फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   Bundelkhand forgetting your taste

बुंदेलखंड भूल रहा अपना जायका

Mon, 21 Mar 2016 01:47 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 21 Mar 2016 01:47 AM IST
विज्ञापन
Bundelkhand forgetting your taste
hindi news in jhansi - फोटो : amarujala
झांसी। देश के अन्य राज्यों की तरह बुंदेलखंड भी स्वाद की दृष्टि से हमेशा से ही विविधता से भरा रहा है। खास मौके हों या आम दिन, हर अवसर का अपना अलग-अलग जायका है, लेकिन बदलते वक्त ने अन्य रवायतों की तरह बुंदेली व्यंजनों को भी लुप्त कर दिया है। गांवों में तो यह यदा-कदा नजर आ ही जाते हैं, परंतु शहरों में यह पूरी तरह से विलुप्त हो चुके हैं।
विज्ञापन


शादी की कच्ची पंगत लोगों की पहली पसंद
बुंदेलखंड में शादी से पहले सुतकरा एवं मंडप की पंगत में अमूमन कच्चे भोजन का प्रयोग होता है। इसमें उड़द की दाल से बना बरा, चने क ी दाल, रोटी, मठ्ठा, बेसन से निर्मित पकौड़ी युक्त कढ़ी, पापड़, चावल, शुद्ध घी, शक्कर का भूरा व तेल में भुनी कचरिया कच्ची पंगत की थाली के मुख्य व्यंजन हैं। उक्त सभी व्यंजनों को मिलाकर भी खाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में कालोनी कहते हैं।
विज्ञापन


पक्की पंगत का अलग है जायका
विवाह कार्यक्रम की पक्की पंगत में पूरी, सूखी व रसीली सब्जी, बेसन की पपड़ी, आम का आचार, धनिया, मिर्ची, टमाटर व कच्चे आम की चटनी, पंच मेल मिठाई, जिसमें बतास फेनी, जलेबी, मगद और बेसन के लड्डू तथा बर्फी है। इसके अलावा सात मिठाइयों का भी चलन था, जिसमें रसगुल्ला व बूंदी का लड्डू भी शामिल किया जाता था। जबकि, निर्धन वर्ग की दावत में बूंदी अथवा चार-चार बूंदी के लड्डू पंगत की शोभा बढ़ाते थे। इसके अलावा अजवायन, राई, सरसों, पिसी मिर्च, हींग व लोंग तड़का लगे मट्ठे का भी चलन था। वहीं, सन्नायटे के  रायता की हैसियत बुंदेलखंड की पंगत में काफी अहमियत रखती थी। इसमें बूंदी नाम मात्र को दिखाई देती थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


अब भी नहीं बदला टिपारा
विवाह कार्यक्रम के अंत में विदाई में दिए जाने वाला टिपारे (बायना) में बेसन से निर्मित गुना, फूल, मैदा से निर्मित खाकड़ा, पैराखे (रंग बिरंगी बड़ी गुझिया), मैदा, गुड व मेवा से निर्मित आंसे (बड़ी पूरी) होती हैं। समय के साथ दावत तो बदल गई, परंतु शादियों में टिपारा अब भी यही दिया जाता है।

बुंदेली मिठाइयां एवं नमकीन
झांसी। बुंदेलखंड में बनने वाली कई परंपरागत मिठाइयां व नमकीन आज लुप्त हो गई हैं। फास्ट फूड, कांटिनेंटल खानपान एवं आधुनिक मिठाइयों के दौर ने लोगों को स्वास्थ्य वर्धक बुंदेली व्यंजनों एवं मिठाइयों से काफी दूर कर दिया है।
- रसखीर: यह गन्ने के रस में चावल को पकाकर दूध डालकर तैयार की जाती है। इस व्यंजन में शक्कर का प्रयोग नहीं होता है।
- कुम्हड़ खीर: पके  हुए कुम्हैड़ा को छीलकर उसके कई पीस कर दूध में उबाला जाता है, जिसे गुड़ डालकर खाया जाता है।
- बिजौरा: कुम्हड़ा को पीसकर इनमें नमक, मसाले व तिली डालकर उसे छोटे-छोटे आकर में बेलकर कुचइयां बनाई जाती हैं। इसे धूप में सुखाकर तेल में तल कर खाया जाता है।
- डुबरी: महुआ के  सूखे फल को हल्की आंच में उबाला जाता है, तत्पश्चात मेवा डालकर उसे ठंडा कर परोसा जाता है।
- गौरस पछियाऊ: बुंदेलख्ंाड के प्रत्येक पर्व पर आटे की सिवंईयों अथवा चावल का गौरस बनाया जाता है, गुड़, दही, छाछ अथवा दूध से स्वादानुसार बनाया जाता है।
- मकर संक्रांति की खिचड़ी, चने की दाल, चावल एवं विभिन्न मौसमी सब्जियों से मिश्रित खिचड़ी जिसमें शुद्ध घी का तड़का सर्दियों के खानपान में विशेष स्थान रखता है।
- गुझिया: मैदा एवं खोवा से निर्मित गुझिया सदैव ही पर्व की शान रही है, जो आज भी है। इसके अलावा बेसन एवं मैदा से निर्मित पपड़ी भी पर्व का विशेष नमकीन है।

आम दिनों की खास है महेरी व मीणा
- महिरी: मट्ठा एवं चावल से बनने वाली महेरी बुंदेलखंड के जन जीवन में स्वास्थ्य की दृष्टि से सदैव ही प्रिय रही है। बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में पैदा होने वाले समा चावल, फोदो चावल की महेरी काफी फायदेमंद मानी जाती हैं।
- मीणा: बेसन को हींग व तेल में भूनकर उसे पानी में पकाया जाता है, जिसमें धनिया व हरी मिर्च डालकर खाया जाता है।
-------------------------

महुआ व बेरी है तो डांग में भी करो सगाई
झांसी। बुंदेलखंड में महुआ के पेड़ का विशेष स्थान है। प्राकृतिक मेवाओं में बुंदेलखंड क ा मुख्य मेवा महुआ का पका फल है। कहते हैं कि महुआ मेवा, बेर कलेवा, गुलगुच्छ बड़ी मिठाई, इतनी चीजें चाहो तुम तो डांगे करो सगाई। वहीं, एक और पुरानी कहावत है कि अगर किसी भी परिवार के पास एक गाय, दो महुआ के पेड़ एवं एक बेरी का पेड़ है, तो उस परिवार के सदस्य कभी भूखे नहीं रहेंगे। बुंदेली संस्कृति के जानकार हरगोविंद कुशवाहा के मुताबिक बुंदेलखंड के ग्रामीण एवं नगरीय जीवन में महुआ का फल मुख्य आहार रहा है। इससे बनने वाले व्यंजनों में लटा, मुरका, डुबरी आदि हैं।

वीरांगना होटल परोसेगा बुंदेली थाली
झांसी। बुंदेली जायका होटलों में भी खोजने पर नहीं मिलता। लेकिन, अब पर्यटन निगम का वीरांगना होटल इस दिशा में पहल करने जा रहा है। प्रबंधक मुकुल गुप्ता ने बताया कि जल्द ही होटल में बुंदेलखंड के व्यंजनों की व्यवस्था की जाएगी। इसके अलावा बुंदेली फूड फेस्टिवल भी आयोजित किया जाएगा।


ट्रेनों में भी नहीं मिलता बुंदेली भोजन
झांसी। ट्रेनों में भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) हर प्रांत का जायका परोसा जाता है। जिस रूट की गाड़ी है, उसमें उस रूट का स्वाद मिल जाता है। लेकिन, बुंदेलखंड इस मामले में उपेक्षित है। आईआरसीटीसी द्वारा इसकी कोई व्यवस्था नहीं की गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed