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Jhansi News: समय से पहले ही आ गया पतझड़... बढ़े तापमान ने दिखाया असर
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झांसी। मौसम के चक्र में हुए परिवर्तन से पर्यावरण सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि समय से पहले ही पतझड़ आ गया है। पेड़ों से पत्ते झड़ने का क्रम फरवरी में शुरू हो गया था, जो अब चरम पर पहुंच गया है। जबकि, बुंदेलखंड में आमतौर पर पतझड़ का सीजन 15 से 30 मार्च तक माना जाता है। अचानक बढ़े तापमान की वजह से यह स्थिति बनी है।
जाड़े के सीजन का दायरा लगातार कम होता जा रहा है। इस बार फरवरी में ही तापमान 35 डिग्री के आंकड़े को पार कर गया था। धूप की तल्खी लोगों को बेचैन करने लगी थी। समय से पहले पंखे चल पड़े थे, जिनकी आमतौर पर शुरुआत मार्च के अंत में होती थी। मौसम का चक्र परिवर्तित होने की वजह से पर्यावरण भी प्रभावित हुआ है। बुंदेलखंड में 15 मार्च से शुरू होने वाला पतझड़ का मौसम 20 फरवरी के इर्दगिर्द शुरू हो गया था। तापमान बढ़ने की वजह से पेड़ों से पत्ते झड़ने शुरू हो गए थे। यह क्रम अब भी जारी है।
मौसम एवं वानिकी विशेषज्ञों के अनुसार दो तरह के वृक्ष होते हैं। एक सदाबहार होते हैं, जिनके पुराने पत्ते साल भर झड़ते रहते हैं और नए आते रहते हैं। दूसरे तरह के वृक्षों में साल में एक बार पतझड़ आता है। इनमें शीशम, नीम, बरगद, पाखर, चिरौल आदि शामिल है। बुंदेलखंड में इन वृक्षों की बहुतायत है। पतझड़ का सीधा ताल्लुक मौसम के रुख से है। धूप तेज होने और तापमान बढ़ने की वजह से पत्तों की नमी कम हो जाती है, जिससे वे टूटकर गिरने लगते हैं। चूंकि, इस बार फरवरी में ही तापमान बढ़ गया था और धूप भी तेज हो चली थी। इससे पतझड़ का मौसम लगभग एक महीने पहले शुरू हो गया।
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पिछले कुछ सालों से मौसम के चक्र में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्दी के दिन लगातार कम होते जा रहे हैं और गर्मी बढ़ रही है। इससे ऋतुएं भी प्रभावित हुई हैं। शरद ऋतु खत्म होने से पहले ही ग्रीष्म का अहसास होने लगा है। इसी वजह से पतझड़ भी अपने समय से पहले आ गया है।
- डा. मुकेश चंद्र, वरिष्ठ वैज्ञानिक - कृषि मौसम विज्ञान केंद्र
बुंदेलखंड में पाए जाने वाले ज्यादातर पेड़ों में साल में एक बार पतझड़ होता है। यह आमतौर पर 15 से 30 मार्च के बीच होता है। लेकिन, इस बार फरवरी में ही पतझड़ शुरू हो गया था। तेज धूप ने पत्तों की नमी सोख ली थी, जिससे वजह से वह टूटने लगे थे। समय से पहले पतझड़ का आना मौसम के चक्र में आए परिवर्तन को भी दर्शाता है।
- डा. पंकज लवानिया, वानिकी विभाग, कृषि विश्वविद्यालय
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जाड़े के सीजन का दायरा लगातार कम होता जा रहा है। इस बार फरवरी में ही तापमान 35 डिग्री के आंकड़े को पार कर गया था। धूप की तल्खी लोगों को बेचैन करने लगी थी। समय से पहले पंखे चल पड़े थे, जिनकी आमतौर पर शुरुआत मार्च के अंत में होती थी। मौसम का चक्र परिवर्तित होने की वजह से पर्यावरण भी प्रभावित हुआ है। बुंदेलखंड में 15 मार्च से शुरू होने वाला पतझड़ का मौसम 20 फरवरी के इर्दगिर्द शुरू हो गया था। तापमान बढ़ने की वजह से पेड़ों से पत्ते झड़ने शुरू हो गए थे। यह क्रम अब भी जारी है।
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मौसम एवं वानिकी विशेषज्ञों के अनुसार दो तरह के वृक्ष होते हैं। एक सदाबहार होते हैं, जिनके पुराने पत्ते साल भर झड़ते रहते हैं और नए आते रहते हैं। दूसरे तरह के वृक्षों में साल में एक बार पतझड़ आता है। इनमें शीशम, नीम, बरगद, पाखर, चिरौल आदि शामिल है। बुंदेलखंड में इन वृक्षों की बहुतायत है। पतझड़ का सीधा ताल्लुक मौसम के रुख से है। धूप तेज होने और तापमान बढ़ने की वजह से पत्तों की नमी कम हो जाती है, जिससे वे टूटकर गिरने लगते हैं। चूंकि, इस बार फरवरी में ही तापमान बढ़ गया था और धूप भी तेज हो चली थी। इससे पतझड़ का मौसम लगभग एक महीने पहले शुरू हो गया।
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पिछले कुछ सालों से मौसम के चक्र में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। सर्दी के दिन लगातार कम होते जा रहे हैं और गर्मी बढ़ रही है। इससे ऋतुएं भी प्रभावित हुई हैं। शरद ऋतु खत्म होने से पहले ही ग्रीष्म का अहसास होने लगा है। इसी वजह से पतझड़ भी अपने समय से पहले आ गया है।
- डा. मुकेश चंद्र, वरिष्ठ वैज्ञानिक - कृषि मौसम विज्ञान केंद्र
बुंदेलखंड में पाए जाने वाले ज्यादातर पेड़ों में साल में एक बार पतझड़ होता है। यह आमतौर पर 15 से 30 मार्च के बीच होता है। लेकिन, इस बार फरवरी में ही पतझड़ शुरू हो गया था। तेज धूप ने पत्तों की नमी सोख ली थी, जिससे वजह से वह टूटने लगे थे। समय से पहले पतझड़ का आना मौसम के चक्र में आए परिवर्तन को भी दर्शाता है।
- डा. पंकज लवानिया, वानिकी विभाग, कृषि विश्वविद्यालय