नहीं मिली है। मजदूरी न मिलने से अब ग्रामीण मनरेगा से दूरी बनाने लगे हैं। इसके अलावा टैंकर से पानी की सप्लाई भी अब तक शुरू नहीं की गई है।

जिंदा रहने भरका पशुओं को मिल रहा पानी
झांसी। खजराहा खुर्द के ग्रामीण रामकिशन राजपूत ने बताया कि गांव के अन्य जानवर तो भगवान भरोसे छुट्टा हैं, केवल भैंसें ही बंधी हैं। लेकिन, इनकी भी प्यास नहीं बुझा पा रहे हैं। जानवरों को केवल उतना ही पानी पिला पा रहे हैं, जितने में वह जिंदा रहें। फसल न होने से चारे का भी संकट है। आगे क्या होगा? पता नहीं।


शहर में भी नहीं मिल रही मजदूरी
झांसी। खजराहा बुजुर्ग के किसान बलभद्र कहते हैं कि फसल न होने की वजह से गांव में सभी के हाथ खाली हैं। ज्यादातर लोग काम की तलाश में शहरों की ओर दौड़ रहे हैं, जिससे शहरों में भी मजदूरों की संख्या बढ़ गई है। जबकि, काम इतने हैं नहीं। ऐसे में अब मजदूरी का भी सहारा नहीं रहा है।
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