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Jhansi News: ब्लड ग्रुप नेगेटिव होने पर गर्भवती महिलाओं को एंटी-डी इंजेक्शन जरूरी
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। जिन महिलाओं का ब्लड ग्रुप नेगेटिव होता है, उनके प्रसव के दौरान विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है। यदि मां का ब्लड ग्रुप नेगेटिव और शिशु का पॉजिटिव हो, तो मां के शरीर में एंटीबॉडी बन सकती हैं, जिससे दूसरे प्रसव में जटिलताएं और जान का खतरा हो सकता है। ऐसे मामलों में गर्भावस्था के सातवें माह और प्रसव के तुरंत बाद एंटी-डी इंजेक्शन अनिवार्य रूप से लगाया जाना चाहिए।
यह जानकारी नॉर्थ इंडिया गायनेकोलॉजिस्ट फोरम (एनआईजीएफ) की ओर आयोजित कार्यशाला में माहिरों ने दी। शनिवार को सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय ने कार्यशाला का उद्घाटन किया। कार्यशाला में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल की चिकित्सक डॉ. माला श्रीवास्तव कहा कि गर्भावस्था के तीसरे महीने में अल्ट्रासाउंड कराना जरूरी होता है, जिससे भ्रूण में किसी प्रकार की जटिलता का प्रारंभिक स्तर पर पता लगाया जा सके।
डॉ. हेमा जे. शोभने ने कहा कि मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए सभी निर्धारित चिकित्सीय प्रोटोकॉल का पालन आवश्यक है। गर्भावस्था के दौरान रक्तस्राव और शॉक की संभावना रहती है, इसलिए सूक्ष्म परीक्षण अत्यंत जरूरी है।
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नेगेटिव ब्लड ग्रुप और खून चढ़ाने की जरूरत
एसपीपीजीआई लखनऊ की विभागाध्यक्ष डॉ. मंदाकिनी प्रधान ने बताया कि नेगेटिव ब्लड ग्रुप वाली महिलाओं के भ्रूण सामान्यतः कमजोर होते हैं, जिन्हें गर्भ में ही खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ सकती है। इस स्थिति में एंटी-डी इंजेक्शन गर्भ के सातवें माह और प्रसव के तुरंत बाद लगाया जाना चाहिए।
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पूर्व नियोजन से करें गर्भधारण:
एनआईजीएफ की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. साधना गुप्ता ने कहा कि उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, थायरॉयड और गठिया जैसी बीमारियों से ग्रसित महिलाओं को गर्भधारण पूर्व ही डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अल्ट्रासाउंड भ्रूण पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव नहीं डालता, यह केवल भ्रूण की सेहत जांचने का माध्यम है।
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क्रोमोसोम जांच आवश्यक:
सेंट्रल रेलवे हॉस्पिटल प्रयागराज की डॉ. मनीषा गुप्ता ने कहा कि गर्भावस्था के तीसरे महीने में यदि खून की जांच में गड़बड़ी पाई जाए तो क्रोमोसोम टेस्ट कराना चाहिए, जिससे भ्रूण में डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों का पता लगाया जा सके।
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अत्यधिक रक्तस्राव और प्लेसेंटा जटिलता:
एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सरोज सिंह ने बताया कि कुछ मामलों में प्रसव के बाद प्लेसेंटा बच्चेदानी से चिपक जाता है, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव होता है। ऐसे मामलों में बैलून कैथेटर तकनीक से रक्तस्राव को नियंत्रित किया जाता है।
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70 से अधिक पीजी छात्रों ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र
प्रदेश भर के मेडिकल कॉलेजों से आए पीजी छात्रों की 20 टीमों के बीच दो चक्रों में क्विज प्रतियोगिता आयोजित की गई। कार्यशाला में विभागाध्यक्ष डॉ. सिप्पी अग्रवाल ने 70 से अधिक शोध-पत्रों का सफलतापूर्वक प्रस्तुतिकरण कराया। इस अवसर पर डॉ. विद्या चौधरी, डॉ. प्रीति केनाल, डॉ. लक्ष्मी जाटव, डॉ. सुचेता राजपूत, डॉ. दिव्या जैन, डॉ. मनु शुक्ला सहित अनेक विशेषज्ञ मौजूद रहे।
झांसी। जिन महिलाओं का ब्लड ग्रुप नेगेटिव होता है, उनके प्रसव के दौरान विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है। यदि मां का ब्लड ग्रुप नेगेटिव और शिशु का पॉजिटिव हो, तो मां के शरीर में एंटीबॉडी बन सकती हैं, जिससे दूसरे प्रसव में जटिलताएं और जान का खतरा हो सकता है। ऐसे मामलों में गर्भावस्था के सातवें माह और प्रसव के तुरंत बाद एंटी-डी इंजेक्शन अनिवार्य रूप से लगाया जाना चाहिए।
यह जानकारी नॉर्थ इंडिया गायनेकोलॉजिस्ट फोरम (एनआईजीएफ) की ओर आयोजित कार्यशाला में माहिरों ने दी। शनिवार को सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय ने कार्यशाला का उद्घाटन किया। कार्यशाला में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल की चिकित्सक डॉ. माला श्रीवास्तव कहा कि गर्भावस्था के तीसरे महीने में अल्ट्रासाउंड कराना जरूरी होता है, जिससे भ्रूण में किसी प्रकार की जटिलता का प्रारंभिक स्तर पर पता लगाया जा सके।
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डॉ. हेमा जे. शोभने ने कहा कि मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए सभी निर्धारित चिकित्सीय प्रोटोकॉल का पालन आवश्यक है। गर्भावस्था के दौरान रक्तस्राव और शॉक की संभावना रहती है, इसलिए सूक्ष्म परीक्षण अत्यंत जरूरी है।
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नेगेटिव ब्लड ग्रुप और खून चढ़ाने की जरूरत
एसपीपीजीआई लखनऊ की विभागाध्यक्ष डॉ. मंदाकिनी प्रधान ने बताया कि नेगेटिव ब्लड ग्रुप वाली महिलाओं के भ्रूण सामान्यतः कमजोर होते हैं, जिन्हें गर्भ में ही खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ सकती है। इस स्थिति में एंटी-डी इंजेक्शन गर्भ के सातवें माह और प्रसव के तुरंत बाद लगाया जाना चाहिए।
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पूर्व नियोजन से करें गर्भधारण:
एनआईजीएफ की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. साधना गुप्ता ने कहा कि उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, थायरॉयड और गठिया जैसी बीमारियों से ग्रसित महिलाओं को गर्भधारण पूर्व ही डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अल्ट्रासाउंड भ्रूण पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव नहीं डालता, यह केवल भ्रूण की सेहत जांचने का माध्यम है।
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क्रोमोसोम जांच आवश्यक:
सेंट्रल रेलवे हॉस्पिटल प्रयागराज की डॉ. मनीषा गुप्ता ने कहा कि गर्भावस्था के तीसरे महीने में यदि खून की जांच में गड़बड़ी पाई जाए तो क्रोमोसोम टेस्ट कराना चाहिए, जिससे भ्रूण में डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों का पता लगाया जा सके।
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अत्यधिक रक्तस्राव और प्लेसेंटा जटिलता:
एसएन मेडिकल कॉलेज, आगरा की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सरोज सिंह ने बताया कि कुछ मामलों में प्रसव के बाद प्लेसेंटा बच्चेदानी से चिपक जाता है, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव होता है। ऐसे मामलों में बैलून कैथेटर तकनीक से रक्तस्राव को नियंत्रित किया जाता है।
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70 से अधिक पीजी छात्रों ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र
प्रदेश भर के मेडिकल कॉलेजों से आए पीजी छात्रों की 20 टीमों के बीच दो चक्रों में क्विज प्रतियोगिता आयोजित की गई। कार्यशाला में विभागाध्यक्ष डॉ. सिप्पी अग्रवाल ने 70 से अधिक शोध-पत्रों का सफलतापूर्वक प्रस्तुतिकरण कराया। इस अवसर पर डॉ. विद्या चौधरी, डॉ. प्रीति केनाल, डॉ. लक्ष्मी जाटव, डॉ. सुचेता राजपूत, डॉ. दिव्या जैन, डॉ. मनु शुक्ला सहित अनेक विशेषज्ञ मौजूद रहे।